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Wednesday, 21 March 2012

A Short notes on Japanese Encephalitis (Dimagi Bukhar)

Japanese Encephalitis (JE) is an illness caused by infection with a flavivirus that belongs to the family Flaviviridae. This virus is a part of a group of viruses known as arboviruses that are spread by arthropods (mosquitoes or ticks).
The JE virus is carried by a variety of different mosquitoes, but not all. Mosquitoes spread the virus between humans and animals, and Culex annulirostris.
People can be infected with the JE virus and may have asymptomatic infections (not feel sick).
Symptoms include very severe headaches, fever, tremors, convulsions, paralysis and coma. Some patients may have neck stiffness and sleepiness. Severe cases may go from confusion to delirium to coma.
In horses the virus causes encephalitis, and in pigs it causes still births. 
japanese encephalitis Dimagi bukhar life cycle by chiragan

japanese encephalitis Dimagi bukhar life cycle by chiragan

japanese encephalitis Dimagi bukhar life cycle by chiragan

Japanese encephalitis is diagnosed by doing laboratory tests on blood samples to find either the virus or the antibodies that are produced by the body as a reaction to the virus.
The JE virus is spread by mosquitoes, and people may be infected when bitten by a mosquito carrying the virus. Mothers can also pass on the virus to their unborn baby, which causes still births.
The lifecycle of the JE virus involves mosquitoes, vertebrate animals and water birds.
Adult female mosquitoes need blood to develop their egg batches, and can become infected with the virus when feeding on the blood of an infected animal.The virus then multiplies inside the saliva glands of infected females, which inject the virus into animals or humans they later feed on.
Pigs and wild waterbirds are important hosts for the virus, because it can multiply to very high levels in their blood. This increases the chances of mosquitoes being infected when feeding on them.
The virus is not transmitted from person to person, and a mosquito remains infected f
Children younger than 15 years are most at risk of having a severe illness, and the JE mortality rate is highest in children aged 5-9 years. 

How do we prevent it from occurring?

Community education on the disease, and how it is spread, is the main method for reducing the occurrence of JE. Education programs should highlight the importance of reducing mosquito populations and avoiding being bitten. Preventative measures discussed may include:
  • Removing mosquito-breeding sites from around communities. Sites include blocked roof gutters, pot plant drip trays, and any containers that may hold water after rain (tins, tyres or jars).
  • Keeping swimming pools full and well maintained, and fishponds stocked with fish to stop mosquitoes breeding in them.
  • Screening septic tank vents and rainwater tanks, and flushing unused toilets once a week to stop mosquitoes breeding in them.
  • Screening living areas, and using mosquito bed-nets to keep out mosquitoes. Mosquito coils and mats can be used to kill adult mosquitoes in the home.
  • Avoiding being outside in areas where mosquitoes are present just before sunset or sunrise, and for 2 hours after, because this is when they are most active.
  • Wearing loose light-coloured long-sleeved shirts and long trousers, socks and covered footwear to prevent being bitten by mosquitoes. Clothing can be sprayed with mosquito repellents for further protection.
  • Using insect repellents in areas where mosquitoes are active. Repellents containing 20-30% diethyl toluaminde (DEET) offer the best protection. However, they should not be used on small children. Repellents containing around 6% DEET are available, which are registered for use on kids. Repellents need to be applied every 4 hours.
  • Sleeping under mosquito nets, because repellents do not last all night long. 
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जापानी बुखार का कहर और सावधानी

जापानी बुखार हालांकि बहुत खतरनाक है और इसके लिए कोई पुख्ता इलाज भी नहीं है लेकिन यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाएं तो निश्चित रूप से जापानी बुखार से निजात पाई जा सकती है। जापानी बुखार कहने को अभी बहुत अधिक नहीं फैला है लेकिन इस वायरस के फैलने की उम्मीदें लगातार बनी हुई हैं। इसीलिए आप डरने के बजाय सावधानी बरतेंगे तो बेहतर है।

दरअसल जिन 17 सुअरों के रक्‍त में जापानी इंसेफ्लाइटिस वायरस की पुष्टि हुई है वह रिपोर्ट नई नहीं है यानी इन सुअरों के रक्त का सैंपल सितंबर में लिया गया था जबकि इसके नतीजे नवंबर में सामने आए हैं जो कि खतरे की घंटी है।
japanese encephalitis Dimagi bukhar life cycle by chiragan
गौरतलब है कि सितंबर में दिल्ली में ही चार मरीज जापानी बुखार से पीडि़त थे जिसके बाद सुअरों के रक्त की जांच की गई और वह रिपोर्ट अक्तूबर के अंत तक आई जिसे 27 नवंबर को रिलीज किया गया और सार्वजनिक तौर पर इस रिपोर्ट को 15 दिसंबर को रिलीज किया गया। खुशी की बात है कि फिलहाल जापानी इंसेफ्लाइटिस वायरस से पीडि़त कोई मरीज नहीं है, ना ही इसका कोई संभावित मरीज भी है। लेकिन परेशानी की बात ये है कि दिमागी बुखार या जापानी बुखार का कहर अगले साल के सिंतबर के आसपास अपना कहर बरपा सकता है।

इस बात का सीधा नतीजा ये निकलता है कि राजधानी में अभी जापानी बुखार का मंडरा रहा खतरा कम हो गया है लेकिन फिर भी आपको जागरूक होने की बेहद जरूरत है।

दरअसल, सर्दियों में मच्छर जनित बीमारियां कम ही होती हैं लेकिन गर्मियों में मच्छरों की अधिकता के कारण कई तरह की बीमारियां भी हो जाती है। इस बाबत जनस्‍वास्‍थ्‍य विभाग के कर्त्ताधर्ताओं का कहना है कि जापानी बुखार से संबंधित रिपोर्ट जारी कर लोगों को डराना नहीं बल्कि चेताना था और जागरूक करना था कि जापानी बुखार के वायरस सूअर के माध्यम से हो सकता है जिससे वे समय से पहले सावधानी बरतें। हालांकि जापानी बुखार एक मरीज से दूसरे मरीज में नहीं फैलता लेकिन मच्छरों द्वारा ये संक्रमित बुखार है। बहरहाल, आपको जापानी बुखार से सावधानी बरतने की जरूरत है और अपने आसपास सफाई रखने की जरूरत है।
By: अनुराधा गोयल, ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग

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Sunday, 10 July 2011

दिमागी बुखार से गरीब मरते हैं और स्वाइन फ्लू से अमीर

दिमागी बुखार से गरीब मरते हैं और स्वाइन फ्लू से अमीर

  इनसेफलाइटिस जिसे दिमागी बुखार कहते हैं, से गोरखपुर में पिछले 24 घंटो में 10 साल की स्मिता और 1 साल के माही की मौत हो गई. खबर में है कि पिछले 1 जनबरी से अब तक 500 मरीज गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो चुके हैं जिसमें से 117 की मौत हो चुकी है. हकीकत यह है कि पिछले 3 सालों में गोरखपुर और उसके आसपास के इलाको में 10 हजार से ज्यादा बच्चे इस बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं. फिर भी यह मुद्दा राष्ट्रीय आपदा नहीं बना. 100 से भी कम लोगों की स्वाइन फ्लू की मौत देश भर में हंगामा खड़ा कर देती हैं. कारण सिर्फ इतना कि यह फ्लू जिनको हुआ, उनमें से अधिकांश बड़े घर के लोग थे और पूर्वांचल में मरने बाले बच्चे अधिकतर गरीब घरों के थे.
दुनिया भर के किसी भी देश के एक मंडल में आज तक इतने बच्चे किसी एक बीमारी से नहीं मरे. और हमारा नपुंसक नेतृत्व इन मौतों के प्रति इतना संवेदनहीन बना रहा मानो मरने बाले बच्चे इंसानों के न हों. समझ नहीं आता हम कौन से समाज में जी रहे हैं. 
सरकार दावा कर रही है कि पूरे पूर्वांचल में इस बीमारी से बचने को टीके लगवा दिए गए हैं. फिर बच्चे कैसे मर रहे हैं? यूपी की सरकार कह रही है दिल्ली सरकार टीके नहीं दे रही. दिल्ली सरकार कह रही है कि यूपी सरकार टीके लगवा नहीं पा रही. बाद में यूपी सरकार कहती है कि जो टीके आये वो ख़राब थे और इसी सब राजनीति के बीच लगातार बच्चे मर रहे हैं.
गोरखपुर और उसके आसपास के गावों में जाकर देखिये. जरा भी बच्चे का शरीर गरम होता है तो माँ रोना शुरू कर देती है. वो जानती है कि अब उसका बच्चा नहीं बचेगा.
हम करोड़ों, अरबों रुपये खर्च करके राष्ट्रमंडल खेल करा सकते हैं और उसे देश के स्वाभिमान से जोड़ सकते हैं. मगर इस बात का संकल्प नहीं ले सकते कि चाहे कुछ भी हो जाये एक भी बच्चा अब इस बीमारी से मरने नहीं दिया जायेगा. अगर यह बच्चे अमीरों के होते तो अब तक देश में तूफान खड़ा हो चुका होता. संसद एक भी दिन नहीं चल पाती. अब इन हालात के बाद कोई यह पूछे कि नक्सली क्यों बनते हैं तो उसे मूर्ख ही कहा जायेगा.
बच्चों की मौत देश की उतनी ही गंभीर समस्या हैं जितनी कश्मीर या नक्सलवाद की. अफ़सोस यह कि इसे सबने स्वाभाविक मान लिया है. कोई शुरुआत नहीं करना चाहता.
www.kinjalkumar.blogspot.com में छपा Knjal Kumar जी  का लेख........! साभार   

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गरीब बच्चो के माँ बाप की दुआ..और... दिमागी बुखार

गरीब बच्चो के माँ बाप की दुआ..और... दिमागी बुखार

गोरखपुर में पिछले 24 घंटो में 10 साल की स्मिता और 1 साल के माही की मौत हो गई. खबर में है कि पिछले 1 जनबरी से अब तक 944 मरीज गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो चुके हैं जिसमें से 167 की मौत हो चुकी है. हकीकत यह है कि पिछले 3 सालों में गोरखपुर और उसके आसपास के इलाको में 10 हजार से ज्यादा बच्चे इस बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं. फिर भी यह मुद्दा राष्ट्रीय आपदा नहीं बना. 100 से भी कम लोगों की स्वाइन फ्लू की मौत देश भर में हंगामा खड़ा कर देती हैं. कारण सिर्फ इतना कि यह फ्लू जिनको हुआ, उनमें से अधिकांश बड़े घर के लोग थे और पूर्वांचल में मरने बाले बच्चे अधिकतर गरीब घरों के थे.
दुनिया भर के किसी भी देश के एक मंडल में आज तक इतने बच्चे किसी एक बीमारी से नहीं मरे. और हमारा नपुंसक नेतृत्व इन मौतों के प्रति इतना संवेदनहीन बना रहा मानो मरने बाले बच्चे इंसानों के न हों. समझ नहीं आता हम कौन से समाज में जी रहे हैं. मैं इलेक्ट्रोनिक मीडिया की आलोचना नहीं करना चाहता पर क्या सभी चैनल अगर लगातार 1 सप्ताह तक यही खबर दिखाएं और उस पर परिचर्चा करवाएं, तब भी क्या हमारे देश के कर्णधार इन बच्चों को यूं ही मरने देंगे? अगर देश भर के अखबार अपना पहला पेज सिर्फ यह लिख कर खाली छोड़ दें कि लानत है ऐसे नेतृत्व को. तब भी क्या हालात में सुधार नहीं आएगा.
सरकार दावा कर रही है कि पूरे पूर्वांचल में इस बीमारी से बचने को टीके लगवा दिए गए हैं. फिर बच्चे कैसे मर रहे हैं? यूपी की सरकार कह रही है दिल्ली सरकार टीके नहीं दे रही. दिल्ली सरकार कह रही है कि यूपी सरकार टीके लगवा नहीं पा रही. बाद में यूपी सरकार कहती है कि जो टीके आये वो ख़राब थे और इसी सब राजनीति के बीच लगातार बच्चे मर रहे हैं.
गोरखपुर और उसके आसपास के गावों में जाकर देखिये. जरा भी बच्चे का शरीर गरम होता है तो माँ रोना शुरू कर देती है. वो जानती है कि अब उसका बच्चा नहीं बचेगा.
हम करोड़ों, अरबों रुपये खर्च करके राष्ट्रमंडल खेल करा सकते हैं और उसे देश के स्वाभिमान से जोड़ सकते हैं. मगर इस बात का संकल्प नहीं ले सकते कि चाहे कुछ भी हो जाये एक भी बच्चा अब इस बीमारी से मरने नहीं दिया जायेगा. अगर यह बच्चे अमीरों के होते तो अब तक देश में तूफान खड़ा हो चुका होता. संसद एक भी दिन नहीं चल पाती. अब इन हालात के बाद कोई यह पूछे कि नक्सली क्यों बनते हैं तो उसे मूर्ख ही कहा जायेगा.
बच्चों की मौत देश की उतनी ही गंभीर समस्या हैं जितनी कश्मीर या नक्सलवाद की. अफ़सोस यह कि इसे सबने स्वाभाविक मान लिया है. कोई शुरुआत नहीं करना चाहता. उम्मीद है कि उन माओं की खातिर जो अपने बच्चों  को मौत के मुंह में जाते देख रही हैं, अपने अपने स्तर से इस लड़ाई की शुरुआत करेंगे.
www.kinjalkumar.blogspot.com में छपा Knjal Kumar जी  का लेख........! साभार   

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जापानी एनसेफेलिटिस ( दिमागी बुखार ) Japanese Encephalitis

जापानी एनसेफेलिटिस ( दिमागी बुखार )
चावलों के खेतों में पनपने वाले मच्छरों से (प्रमुख रूप से क्युलेक्स ट्रायटेनियरहिंचस समूह)। यह मच्छर जापानी एनसिफेलिटिस वायरस से संक्रमित हो जाते हैं (सेंट लुई एलसिफेलिटिस वायरस एंटीजनीक्ली से संबंधित एक फ्लेविवायरस)। जापानी एनसिफेलिटिस वायरस से संक्रमित मच्छरों के काटने से होता है। जापानी एनसेफेलाइटिस वायरस से संक्रांत पालतू सूअर और जंगली पक्षियों के काटने पर मच्छर संक्रांत हो जाते है। इसके बाद संक्रांत मच्छर पोषण के दौरान जापानी एनसेफेलिटिस वायरस काटने पर मानव और जानवरों में जाते हैं। जापानी एनसेफेलिटिस वायरस पालतू सूअर और जंगली पक्षियों के रक्त प्रणाली में परिवर्धित होते हैं। 


जापानी एनसेफेलिटिस के वायरस का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं होता है। उदारहण के लिए आपको यह वायरस किसी उस व्यक्ति को छूने या चूमने से नहीं आ सकता जिसे यह रोग है या किसी स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी से जिसने किसी इस प्रकार के रोगी का उपचार किया हो।केवल पालतू सूअर और जंगली पक्षी ही जापानी एनसेफेलिटिस वायरस फैला सकते हैं।


लक्षण

सिर दर्द के साथ बुखार को छोड़कर हल्के संक्रमण में और कोई प्रत्यक्ष लक्षण नहीं होता है। गंभीर प्रकार के संक्रमण में सिरदर्द, तेज बुखार, गर्दन में अकड़न, घबराहट, कोमा में चले जाना, कंपकंपीं, कभी-कभी ऐंठन ( विशेष रूप से छोटे बच्चों में) और मस्तिष्क निष्क्रिय(बहुत ही कम मामले में), पक्षाघात होता है।जापानी एनसेफेलाइटिस की संचयी कालवधि सामान्यतः 5 से 15 दिन होती है। इसकीमृत्युदर 0.3 से 60 प्रतिशत तक है।

उपचार
इसकी कोई विशेष चिकित्सा नहीं है. गहन सहायक चिकित्सा की जाती है। यह रोग अलग अलग देशों में अलग अलग समय पर होता है. क्षेत्र विशेष के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले, वहां प्रतिनियुक्त सक्रिय ड्यूटी वाले सैनिक और ग्रामीण क्षेत्रों में घूमने वालों को यह बीमारी अधिक होती है। शहरी क्षेत्रों में जापानी एनसेफेलाइटिस सामान्यतः नहीं होता है।जापानी एनसेफेलाइटिस के लिए भारत में निष्क्रिय मूसक मेधा व्युत्पन्न (इनएक्टीवेटेड माउस ब्रेन-डिराइव्ड जे ई) जापानी एनसेफेलाइटिस टीका उपलब्ध है।
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