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Friday, 21 November 2014

महिलाओं के लिए अमेरिका में पढ़ने के अवसर

वकालत शिक्षा, परोपकार और शोध द्वारा महिलाओं और लड़कियों का समान रूप से विकास अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी वुमेन यानी एएयूडब्ल्यू का उद्देश्य है। एएयूडब्ल्यू आर्थिक और शैक्षिक बाधाओं को दूर करता है जिससे महिलाओं को करियर बनाने का अच्छा मौका मिलता है। एएयूडब्ल्यू उन महिलाओं का, जो अमेरिका की नागरिक नहीं हैं या पर्मानेंट रेजीडेंट नहीं हैं, को अमेरिका में रहकर फुलटाइम स्टडी या रिसर्च करने का अवसर प्रदान करता है। ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट, दोनों कोर्सो को वहां की मान्यता प्राप्त संस्थाओं के सहयोग से कराया जाता है। एएयूडब्ल्यू राज्यस्तरीय नेटवर्क है जिसमें 170,000 सदस्य और सपोटर्स हैं, 1,000 स्थानीय ब्रांच हैं और 800 कॉलेज और यूनिवर्सिटी इसके पार्टनर्स हैं। खासतौर से शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए प्राइवेट फंडिंग के लिए एएयूडब्ल्यू राष्ट्र का सबसे बड़ा स्रेत है जो सीधे महिलाओं और लड़कियों को लाभान्वित करता है। हर साल एएयूडब्ल्यू 200 से ज्यादा महिलाओं को फेलोशिप और ग्रांट
प्रदान करता है। मूल रूप से एएयूडब्ल्यू विविधतापूर्ण मेंबरशिप को मान्यता देता है। इस संस्थान में लैंगिक, जाति, उम्र, राष्ट्रीय ता, मूल, अशक्तता या वर्ग जैसी कोई बाधाएं नहीं हैं। योग्यता इस अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप का अस्तित्व 1917 से है। यह फेलोशिप अमेरिका में एक वर्षीय ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट कार्यक्रम में अध्ययन के लिए सहयोग करता है। इसे उन महिलाओं को प्रदान किया जाता है जो अमेरिकी नागरिक नहीं होती। जिन महिलाओं के पास डय़ूल सिटीजनशिप यानी अमेरिकी नागरिकता के साथ ही दूसरे देश की नागरिका हो, तो वह भी इस स्कॉलरशिप की पात्र नहीं हो सकतीं। उन्हीं महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है जो पहले से ही नगर, समाज या प्रोफेशनल वर्क में महिलाओं और लड़कियों की प्रगति की प्रतिज्ञा लेती हैं। यह फेलोशिप अमेरिका में अध्ययन करने का अवसर देती है, इसमें इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ यूनिवर्सिटी वुमेन की गिनी-चुनी सदस्यों को ही अवसर मिलता है। पाठय़क्रम पूरा होने के पश्चात कैंडीडेट में अपने होम कंट्री लौट कर करियर बनाने का इरादा होना जरूरी है। कैंडीडेट्स को अंग्रेजी में निपुण होना आवश्यक है, नहीं तो उसे इस बात का सत्यापन कराना होगा कि उसकी क्षेत्रीय भाषा अंग्रेजी है या उसने अंग्रेजी में सेकेंड्री डिप्लोमा या इंग्लिश-स्पीकिंग इंस्टीट्यूशन से अंडर ग्रेजुएट डिग्री या फिर उसने इंग्लिश स्पीकिंग कॉलेज या यूनिवर्सिटी से अक्टूबर 2012 और सितम्बर 2014 के बीच फुलटाइम अध्ययन कर रखा है। स्कॉ लरशिप्स के प्रारूप मास्टर्स/प्रोफेशनल फेलोशिप : 18,000 डॉलर डॉक्टोरेट फे लोशिप : 20,000 डॉलर पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप : 30,000 डॉलर इंटरनेशनल फेलोशिप्स फंड केवल शैक्षिक खर्च, रहने का खर्च, निर्भर बच्चे की देखभाल और प्रोफेशनल मीटिंग के लिए यात्रा का खर्च देता है। कॉन्फ्रेंस या सेमिनार लंबे समय से नहीं हुआ है लेकिन फेलोशिप का दस प्रतिशत इसके लिए मिल सकता है। अंतिम तिथि मास्टर्स/फस्र्ट प्रोफेशनल डिग्री या डॉक्टोरल प्रोग्राम में दाखिला लेने के लिए 1 दिसम्बर 2014 है। पोस्ट डॉक्टोरल के लिए आवेदन करने वाले कैंडीडेट्स को अपना डॉक्टोरेट डिग्री का प्रूफ देना होगा। आवेदन का प्रारूप आवेदन और सपोर्टिंग डॉक्युमेंट्स को ऑनलाइन जमा किया जा सकता है।

Saturday, 19 July 2014

होटल इंडस्ट्री

टूरिस्ट की बढ़ती संख्या की वजह से हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में काफी तेजी देखी जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल 83 हजार के अधिक लोगों को इस इंडस्ट्री में नौकरियां मिल सकती हैं। स्वागत करने को तैयार इस सेक्टर में आप भी बना सकते हैं करियर..
विदेशी सैलानियों के बीच भारत पसंदीदा डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है और पिछले कुछ वर्र्षो में यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इससे होटल इंडस्ट्री में भी तेजी देखी जा सकती है। भारत में होटल इंडस्ट्री के विकास का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। इस फील्ड में संभावनाओं को देखते हुए होटल मैनेजमेंट से जुड़े कोर्स कर लेते हैं, तो भविष्य में चमकदार करियर बनाया जा सकता है।
होटल इंडस्ट्री और टूरिजम सेक्टर
होटल इंडस्ट्री का सीधे तौर पर टूरिस्ट से जुड़ा होता है। यदि टूरिस्ट आते हैं, तो होटल इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है। 12वींपंचवर्षीय योजना के मुताबिक, 2016 तक भारत में 11.24 मिलियन विदेश टूरिस्ट के आने की संभावना है। वहींइस दौरान 1451.46 मिलियन घरेलू टूरिस्ट भी होंगे। प्लानिंग कमीशन के मुताबिक, 2016 तक देश में करीब 50 लाख रूम्स की जरूरत होगी।
कैसे मिलेगी एंट्री
12वीं पास स्टूडेंट होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा या डिग्री हासिल कर सकते हैं। नेशनल काउंसिल फॉर होटल मैनेजमेंट एेंड कैटरिंग टेक्नोलॉजी के संस्थानों में बीएससी इन हास्पिटैलिटी एेंड होटल मैनेजमेंट कोर्स में दाखिले के लिए संयुक्तप्रवेश परीक्षा होती है। इसके लिए 12वीं में कैंडिडेट्स का 50 प्रतिशत मा‌र्क्स होना जरूरी है।
कौन-कौन से कोर्स
एलबीआईआईएचएम के डायरेक्टर कमल कुमार के मुताबिक, 12वीं के बाद बीए इन होटल मैनेजमेंट, डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेंट, बैचलर डिग्री इन होटल मैनेजमेंट, डिप्लोमा इन होटल एेंड कैटरिंग मैनेजमेंट, बैचलर डिग्री इन हॉस्पिटैलिटी साइंस, बीएससी होटल मैनेजमेंट एेंड कैटरिंग साइंस जैसे कोर्स कर सकते हैं। इसकी अवधि 6 महीने से 3 साल तक है। इसके अलावा, पीजी डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेंट, एमएससी इन होटल मैनेजमेंट और एमए इन होटल मैनेजमेंट कोर्स कर सकते हैं। इसकी अवधि 2 साल है। पर्सनल स्किल
इस इंडस्ट्री में करियर बनाने के इच्छुक स्टूडेंट्स की पर्सनैलिटी आकर्षक होने के साथ-साथ इसके लिए कम्युनिकेशन स्किल भी शानदार होनी चाहिए। तार्किक सोच के साथ-साथ एडमिनिस्ट्रेशन स्किल भी अच्छी होनी चाहिए।
जॉब के मौके
सुंदरदीप ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डाक्टर अंजू सक्सेना के मुताबिक, होटल मैनेजमेंट कोर्स करने के बाद आप होटल एवं हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में कार्य की शुरुआत कर सकते हैं। इसके अलावा, होटलों में किचन मैनेजमेंट, हाउसकीपिंग मैनेजमेंट, एयरलाइन कैटरिंग, केबिन सर्विसेज, सर्विस सेक्टर में गेस्ट या कस्टमर रिलेशन एग्जिक्यूटिव, फास्ट फूड चेन, रिसॉर्ट मैनेजमेंट, क्रूज शिप होटल मैनेजमेंट, गेस्ट हाउसेज, हॉस्पिटल ऐडमिनिस्ट्रेशन, कैटरिंग, रेलवे या बैंक या बड़े संस्थानों में कैटरिंग या कैंटीन आदि में भी जॉब्स मिल सकती हैं।
सैलरी पैकेज
करियर के शुरुआती दौर में 12 -18 हजार रुपये प्रति माह मिल सकते हैं। कुछ वषरें का अनुभव हासिल करने के बाद सैलरी अच्छी हो सकती है।
ई-मार्केटिंग का जमाना
जेपी बिजनेस स्कूल नोएडा द्वारा सोशल मीडिया और ई-मार्केटिंग पर नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें सोशल मीडिया और ई-मार्केटिंग पर आधारित रिसर्च और नई जानकारियां शेयर की गईं। इस मौके पर जेआइआइटी नोएडा के वाइस चांसलर प्रो. एससी सक्सेना ने कहा कि टेक्नोलॉजी के माध्यम से बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन में काफी चेंज आया है। जेईएस के सीईओ डॉ.वाई मेदुरी ने अपने भाषण में ई-बिजनेस द्वारा विकसित और इस्तेमाल किए जा रहे रेवेन्यू मॉडल पर जोर दिया। इसके बाद एनआइआइटी टेक्नोलॉजीज के एशिया पैसेफिक इंडिया और मिडिल ईस्ट के प्रेसिडेंट अरविंद मेहरोत्रा ने सेल्फ सर्विस प्रोपगेशन यूजिंग डिजिटल एसेट फॉर कस्टमर्स ऐंड इंसाइड द आर्गेनाइजेशन विषय पर बताया कि कैसे सोशल मीडिया की मदद से औद्योगिक संस्थाएं कंज्यूमर्स की भावनाओं को प्रभावित कर रही हैं। गूगल कंज्यूमर मार्केटिंग के हेड गुनीत सिंह ने गूगल द्वारा अपनाए जा रहे न्यू मीडिया और एडवरटाइजिंग स्ट्रैटेजी की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कराया। आइएमआइ दिल्ली की प्रो. डॉ. नीना सोंधी ने वर्चुअल व‌र्ल्ड में कस्टमर्स को इंगेज करने के उपायों पर रोशनी डाली। कॉन्फ्रेस में कॉर्पोरेट जगत से एमएमटीसी, आइएमआरबी, जेपी होटल्स, जेपी ग्रीन्स, जेपी सीमेंट, जेआइएलआइटी ऐंड जेपी कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन आदि के प्रतिनिधि शामिल हुए।

Thursday, 3 July 2014

अब पैरा मेडिकल में बना सकते है ब्राइट फ्यूचर

भारत में पैरा मेडिकल का क्षेत्र तेजी से ग्रोथ कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, 2020 तक इस क्षेत्र में 90 लाख प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। आप बायोलॉजी के स्टूडेंट्स हैं और इस ग्रोइंग फील्ड में करियर बनाना चाहते हैं, तो आपका फ्यूचर ब्राइट हो सकता है?
आज भारत हेल्थकेयर सेक्टर में हॉट डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है। दुनियाभर से लोग यहां मेडिकल चेकअप और इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इस कारण जिस रफ्तार से हॉस्पिटल्स और लैब्स की संख्या बढ़ रही है, उसी अनुपात में पैरा मेडिकल प्रोफेशनल्स की डिमांड भी बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में वर्ष 2015 तक 60 लाख से अधिक और वर्ष 2020 तक 90 लाख पैरा मेडिकल प्रोफेशनल्स की जरूरत पड़ेगी। योजना आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को लगभग 10 लाख नर्सो और बड़ी संख्या में पैरा मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी झेलनी पड़ रही है। हालांकि पैरा मेडिकल के तहत बहुत सारे प्रोफेशन आते हैं, लेकिन इसमें मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी को काफी हॉट प्रोफेशन माना जा रहा है। आज मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजिस्ट की डिमांड निजी क्षेत्र के हॉस्पिटल्स के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र के हॉस्पिटल्स में भी खूब हैं।
कैसे होगी एंट्री?
आज लैब टेक्नोलॉजिस्ट के रूप में करियर बनाने के लिए कई रास्ते खुल गए हैं। आप चाहें, तो इससे संबंधित कोर्स, जैसे- सर्टिफिकेट इन मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी (सीएमएलटी), बीएससी मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी (बीएससी एमएलटी), डिप्लोमा इन मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी (डीएमएलटी) जैसे कोर्स कर सकते हैं। इस बारे में दिल्ली पैरा मेडिकल ऐंड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की प्रिंसिपल अरुणा सिंह का कहना है कि मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजी कोर्स के तहत स्टूडेंट्स को ब्लड, यूरिन आदि के अलावा शरीर के तमाम फ्लूइड्स की जांच में ट्रेंड किया जाता है। आमतौर पर इस तरह के कोर्स 12वीं के बाद किए जा सकते हैं। डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश के लिए 12वीं में बॉयोलॉजी सब्जेक्ट का होना जरूरी है। डिप्लोमा कोर्स की अवधि दो वर्ष की होती है। वैसे, इस फील्ड में जॉब तो बीएससी या डिप्लोमा करने के बाद भी मिल जाती है, लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के बाद आपकी डिमांड विशेषज्ञ के रूप होने लगती है।
वर्क प्रोफाइल
इस फील्ड में दो तरह के प्रोफेशनल्स काम करते हैं-एक मेडिकल लेबोरेट्री टेक्निशियन और दूसरे मेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजिस्ट। दोनों का वर्क प्रोफाइल अलग-अलग होता है। मुख्य रूप से मेडिकल टेक्निशियन का कार्य सैंपल को टेस्ट करना होता है। यह काफी जिम्मेदारी भरा कार्य होता है। जांच के दौरान थोड़ी-सी गलती किसी के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि डॉक्टर लैब रिपोर्ट के आधार पर ही इलाज और दवा लिखते हैं। टेक्निशियन के काम को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है- नमूना तैयार करना, जांच की मशीनों को ऑपरेट करना एवं उनका रखरखाव और जांच की रिपोर्ट तैयार करना। टेक्निशियन नमूना तैयार करने के बाद मशीनों के सहारे इसे टेस्ट करते हैं और एनालिसिस के आधार पर रिपोर्ट तैयार करते हैं। स्पेशलाइज्ड उपकरणों और तकनीक का इस्तेमाल कर टेक्निशियन सारे टेस्ट करते हैं। वहींमेडिकल लेबोरेट्री टेक्नोलॉजिस्ट रोगी के खून की जांच, टीशू, माइक्रोआर्गनिज्म स्क्रीनिंग, केमिकल एनालिसिस और सेल काउंट से जुड़े परीक्षण करते हैं। टेक्नोलॉजिस्ट का काम भी जिम्मेदारी भरा होता है। ये ब्लड बैंकिंग, क्लिनिकल केमिस्ट्री, इम्यूनोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी के क्षेत्र में काम करते हैं। इसके अलावा, टेक्नोलॉजिस्ट साइटोटेक्नोलॉजी, फेलबोटॉमी, यूरिन एनालिसिस, कॉग्यूलेशन, पैरासीटोलॉजी और सेरोलॉजी से संबंधित परीक्षण भी करते हैं। वर्क एक्सपीरियंस के साथ टेक्नोलॉजिस्ट लैब या हॉस्पिटल में सुपरवाइजर या मैनेजमेंट की पोस्ट तक पहुंच सकते हैं। ट्रेंड टेक्नोलॉजिस्ट लेबोरेट्री मैनेजर, कंसल्टेंट, सुपरवाइजर, हेल्थकेयर ऐडमिनिस्ट्रेशन, हॉस्पिटल आउटरीच कॉर्डिनेशन, लेबोरेट्री इंफॉर्मेशन सिस्टम एनालिस्ट, कंसल्टेंट, एजुकेशनल कंसल्टेंट, कोऑर्डिनेटर, हेल्थ ऐंड सेफ्टी ऑफिसर के तौर पर भी काम कर सकते हैं।
ग्रोइंग फील्ड
भारत मेडिकल टूरिज्म का ग्लोबल हब बन चुका है। यहां पड़ोसी देशों के अलावा, अमेरिका और यूरोपीय देशों के लोग भी सस्ते इलाज के लिए आते हैं। उदारीकरण ने हेल्थकेयर इंडस्ट्री और खासकर मेडिकल टूरिज्म की तरक्की और फलने-फूलने की राह को व्यापक बना दिया है। यह फील्ड 15 फीसदी की दर से आगे बढ़ रही है। वर्ष 2012 में यह इंडस्ट्री 78.6 बिलियन डॉलर की थी, जिसे वर्ष 2017 तक 158.2
बिलियन डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। इस फील्ड में गवर्नमेंट सेक्टर में जॉब वैकेंसीज का इंतजार करना पड़ सकता है, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में ऐसी बात नहीं है। अगर आप चाहें, तो शुरुआत में प्राइवेट लैब के साथ जुड़ कर काम शुरू कर सकते हैं। अगर बीएससी मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट हैं, तो अपना लैब भी खोल सकते हैं। क्वालिफिकेशन और एक्सपीरियंस के बाद टेक्निशियन भी टेक्नोलॉजिस्ट के तौर पर भी काम करना शुरू कर सकते हैं।
पैरा मेडिकल का दायरा
पैरा मेडिकल फील्ड में नसिर्ग के अलावा, मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी, ऑपरेशन थियेटर टेक्नोलॉजी, फिजियोथेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी, कार्डियक टेक्नोलॉजी, डायलिसिस/ रेनल डायलिसिस टेक्नोलॉजी, ऑर्थोटिक और प्रोस्थेटिक टेक्नोलॉजी, ऑप्टोमेट्री, फार्मेसी, रेडियोग्राफी/रेडियोथेरेपी, हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन / मैनेजमेंट, मेडिकल रिकॉर्ड संचालन, ऑडियोलॉजी ऐंड स्पीच थेरेपी, डेंटल हाइजिन ऐंड डेंटल मैकेनिक, डेंटल सेरामिक टेक्नोलॉजी आदि आते हैं।
सैलरी पैकेज
इस फील्ड में काम करने वाले प्रोफेशनल्स की शुरुआती सैलरी 12-20 हजार रुपये प्रतिमाह होती है। अनुभव के बाद सैलरी बढ़ने के साथ-साथ आप अपना लैब भी खोल सकते हैं।

क्या पॉलिटेक्निक है राइट ऑप्शन?

10वीं-12वींके बाद टेक्निकल कोर्स में एडमिशन लेने के इच्छुक स्टूडेंट्स के लिए पॉलिटेक्निक राइट ऑप्शन हो सकता है। वैसे, आज के जॉब मार्केट में पॉलिटेक्निक से जुड़े स्टूडेंट्स की जबरदस्त डिमांड है। आइए जानते हैं, पॉलिटेक्निक में कैसे एडमिशन लिया जा सकता है और क्या हैं इसके फायदे?
स्कूल की दुनिया से बाहर निकलते ही हर साल हजारों स्टूडेंट्स इंजीनियर बनने का सपना देखने लगते हैं, लेकिन कई स्टूडेंट्स महंगी फीस और अच्छे मा‌र्क्स नहीं आने की वजह से बड़े संस्थानों में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का सपना पूरा नहींकर पाते। ऐसे में 12वीं के बाद बीटेक की चार साल की डिग्री की बजाय 10वीं या 12वीं के बाद तीन साल का डिप्लोमा करके भी जॉब मार्केट में कदम रखने का ऑप्शन मौजूद है। ऐसे स्टूडेंट्स के लिए पॉलिटेक्निक सुनहरा अवसर लेकर आता है। यह उन्हें तकनीकी और व्यावसायिक कोर्स का अवसर प्रदान करता है। दरअसल, ये कोर्स ऐसे होते हैं, जिसे पूरा करने के बाद खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए या फिर अच्छी जगह नौकरी करने की स्किल से लैस करता है।
क्या है पॉलिटेक्निक?
आमतौर पर पॉलिटेक्निक ऑ‌र्ट्स और साइंस से संबंधित डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स ऑफर करते हैं। इसे टेक्निकल डिग्री कोर्स के नाम से भी जाना जाता है। पॉलिटेक्निक से संबंधित टेक्निकल कोर्स भी ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) द्वारा संचालित होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य स्टूडेंट्स के प्रैक्टिकल और टेक्निकल स्किल को इंप्रूव करना है। वैसे, पॉलिटेक्निक संस्थान कई तरह के होते हैं। राज्य स्तर पर सरकारी, निजी और महिला पॉलिटेक्निक संस्थान सक्रिय हैं। यहां से आप डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स कर सकते हैं। इसके तहत आमतौर पर फैशन डिजाइन, टेक्सटाइल डिजाइन, इंजीनियरिंग, मास कम्युनिकेशन, इंटीरियर डिजाइन, होटल मैनेजमेंट आदि से जुड़े कोर्स करवाए जाते हैं। कोर्स की अवधि एक से चार साल तक की होती है। इनमें दाखिला पाकर कम समय में ही अपने करियर में पंख लगा सकते हैं। इतना ही नहीं, कोर्स समाप्त होने के बाद जूनियर इंजीनियर बनने का रास्ता भी खुल जाता है। महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों में महिलाओं पर केंद्रित स्किल वाले कोर्स होते हैं।
क्वालिफिकेशन
इस कोर्स में दाखिले के लिए 10वीं में कम से कम 50 फीसदी अंकों के साथ पास होना जरूरी है। ऐसे
स्टूडेंट्स आगे चलकर बीटेक के लिए होने वाली परीक्षा में भी शामिल हो सकते हैं। उन्हें तीन साल के कोर्स के बाद डिग्री भी मिल जाती है। 10वीं पास स्टूडेंट्स को राज्य स्तर पर कई संस्थान मेरिट के आधार पर तो कई राज्य स्तरीय संस्थान कॉमन एंट्रेंस एग्जाम के जरिए दाखिला देते हैं। इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने वाले स्टूडेंट्स चाहें, तो आगे पढ़ाई करके बीटेक की डिग्री भी हासिल कर सकते हैं। इंजीनियरिंग कॉलेजों में ऐसे स्टूडेंट्स को लैटरल एंट्री के तहत दाखिला दिया जाता है।
खूब है डिमांड
श्रीवेंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी के चांसलर सुधीर गिरि के मुताबिक, सरकारी हो या फिर प्राइवेट सेक्टर्स, हर जगह जूनियर इंजीनियर्स की जबरदस्त डिमांड है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में लाखों डिप्लोमा होल्डर्स जूनियर इंजीनियर्स की जरूरत होगी। पॉलिटेक्निक कई लिहाज से फायदेमंद है। सबसे अहम बात यह है कि पॉलिटेक्निक में दाखिला लेने के लिए किसी बड़े एजुकेशनल क्वालिफिकेशन की जरूरत नहीं है। देखा जाए तो, आज पॉलिटेक्निक से डिप्लोमा करने के बाद कंपनियों और संस्थानों में कई तरह के अवसर उपलब्ध हैं। बड़ी बात यह है कि उन्हें कंपनियों में आम प्रोफेशनल्स की तुलना में अच्छी सैलरी और सुविधाएं ऑफर की जाती हैं।
सैलरी पैकेज
पॉलिटेक्निक डिप्लोमाधारी स्टूडेंट्स के लिए नौकरी हासिल करना आसान हो जाता है। पॉलिटेक्निक किए हुए प्रोफेशनल्स की शुरुआती सैलरी 15 से 20 हजार रुपये के बीच होती है। अगर आपने कोर्स के दौरान बेहतरीन परफॉर्म किया है, तो कैंपस इंटरव्यू में ही आपको नौकरी के कई अच्छे ऑफर मिल सकते हैं।
पॉलिटेक्निक के खास कोर्स
मैकेनिकल इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग, पैकेजिंग टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रिकल ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, अप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड इंस्ट्रूमेंटेशन, कम्प्यूटर इंजीनियरिंग, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी,माइनिंग इंजीनियरिंग, मेटलॉर्जिकल इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी, केमिकल इंजीनियरिंग, केमिकल इंजीनियरिंग इन प्लास्टिक ऐंड पॉलिमर्स, पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग, लेटर टेक्नोलॉजी, प्रिटिंग टेक्नोलॉजी, फुटवियर टेक्नोलॉजी, आर्किटेक्चर कोर्सेज, एयरक्राफ्ट मेंटिनेंस इंजीनियरिंग, मास कम्युनिकेशन, इंटीरियर डिजाइनिंग, होटल मैनेजमेंट, कॉमर्शियल ऐंड फाइन आर्ट, मास कम्युनिकेशन, इंटीरियर डिजाइन, ऑफिस मैनेजमेंट ऐंड कम्प्यूटर ऐप्लिकेशन, कम्प्यूटर साइंस आदि।

ऐसे बनाएं फायर इंजीनियरिंग में अपना करियर

अगर आपको 'आग' से खेलना पसंद है, तो फायर इंजीनियरिंग को करियर के रूप में अपना सकते हैं। इस फील्ड में जॉब ऑप्शंस भी शानदार हैं। इंटरनेशनल फायरफाइटर्स डे के मौके पर जानते हैं कैसे इस फील्ड में एंट्री की जा सकती है..
आमतौर पर गर्मी के महीनों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। वैसे, ऊंची-ऊंची इमारतें, बड़े-बड़े मॉल्स आदि भी आग से पूरी तरह सुरक्षित नहींहैं। यदि आग अनियंत्रित हो जाए, तो काफी नुकसान भी उठाना पड़ता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए फायरफाइटर्स की जरूरत होती है। इस तरह के प्रोफेशनल्स फायर इंजीनियरिंग से जुड़े लोग होते हैं, जो जानते हैं कि आग को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।
क्वालिफिकेशन
फायर इंजीनियरिंग से जुड़े अधिकांश कोर्स ग्रेजुएट स्तर पर उपलब्ध हैं, जिसके लिए साइंस सब्जेक्ट से बारहवीं पास होना जरूरी है। फायर इंजीनियरिंग से रिलेटेड सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स भी कर सकते हैं। कोर्स के दौरान आग बुझाने के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी जाती हैं। साथ में, बिल्डिंग निर्माण के बारे में भी बताया जाता है, ताकि आग लगने की स्थिति में उसे बुझाने में ज्यादा परेशानी न हो। इसमें फिजिकल फिटनेस के मा‌र्क्स भी जोड़े जाते हैं। पुरुष के लिए 50 किलो के वजन के साथ 165 सेमी. लंबाई और आईसाइट 6/6, सीना सामान्य रूप से 81 सेमी. और फुलाने के बाद 5 सेमी. फैलाव होना जरूरी है। महिला का वजन 46 किलो और लंबाई 157 सेमी और आईसाइट 6/6 होनी चाहिए।
कोर्सेज
-बीई फायर इंजीनियरिंग।
-बीटेक फायर ऐंड सेफ्टी इंजीनियरिंग।
-सर्टिफिकेट कोर्स इन फायर ऐंड सेफ्टी इंजीनियरिंग (सीएफएसई)।
-डिप्लोमा इन फायर ऐंड इंडस्ट्रियल सेफ्टी इंजीनियरिंग।
-डिप्लोमा इन फायर ऐंड सेफ्टी इंजीनियरिंग मैनेजमेंट (डीएफएसइएम)।
-डिप्लोमा इन फायर ऐंड सेफ्टी इंजीनियरिंग 8डिप्लोमा इन फायर इंजीनियरिंग।
-डिप्लोमा इन इंडस्ट्रियल सेफ्टी इंजीनियरिंग।
-पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन फायर ऐंड सेफ्टी इंजीनियरिंग।
फायर इंजीनियर्स का वर्क।
फायर इंजीनियर्स का कार्य काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसके लिए साहस के साथ-साथ समाज के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी है। फायर इंजीनियर का कार्य इंजीनियरिंग डिजाइन, ऑपरेशन और मैनेजमेंट से संबंधित होता है। फायर इंजीनियर की प्रमुख जिम्मेदारी दुर्घटना के समय आग के प्रभाव को खत्म करना या फिर सीमित करना होता है। इसके लिए वे अग्निसुरक्षा के विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। अग्निशमन के आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल और उसके रखरखाव की तकनीक में सुधार करना भी इनकी ही जिम्मेदारी होती है।
जॉब प्रोफाइल
इस फील्ड में आप असिस्टेंट, सेफ्टी इंस्पेक्टर, सेफ्टी इंजीनियर, सेफ्टी ऑफिसर, सेफ्टी सुपरवाइजर, फायर प्रोटेक्शन टेक्नीशियन, सेफ्टी ऑडिटर, फायर सुपरवाइजर, हेल्थ असिस्टेंट, एनवायरनमेंट ऑफिसर, फायर ऑफिसर आदि के रूप में काम कर सकते हैं।
जॉब ऑप्शन
फायर इंजीनियरिंग से जुड़े लोगों के लिए गवर्नमेंट और पब्लिक सेक्टर में काफी संभावनाएं हैं। इस फील्ड सेजुड़े प्रोफेशनल्स रेलवे, एयरफोर्ट ऑथॉरिटी ऑफ इंडिया, डिफेंस, इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, ओएनजीसी, माइंस, रिफाइनरिज, पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स आदि में जॉब की तलाश कर सकते हैं। सैलरी पैकेज
जूनियर या असिस्टेंट फायर इंजीनियर की शुरुआती सैलरी 10-25 हजार रुपये प्रतिमाह हो सकती है।
प्राइवेट सेक्टर में कुछ वर्ष का वर्क एक्सपीरियंस रखने वाले प्रोफेशनल्स को वरीयता मिलती है और सैलरी काबिलियत के अनुसार मिलती है।

बढ़ती डिमांड में एनर्जी इंजीनियरिंग

भारत में एनर्जी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए गवर्नमेंट के साथ-साथ प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां भी कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। ऐसे में एनर्जी इंजीनियरिंग से जुड़े प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ने लगी है। क्या है इस फील्ड में संभावनाएं?
बायोफ्यूल की लगातार घटती क्वांटिटी और देश में एनर्जी की बढ़ती डिमांड को देखते हुए एनर्जी प्रोडक्शन पर बल देना सरकार की प्राथमिकता बन गई है। इस सोच के तहत साल 2050 तक न्यूक्लियर रिएक्टर्स से कुल एनर्जी प्रोडक्शन का करीब 25 फीसदी हिस्सा पैदा करने लॉन्ग टर्म प्लान तैयार किया गया है। इसी क्रम में 2020 तक बीस हजार मेगावाट इलेक्ट्रिसिटी का एक्स्ट्रा प्रोडक्शन न्यूक्लियर एनर्जी रिसोर्सेज से किया जाएगा। एनर्जी मिनिस्ट्री के मुताबिक, आगामी पांच साल में इस फील्ड में करीब पांच लाख करोड़ रुपये का निवेश करना होगा, तभी बढ़ती एनर्जी जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। न सिर्फ देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां बल्कि दुनिया भर की तमाम बड़ी न्यूक्लियर रिएक्टर सप्लायर कंपनियां, जैसे- जीई हिटैची, वेस्टिंग हाउस भी इस ओर नजरें गड़ाए बैठी हैं। ऐसे में एनर्जी इंजीनियर की मांग का बढ़ना स्वाभाविक है।
एलिजिबिलिटी
एनर्जी इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक करने के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमैटिक्स के साथ 12वीं पास होना जरूरी है। इसमें बीटेक करने के बाद एमटेक भी किया जा सकता है। ज्यादातर इंस्टीट्यूट्स में एडमिशन एंट्रेस एग्जाम से होता है। वैसे, यह ग्रेजुएट लेवल के मुकाबले पोस्ट ग्रेजुएट लेवल पर ज्यादा सक्सेज माना जाता है। मास्टर्स कोर्स में एनर्जी के रिन्यूएबल सोर्स और नॉन ट्रेडिशनल सोर्सेज में सुधार पर अधिक बल दिया जाता है।
स्किल्स
सफल एनर्जी इंजीनियर बनने के लिए लॉजिकल और एनालिटिकल होना बहुत जरूरी है। इस फील्ड में बहुत अधिक लोगों से संपर्क करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसलिए एक इंट्रोवर्ट स्टूडेंट भी आसानी से एनर्जी इंजीनियर बन सकता है। अक्सर कई-कई दिनों तक घर से बाहर जाने की जरूरत पड़ती है, इसलिए घर से दूर रहने की भी आदत होनच् चाहिए। इसके अलावा आपमें पेशेंस भी होना चाहिए।
अपच्ॅ‌र्च्युनिटी
क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग के बारे में बढ़ती जागरूकता के चलते एनर्जी इंजीनियरिंग की बहुत डिमांड है। सरकारी संस्थानों, खासकर राज्यों की रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसीज में स्किल्ड लोगों की जबरदस्त डिमांड है। सरकार ने इंडस्ट्रीज के लिए एनर्जी ऑडिटिंग, एनर्जी कंजर्वेशन और एनर्जी मैनेजमेंट में स्पेशलाइजेशन करने वालों के अप्वाइंटमेंट को भी अनिवार्य कर दिया है। इस फील्ड में सैलरी ऑर्गेनाइजेशन पर निर्भर करती है। शुरुआती दौर में आपकी सैलरी 20-30 हजार रुपये प्रतिमाह हो सकती है।

Monday, 13 January 2014

साइन लैंग्वेज में भी रोजगार

अगर देश-विदेश में मूक बधिर युवाओं को उनकी भाषा में ज्ञान देना चाहते हैं, उन्हें पढ़ा-लिखाकर समाज की मुख्यधारा में ले जाना चाहते हैं तो इसके लिए साइन लैंग्वेज पर पकड़ होनी जरूरी है। यह भाषा सिर्फ मूक- बधिर बच्चों के लिए ही नहीं है, उन लोगों के लिए भी जरूरी है जो उन्हें पढ़ाना और उनके दुख-दर्द में शामिल होना चाहते हैं
दिल्ली विविद्यालय के समान भागीदारी यानी ‘इक्वल ऑपरच्युनिटी’ से ल ने अपने यहां मूक-बधिर लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर इससे जुड़ा कोर्स तैयार किया है। इसमें मूक बधिर के अलावा सामान्य छात्रों को भी दाखिला दिया जाता है। तीन से चार माह के इस कोर्स के अलावा, विकलांग वर्ग से जुड़े कई और कोर्स भी हैं जिन्हें पूरा करने के बाद रोजगार की राह अख्तियार कर सकते हैं। सामान्य लीक से हटकर चलने वाले ये शॉर्ट टर्म कोर्स हैं जिनकी जरूरत जीवन में हर किसी को पड़ती है। इन कोर्सेज में जनवरी-फरवरी में दाखिले की प्रक्रिया चलेगी। इसके बाद पहले सप्ताह से कक्षाएं होंगी। साइन लैंग्वेज : बधिर और विकलांग छात्रों को इस कोर्स में विभिन्न प्रतीकों की जानकारी दी जाएगी। उसके इस्तेमाल की विधि बताई जाएगी।
सभी कोर्स दो से चार माह के हैं। इनमें दो बजे के बाद कक्षाएं आयोजित की जाएंगी। यहां आर्थोपेडिक्स और विजुअल्स के लिए कम्प्यूटर लैब और अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई गई हैं। इन कोसरे में पहले विकलांग, सामान्य वर्ग और एससी, एसटी छात्रों को भी दाखिला दिया जाएगा। ध्यान रहे, साइन लैंग्वेज में सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए भी दाखिले के दरवाजे खुले हैं। कोर्स के तहत बेसिक और एडवांस लेवल की जानकारी अलग- अलग चरणों में दी जाती है। उन्हें ज्ञान-विज्ञान की दुनिया से जुड़ने के लिए संकेतों के माध्यम से गहन अध्ययन भी कराया जाता है। इस कोर्स में 20 सीटें हैं। इस माध्यम में छात्रों को पढ़ाई के दौरान आवश्यक अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है। कम्युनिकेटिव इंग्लिश : यह कोर्स विकलांग छात्रों को इंग्लिश बोलने की कला और उसके लिए आवश्यक गुण सिखाएगा। ऐसे छात्रों को ही ध्यान में रखकर यह कोर्स तैयार किया गया है। अगर पर्याप्त संख्या में छात्र आते हैं तो उनके लिए यह कोर्स संस्थान चलाता है। आईसीटी : इसका मतलब है इनफॉम्रेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी। इसके तहत दृष्टिहीन छात्रों को चार-पांच माह में कम्प्यूटर पर अपना सॉफ्टवेयर इस्तेमाल में कैसे लाना है, इसकी लैब में ट्रेनिंग दी जाएगी। कम्प्यूटर का इस्तेमाल आज रोजमर्रा की जिंदगी में हर जगह हो रहा है। ऐसे में यह कोर्स विकलांग वर्ग के छात्रों के लिए खासा फायदेमंद है। ह्यूमन राइट फॉर डिसएबिलिटीज : यह कोर्स ज्ञान पर आधारित है। इसमें विकलांग छात्रों को आज के समय में उनके अधिकारों से अवगत कराया जाएगा। उनके सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक अधिकार क्या हैं, उनके इस्तेमाल के बारे में भी बताया जाएगा। विश्वभर में विकलांगों से जुड़ी संस्थाएं खासकर एनजीओ में काम करने के लिए यह कोर्स खासा उपयोगी है। मास मीडिया : यह कोर्स दिल्ली विविद्यालय में चलने वाले अन्य कॉलेजों के कोसरे से इस मायने में अलग है क्योंकि इसमें विकलांग छात्रों को न्यूज रीडिंग और एंकरिंग सिखाई जाएगी। अगर विकलांग छात्रों के बाद सीटें बचती हैं तो उस पर एससी, एसटी और अन्य छात्रों के दाखिले पर विचार किया जाता है। ब्रेल लिपि रीडिंग एंड राइटिंग : यह कोर्स ऐसे छात्रों के लिए है जो ब्रेल लिपि सीखने-सिखाने में रुचि रखते हैं। चाहे वे सामान्य वर्ग के हों या विकलांग कैटेगरी के। इस कोर्स की फीस दो हजार रुपये है। फीस : इस तरह के कोर्स की फीस पांच सौ से एक हजार रुपये के बीच है। छात्रों को इस दौरान लैब में कम्प्यूटर ट्रेनिंग और अध्ययन संबंधी सामग्री भी मुहैया कराई जाती है। लाइब्रेरी में पढ़ने का भी मौका दिया जाता है। छात्र इस कोर्स को अपने रेगुलर कोर्स के साथ-साथ कर सकते हैं। कक्षाएं पार्ट टाइम के रूप में आयोजित की जाती हैं। कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें डीयू के समान अवसर सेल की ओर से सर्टिफिकेट दिया जाएगा।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी विपिन तिवारी के मुताबिक, साइन लैंग्वेज सीखकर सामान्य छात्र भी मूक-बधिर छात्रों के अध्ययन- अध्यापन से जुड़कर न सिर्फ समाज सेवा कर सकते हैं बल्कि रोजगार भी पा सकते हैं। ऐसे छात्रों को स्कूलों में अध्यापक के तौर पर रखा जाता है। कई स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसे युवाओं की मदद लेती हैं। बदले में उन्हें शुरुआती तौर पर 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह वेतनमान भी दिया जाता है। देश-विदेश में उन्हें कई जगह काम करने का मौका मिल सकता है। संस्थान उन्हीं कोर्स को चला पाता है जिनमें पर्याप्त संख्या में छात्र दाखिला लेते हैं।
कोर्स के दाखिले की प्रक्रिया जनवरी-फरवरी में शुरू
प्रियंका कुमारी
With thanks of sahara group

किस फील्ड में आपको करियर बनाना है

यदि आप इस साल इंटरमीडिएट या बारहवीं की परीक्षा दे रहे हैं तो किस फील्ड में आपको करियर बनाना है, इसे लेकर गंभीर विचार-विमर्श कर रहे होंगे या फिर फैसला ले चुके होंगे। प्रतिस्पर्धा की इस अंधी दौड़ में यह बात जानना अति आवश्यक है कि आने वाले समय में कौन- सा फील्ड ग्रोथ कर रहा है और किससे जुड़ी डिग्री हमें करियर में आगे ले जाएगी और हमें पद, पैसा और शोहरत देगी। इस वक्त कई डिग्रियां काफी हॉट हैं और कई डिग्रियां ऐसी भी हैं जिन्हें हासिल करने के बाद उन्हें कोई नहीं पूछता। नियंतण्र तौर पर आने वाले समय में हॉट रहने वाली हिग्री
बैचलर इन फाइनेंस कुछ लोगों का कहना है कि दुनिया गोल है लेकिन बिजनेस लीडर का मानना होता है कि यह सिर्फ पैसों में होता है। आज के दौर में फाइनेंस की डिग्री काफी अहम हो गई है और इससे जुड़े लोगों की मांग नियंतण्र तौर पर है। मालूम हो कि फाइनेंस का अध्ययन करने के बाद आप सिर्फ यह नहीं जानते कि आप फाइनें स से जुड़े मामलों को किस तरह एनालिसिस करें गे बल्कि आप उन बातों को भी जानते हैं कि कहां किस तरह पैसों को इनवेस्ट किया जाए। कोर्स : इस फील्ड में आने के लिए आपके पास फाइनेंस से संबंधित डिग्री होनी चाहिए। इसके लिए इनवेस्टमेंट, इंटरनेशनल फाइनेंस, फाइनेंशियल मैनेजमेंट आदि से संबंधित डिग्री काफी फायदेमंद होती है। करियर : फाइनेंस से संबंधित डिग्री हासिल करने के बाद फाइनेंशियल एनालिस्ट और इसके समकक्ष कई और नौकरी भी कर सकते हैं।
बैचलर इन कम्प्यूटर साइंस कम्प्यूटर साइंस के फील्ड का जबर्दस्त ग्रोथ हो रहा है। इस फील्ड में काम करने वालों को वेतन के साथ-साथ काफी शोहरत भी है। इसके पीछे का कारण यह है कि विभिन्न नौकरियों में भर्ती से लेकर मार्केटिंग, नेटवर्किग, सेल, डिलीवरिंग जैसी सेवाओं में भी कम्प्यूटर साइंस की डिग्री हासिल करने वाले लोगों की जबर्दस्त मांग है। इस डिग्री के तहत कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, कम्प्यूटर लैंग्वेज और नेटवर्क डिजाइन और इंजीनियरिंग जैसे विषयों का अध्ययन करना होता है। कोर्स : इस फील्ड में आने के लिए आपके पास कम्प्यूटर साइंस की डिग्री होनी चाहिए। हालांकि डिजिटल सिस्टम डिजाइन, सॉ फ्टवेयर इंजीनियरिं ग, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के अलावा थ्योरी ऑफ फॉर्मल लैंग्वेज आदि से संबंधित डिग्री भी फायदेमंद रहती है। नौकरी : इस विषय की डिग्री हासिल करने के बाद आप सॉफ्टवेयर डेवलपर के अलावा और भी कई फील्ड हैं जहां नौकरी मिल सकती है।
बैचलर इन मार्केटिंग किसी भी बिजनेस की सफलता उसकी मार्केटिंग पर निर्भर करती है क्योंकि यह किसी भी बिजनेस की रीढ़ होती है। माना जाता है कि मार्केटिंग की थोड़ी सी भी जानकारी व्यर्थ नहीं जाती। इस फील्ड में हमेशा योग्य लोगों की जरूरत होती है। सोशल मीडिया के आने से मार्केटिंग से जुड़े फील्ड का विस्तार हुआ है और इस फील्ड में वैसे लोगों की जबर्दस्त मांग है जिनमें लिखने, कम्युनिकेशन और इंटरपर्सनल स्किल्स अच्छी है। मार्केटिंग में डिग्री हासिल करने वालों को मार्केट रिसर्च, ब्रांडिंग, मार्केटिंग स्ट्रेटजी और प्रोडक्ट लाइफ साइकिल के अलावा वेब और ग्राफिक डिजाइनिंग की जानकारी भी हासिल करनी होती है। कोर्स : इस फील्ड में आने के लिए एडवरटाइजिंग और प्रमोशन, इंटरनेशनल मार्केटिंग, मार्केटिंग मैनेजमेंट और कन्ज्यूमर बिहेवियर से संबंधित डिग्री हासिल करनी आवश्यक है। नौकरी एडवरटाइजिंग, प्रमोशंस या मार्केटिंग मैनेजर आदि जैसे पदों पर आप काम कर सकते हैं। इन पदों पर नौकरी के लिए आपके पास बैचलर या डिप्लो मा की डिग्री होनी चाहिए। फाइनेंस, एकाउंटिंग, मै नेजमें ट, स्टेटिस्टिक्स और बिजनेस लॉ की डिग्री इस फील्ड में आगे बढ़ने में मदद करेगी।
बैचलर इन एकाउंटिंग फाइनेंस की तरह एकाउंटिंग की डिमांड की भी जबर्दस्त डिमांड है क्योंकि किसी भी बिजनेस में फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन के ट्रैक और उसकी समीक्षा करने की जरूरत होती है। विश्व के तमाम देशों में एकाउंटिंग को लेकर अलग- अलग नियम बन रहे हैं जिन्हें जानना आवश्यक है क्योंकि यदि आपकी चाहत नियंतण्र तौर पर काम करने की है, तो ये कानून आपको जानने होंगे। कोर्स : एकाउंटिंग इनफॉम्रेशन सिस्टम, बिजनेस लॉ, कॉस्ट एकाउंटिंग, टैक्स एकाउंटिंग और ऑडिट से संबं धित डिग्री काफी फायदेमंद होता है। नौकरी : एकाउंटेंट या ऑडिटर के पद पर इससे संबंधित कोर्स करने के बाद नौकरी की जा सकती है। इनके जिम्मे फाइनेंशियल रिकॉर्ड, टैक्स भुगतान आदि के रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी होती है। इस फील्ड में आने वाले अधिकतर लोगों के पास एकाउंटिंग में बैचलर डिग्री होती है।
बैचलर इन हेल्थकेयर एडमिनिस्ट्रेशन आज के समय में हेल्थकेयर मैनेजमेंट में बैचलर डिग्री हासिल करने वालों की मांग पूरी दुनिया में है क्योंकि हेल्थकेयर का क्षेत्र दिनोंदिन काफी व्यापक हो रहा है। इससे संबंधित डिग्री हासिल करने के बाद इस फील्ड में एकाउंटिंग से लेकर टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग आदि की जानकारी हासिल करते हैं। को र्स : हेल्थकेयर से संबंधित कोर्स करने के दौरान आप एकाउंटिंग, हेल्थकेयर एथिक्स, ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट, एनटॉमी और फिजियोलॉजी आदि की जानकारी प्राप्त करते हैं। इस फील्ड में आने वालों के लिए हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन में बैचलर डिग्री काफी फायदेमंद होती है। नौकरी : संबंधित डिग्री हासिल करने के बाद आप बतौर मेडिकल हेल्थ सर्विस मैनेजर काम कर सकते हैं। ये वे प्रोफेशनल्स हैं जो डॉक्टर, नर्स और दूसरे हेल्थकेयर स्टाफ से सीधे जुड़े होते हैं। इनके जिम्मे किसी भी अस्पताल में सुचारु रूप से विभिन्न विभागों का संचालन होता है।
बैचलर इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में बैचलर डिग्री हासिल करने वाले लोगों के लिए भविष्य में काफी संभावनाएं हैं। इस डिग्री को हासिल करने के बाद यदि कोई थोड़ा- बहुत अनुभव प्राप्त कर लेता है तो उन्हें मार्केट हाथोंहाथ लेता है। को र्स : इस फील्ड में आने के लिए आपको एकाउंटिंग, ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट, ऑपरेशंस मैनेजमेंट और फाइनेंशियल मैनेजमेंट में से किसी की भी बैचलर, मास्टर या फिर डिप्लोमा की डिग्री हासिल करनी होगी। नौकरी : बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करने के बाद आप पर्सनल फाइनेंशियल एडवाइजर के तौर पर कार्य कर सकते हैं। उनके जिम्मे किसी कंपनी को फाइनेंशियल डिसीजन मसलन टैक्स, इनवेस्टमेंट और इंश्योरेंस आदि को लेकर सलाह देना और उसे कार्यान्वित कराना होता है। बिजनेस, फाइनेंस, इकोनॉमिक्स, एकाउं टिंग, मैथमेटिक्स और लॉ से संबंधित डिग्री काफी कारगर होती है।
With thanks of sahara group.

Tuesday, 24 December 2013

आयशा अजीज, क्वीन ऑफ स्काई

आयशा अजीज कोई आम लडकी नहीं हैं। 17 साल की उम्र में वह एक उडनपरी बन चुकी हैं। आसमान में उडती हैं और अपने ड्रीम को अचीव करने के लिए बुलंद इरादे रखती हैं। जिस एज में बाकी यंगस्टर्स फ्यूचर की प्लानिंग करने में लगे होते हैं, आयशा ने महज पंद्रह साल की उम्र में बॉम्बे फ्लाइंग क्लब से स्टूडेंट पायलट लाइसेंस हासिल कर लिया था। आज इनके पास फ्लाइट रेडियो टेलीफोन ऑपरेटर का भी लाइसेंस है। ये इंडियन वूमन पायलट एसोसिएशन की मेंबर हैं और कमर्शियल पायलट बनने के लिए कडी मेहनत कर रही हैं।
ड्रीम ऑफ फ्लाइंग
आयशा का जन्म भले ही मुंबई में हुआ, लेकिन कश्मीर से उनका एक खास कनेक्शन रहा है। इनकी मां कश्मीर के बारामूला की रहने वाली थीं। जिस कारण आज भी अक्सर इनका कश्मीर आना-जाना होता है। आयशा कहती हैं, जब भी मैं मुंबई से कश्मीर जाती थी, तो मुझे आसमान में प्लेन को उडते देखना, एयरपोर्ट पर एरोप्लेंस को आते-जाते देखना फैसिनेट करता था। धीरे-धीरे ये फीलिंग एक पैशन बन गया और मैंने डिसाइड कर लिया कि पायलट ही बनना है। आयशा ने बताया कि वे 8वीं क्लास में थीं, तभी उनका विजन क्लियर था कि आगे क्या करना है। इसलिए फोकस होकर तैयारी की। स्टडीज इंपॉर्र्टेट थी, सो स्कूल में पढाई करते हुए बॉम्बे फ्लाइंग क्लब में 4 महीने की ट्रेनिंग शुरू कर दी। क्लब में आयशा सबसे कम उम्र (15 साल के करीब) की पायलट थीं, इसलिए सभी उनकी काफी हौसलाअफजाई करते थे। इस तरह वे आगे बढती गईं।
स्कूलिंग के साथ ट्रेनिंग
आयशा ने 2013 में मुंबई के क्राइस्ट चर्च स्कूल से हायर सेकंडरी किया है, लेकिन नवंबर 2011 में ही इन्होंने स्टूडेंट पायलट लाइसेंस का एग्जाम पास कर लिया था। इसके बाद आयशा ने दूसरा एग्जाम भी क्लियर किया और बॉम्बे फ्लाइंग क्लब से एफआरटीओएल का लाइसेंस हासिल किया। आयशा अब तक 30 घंटे से ज्यादा समय तक सेसना 172-आर प्लेन उडा चुकी हैं।
नासा में लाइफ टाइम एक्सपीरियंस
आयशा को सिर्फ विमान उडाने का क्रेडिट नहीं जाता है, बल्कि 16 साल की उम्र में वे नासा में ट्रेनिंग कर चुकी हैं। जब वे स्कूल में थीं, तो नासा के स्पेस ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए सेलेक्शन हुआ था। आयशा कहती हैं, इट वाज वंस इन अ लाइफ टाइम एक्सपीरियंस। आयशा ने नासा के स्पेस एकेडमी हंट्सविल के स्पेस शटल मिशन में दो महीने माइक्रोग्रैवेटी, मैन मनूवियरिंग यूनिट, मल्टी एक्सिस ट्रेनिंग, एक्स्ट्रा वेहिक्यूलर एक्टिविटी, स्कूबा डाइविंग, मून वॉक, स्पेस शॉट की ट्रेनिंग ली है, लेकिन उनका सबसे मेमोरेबल मोमेंट सुनीता विलियम्स से मिलना रहा। आयशा कहती हैं, इट वाज अ ड्रीम कम ट्रु। मैंने उनसे एविएशन और स्पेस में करियर से रिलेटेड टिप्स लिए। उन्होंने मेरा काफी हौसला बढाया और कहा कि छोटी उम्र में मैंने बहुत अच्छा काम किया है, जो दूसरी ग‌र्ल्स के लिए मिसाल है।
करियर इन एविएशन
आयशा एविएशन सेक्टर में काम करना चाहती हैं। इसीलिए बॉम्बे फ्लाइंग क्लब से एविएशन में बीएससी कर रही हैं। इसके अलावा, कमर्शियल पायलट लाइसेंस के एग्जाम की तैयारी भी पूरे जोर-शोर से चल रही है। इसमें आयशा को उनकी फैमिली, मां खालिदा अजीज और इंडस्ट्रियलिस्ट पिता अब्दुल अजीज का पूरा सपोर्ट मिलता है। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ हासिल करने वाली आयशा का सपना खुद से प्लेन उडाकर मक्का जाना है। वे कश्मीर भी जाना चाहती हैं।
फॉलो करें ड्रीम
आयशा कहती हैं, आज कश्मीर में लोगों को गर्व महसूस होता है कि उनके यहां की किसी लडकी ने इतना सब कुछ हासिल किया है क्योंकि वहां आज भी जितने पायलट्स हैं, उनमें कोई लडकी नहीं है। आयशा कहती हैं कि मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे ट्रेडिशनल फील्ड्स में करियर बनाने के अलावा एविएशन सेक्टर में लडकियों के लिए काफी ऑप्शंस हैं। वे यंगस्टर्स से अपील करती हैं कि वे अपने ड्रीम को फॉलो करें और अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश करें।

FICTION के बाजीगर

ऑरेन्ज हैंगओवर
जिंदगी की छोटी-छोटी बातें ही एक बडा कैनवास बना देती है, जिसमें इंसान अपने अनुभवों की कूची से ऐसे रंग उकेरता है, जिन्हें लोग देखकर यही कहते हैं कि अरे वाह, ये तस्वीर तो मेरी है। अपनी किताबों में कुछ ऐसी ही कोशिश करते हैं जालंधर के राहुल सैनी।
ऑर्किटेक्ट से राइटर तक
बचपन से ही राहुल आर्किटेक्ट बनना चाहते थे। गुडगांव से 2007 में आर्किटेक्ट में डिग्री लेकर उन्होंने आर्किटेक्ट की जॉब भी शुरू की। करीब दो साल काम करने के बाद उनका मन आर्किटेक्ट फील्ड से उचट-सा गया। जो सपने, जो इरादे और पैशन लेकर वे इस फील्ड में आए थे, वे सब उन्हें छोटे और आर्टिफिशियल लगने लगे। बिल्डिंग्स डिजाइन करते-करते वह बोर हो गए। उन्हें लगा कि इन बेजान और बनावटी चीजों में सिर खपाने से अच्छा है जिंदगी के फलसफे को समझा जाए। आस-पास की जिंदगी की संवेदनाओं को उन्होंने गहराई से महसूस किया। इसके बाद उनकी कल्पनाओं ने आकार लेना शुरू किया, लेकिन किसी बिल्डिंग के रूप में नहीं बल्कि इन बिल्डिंग्स में रहने वाले जीते-जागते इंसानों की जिंदगी के रूप में।
सोचो मत, बस शुरू हो जाओ
राहुल शुरुआत में अपने बिजी शिड्यूल से टाइम निकालकर दिन में दो-तीन घंटे बैठकर लिखने लगे। अब तक जो जुनून डिजाइंस से खेलने का था, वो अब शब्दों से खेलने लगा था। राहुल बताते हैं, हम सब एक ही समाज में रहते हैं, सबकी लाइफ ऑलमोस्ट एक जैसी होती है, लेकिन कुछ बेसिक चीजें हैं, जो हर इंसान को दूसरों से अलग करती हैं। मैं सोचता गया और एक दिन शुरू हो गया लिखना।
क्लैरिटी ऑफ थॉट्स
राहुल कहते हैं, राइटिंग के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है- क्लैरिटी ऑफ थॉट्स। मतलब यह कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है, आप किस पर लिखना चाहते हैं, यह क्लियर होना चाहिए। स्टोरी को धागे की तरह पकडकर चलना पडता है, स्टोरी के ताने-बाने में कैरेक्टर्स को कैसे फिट करना है, क्लाइमेक्स क्या होगा, अच्छा या बुरा और वहां तक स्टोरी को कैसे पहुंचाना है, ये सब इमेजिन करना पडता है।
स्टोरी रिलेटिबल हो
राहुल इस बात का खास ख्याल रखते हैं कि उनकी स्टोरी रिलेटिबल हो। लोग पढें, तो उन्हें लगे कि जैसे उनकी ही स्टोरी हो। राहुल कहते हैं, स्टोरी चाहे जैसी हो, मैंने उसमें ज्यादा फिलॉसफी नहीं डाली, लेकिन बेसिक वैल्यूज हमेशा इनक्लूड करता हूं। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि मैं कुछ ऐसा लिखूं, जिससे पढने वाले को अच्छा लगे।
स्टोरी बिहाइंड स्टोरी
राहुल ज्यादातर टाइम ट्रैवल करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि एक्सपीरियंस के बिना आप नहीं लिख सकते। राहुल बताते हैं, स्टोरी के प्लॉट के लिए मैं लोगों के बीच घूमता हूं, लेकिन जब स्टोरी लिखनी होती है, तब एकदम शांति चाहिए।
स्टोरी हिट करने का फॉर्मूला
बेहतर राइटिंग का कोई शॉर्ट कट नहीं है। आज के दौर में बहुत सी किताबे हैं, जिनमें रियल स्टोरी में रोमांस का मसाला लपेटकर अश्लीलता और ड्रामे की छौंक लगा दी जाती है। ऐसी किताब चल तो सकती है, लेकिन कुछ ही समय तक। अगर आपको लंबी दौड लगानी है, तो आपको कुछ नया लिखना होगा। राहुल की किताबों में भी रियल स्टोरीज ही हैं, लेकिन लिखने का अंदाज फिक्शन का है।
प्रमोशन पर ज्यादा खर्च
राहुल बताते हैं, बुक पब्लिश कराने के लिए आपको पैसे नहीं चाहिए। अगर आपकी किताब पब्लिशर को पसंद आ जाती है, तो वो बिना पैसे लिए पब्लिश कर देगा, लेकिन उसके बाद आपको किताब की पब्लिसिटी पर खर्च करना होगा।
राइटर्स टिप्स
-राइटर वही बन सकता है, जिसमें पैशन और पेशेंस हो।
-फीलिंग्स के साथ फील करके लिखें।
-आम जिंदगी से कनेक्टेड स्टोरी प्लॉट चुनें।
-अपने टारगेट रीडर्स फिक्स करें।
-सराउंडिंग की ऑब्जर्वेशन से स्टोरी और कैरेक्टर्स मिलेंगे।
-लिखने के लिए कोई उम्र नहीं होती, जब चाहे शुरू हो जाएं।
-ऐसा लिखें, जिससे रीडर्स कैरेक्टर से सीधे कनेक्ट हो सकें।
कॉरपोरेट स्टोरी टेलर
रेडियो सिटी 91.1 एफएम की सीईओ अपूर्वा पुरोहित मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की चुनिंदा हस्तियों में शामिल हैं, जिन्होंने जूम टीवी और रेडियो सिटी जैसे ब्रांड्स को स्टैब्लिश करने में बेहद इंपॉटर्ेंट रोल निभाया है, लेकिन कॉरपोरेट रिस्पॉन्सिबिलिटीज के बीच इन्होंने अपने अंदर के राइटर को एक्टिवेट किया और एक ऐसी बुक लिख डाली, जो मार्केट में आते ही बेस्ट सेलर कैटेगरी में शामिल हो गई।
बुक से मैसेज
अपूर्वा के मुताबिक मीडिया इंडस्ट्री में टॉप रैंक पर काम करते हुए उन्होंने पाया है कि कॉरपोरेट व‌र्ल्ड में 30 परसेंट के करीब ही महिलाएं आती हैं। इनमें भी 15 परसेंट मैनेजर लेवल रैंक तक पहुंचते-पहुंचते कंपनी छोड देती हैं। उन्हें लगा कि वूमन प्रोफेशनल्स को मोटिवेट करना चाहिए ताकि वे बीच में काम न छोडें। खासकर जब कॉरपोरेट्स सेक्टर फीमेल एंप्लाइज के लिए काफी कुछ कर रहा हो, तो लेडीज को भी अपने करियर ग्रोथ का ध्यान रखना चाहिए। अपूर्वा कहती हैं कि बुक लिखने के पीछे वजह भी यही है, ताकि एक मैसेज दे सकें कि डोंट गिव अप।
लाइफ ऑफ वर्रि्कग वूमन
अपूर्वा कहती हैं, जब उन्होंने बुक लिखने का डिसीजन लिया, तो पहला ख्याल वर्किंग वूमन का ही आया।‘Lady, You‘Re Not A Man! The adventures of a woman at work (w®vx) नाम की इस किताब में अपूर्वा ने अपने 25 साल के लंबे करियर के ढेरों रियल लाइफ एग्जांपल्स को कहानी की शक्ल दी है। वे कहती हैं, जब उनकी किताब मार्केट में आई, तो सिर्फ प्रोफेशनल वूमन ही नहीं, बल्कि होममेकर्स का भी काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। उन्हें फील हुआ कि मानो उनकी लाइफ ही किताब के जरिए सबके सामने आ गई है।
फ्लाइट में राइटिंग
अपूर्वा कहती हैं, मुझे अक्सर काम के सिलसिले में ट्रैवल करना होता था, तो बस फ्लाइट में लिखना स्टार्ट कर दिया। बाकी वीकेंड्स पर जब भी टाइम मिलता घर पर लिखती। इस तरह चार महीने में बुक को कंप्लीट कर लिया। फिर पब्लिशर को प्रपोजल भेजा और करीब आठ से दस महीने में बुक मार्केट में आ गई।
सक्सेस का जायका
सक्सेस हर किसी की लाइफ में अलग-अलग तरीके से आती है। किसी की लाइफ में इसकी सीधे इंट्री होती है, तो कुछ को इसके लिए थोडा एफर्ट करना पडता है। दिल्ली के राइटर और पब्लिशर सचिन गर्ग की लाइफ में भी सक्सेस ने सीधे इंट्री दी। सचिन ने अपनी फ‌र्स्ट बुक में ही सक्सेस का जायका चखा। सचिन ने ब्लॉग राइटिंग से इस फील्ड में कदम रखा। ब्लॉग पर फें्रंड्स और लोगों के अच्छे कमेंट्स ने उन्हें एक राइटर बनने का हौसला दिया। बल्कि अपने जैसे यंग राइटर्स के लिए इस फील्ड में एक मिसाल भी पेश की।
फ्री टाइम में लिखने की शुरुआत
आमतौर पर हम अपने खाली टाइम को दूसरे कामों में लगा देते हैं, लेकिन सचिन ने अपना वक्त फ्री राइटिंग में बिताया। 2007-08 में उन्होंने पहली बार ब्लॉग से लिखने की शुरुआत की।
सक्सेस स्टेप बाई स्टेप
राइटिंग के हर कदम पर सचिन को सक्सेस मिलती गई। आई ऐम नॉट टिवेंटी फोर का प्रॉपोजल बनाकर पब्लिशर को भेजा, वहां से पॉजिटिव रिप्लाई आ गया। अगस्त 2009 में बुक को जबरदस्त सक्सेस मिली।
स्टोरी कैरेक्टर
एमडीआई से एमबीए करने के बाद सचिन ने कर्नाटक में जॉब की शुरुआत की और उन्हें यहीं से आई ऐम नॉट टिवंटी फोर बुक का कॉन्सेप्ट आया। आई एम नॉट टिवेंटी फोर में सौम्या नाम का फिक्शन कैरेक्टर तैयार किया, जो दिल्ली की है और उसकी जॉब कर्नाटका के एक छोटे से टाउन में स्टील की एक कंपनी में लगी है। जॉब स्टार्ट करने से पहले उसने कुछ डिफरेंट सोचा था, लेकिन यहां आकर वह शॉक हो जाती है। सचिन ने सौम्या के कैरेक्टर को इस अंदाज में इंट्रोड्यूस किया है कि रीडर का पूरे टाइम इंट्रेस्ट बना रहता है।
फुल टाइम करियर
फ‌र्स्ट सक्सेस के बाद सचिन को लगा कि इस पैशन को क्यों न फुलटाइम करियर बना लिया जाए। 2011 में उन्होंने अपना पब्लिशिंग हाउस ओपन किया। दूसरी बुक फ‌र्स्ट लव को उन्होंने अपने पब्लिशिंग हाउस में पब्लिश की। घूमने-फिरने के शौकीन सचिन अपनी बुक में नए-नए एक्सपीरियंस रीडर्स से शेयर करते हैं।
अ ग्लैमरस राइटर
हर रोज सुबह उठना, उठकर तैयार होना, ऑफिस जाना और शाम को फिर घर आकर सो जाना, इस लाइफ से क्या आप सैटिस्फाइड हैं? शायद हों, शायद न भी हों, लेकिन शिकागो में पली-बढी इंडियन ओरिजिन की प्रोफेशनल मॉडल तूलिका मेहरोत्रा नहींथींऔर उन्होंने अपनी टॉप क्लास की कॉरपोरेट जॉब को सिर्फ इसलिए छोड दिया, ताकि वह इस दुनिया को कुछ अच्छा दे सकें।
पैसा ही सब कुछ नहीं
तूलिका लॉस एंजेल्स में कॉरपोरेट जॉब से बुरी तरह बोर हो गई थीं। अपनी उम्र के कई सारे राइटर्स को देखा। कहीं कुछ ऐसा नहीं मिला, जिसमें मॉडर्न इंडिया के बारे में कुछ अच्छा लिखा हो। बस, फिर वह जॉब छोडकर राइटर बन गईं।
पैशन मेक्स मैराथन राइटर
तूलिका अपने डेस्क के अलावा कॉफी शॉप या लाइब्रेरी में लिखती हैं। ऐसा अक्सर होता है कि वह रात भर लिखती ही रह जाती हैं। लिखती है, डिलीट करती हैं, सैकडों लाइंस लिखने के बाद भी कई बार पूरी की पूरी डिलीट करनी पडती है, क्योंकि सैटिफैक्शन नहीं मिलता।
राइटर्स टिप्स
-लाइफ को क्यूरियोसिटी से समझें।
-लाइफ को ऑब्जर्व करने की क्वॉलिटी हो।
-नई-नई बुक्स पढते रहें, खासकर फिक्शन।
-शॉर्ट स्टोरी या नॉवेल जो हो सके, लिखते रहें।
-ऐसा लिखें, जो रीडर्स को डाइजेस्ट हो सके।
-कुछ ऐसा लिखें जो आपने पहले कभी न लिखा हो।
Best seller books
-Delhi Stopover (2012)
-Crashing B-Town (August 2013)USP
-इंडियन व्यू और मल्टीकल्चरल डायवर्सिटी
Favourite writers
-KhalledHosseini, RainbowRowell
लूजर ने दिलाई सक्सेस
ईश्वर ने सभी इंसानों को किसी न किसी टैलेंट से नवाजा है बस जरूरत है उसे पहचानने की। मुंबई के दीपेन अंबालिया ने अपने अंदर के टैलेंट को पहचाना और जॉब के साथ-साथ राइटिंग भी शुरू कर दी। शुरुआती फेल्योर से दीपेन ने हार नहीं मानी और अपने लिखने के शौक को जारी रखा। दीपेन नेLOSER: Life Of a Software EngineeR पर बुक लिखकर बेस्ट सेलर में नाम अपना दर्ज कराया।
स्टार्रि्टग विद ब्लॉग
दीपेन को यह सक्सेस इतनी आसानी से नहीं मिली। दीपेन ने राइटिंग की स्टार्टिंग ब्लॉग लिखने से की। पहला ब्लॉग 6 वेज टू फूल योर बॉसेस लिखा। इस पर फ्रेंड्स से फीडबैक मांगा। सभी से अच्छा फीडबैक मिला। इसकी शुरुआत उन्होंने जॉब में रहते हुए 2008 में की। सॉफ्टवेयर इंजीनियर की लाइफ पर बेस्ड एक बुक 9 हाइफन और दूसरी बुक जिनेश ऑर्कुट बाई पटेल लिखना शुरू किया, लेकिन दोनों बुक पब्लिश नहींहो पाई।
अगेन स्टार्ट ऐंड सक्सेस
दीपेन कहते हैं कि कि जब पहली बुक लिखी तो हार्डडिस्क क्रैश हो गई और डाटा रिकवर नहीं हो पाया। दूसरी बुक लिखी तो पब्लिशर को पसंद नहीं आई। वह कहते हैं, इंसान को कोशिश करते रहना चाहिए। सक्सेस जरूर मिलती है। दीपेन ने तीसरी बुक इन देयर शूज में अलग-अलग 17 कैरेक्टर को उठाया और लाइफ को कैसे फील करते हैं, यह बताने की कोशिश की। इस बुक ने कॉर्मशियल सक्सेस तो नहीं दी, लेकिन यह अहसास दिलाया कि उनमें लिखने का टैलेंट है।
फ‌र्स्ट कॉमर्शियल सक्सेस
लूजर लाइफ ऑफ सॉफ्टवेयर इंजीनियर दीपेन की फ‌र्स्ट कॉमर्शियल सक्सेस है। इस बुक में दीपेन ने आईटी सेक्टर में होने वाली लाइफ को इंट्रोड्यूस किया है। दीपेन की तीसरी बुक टु बी और नॉट टु बी को भी अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। दीपेन स्कॉट एडम को अपना मेंटर मानते हैं।
सीरियल एंटरप्रेन्योर से राइटिंग तक
रितिका सुंदर की तरह डॉ. कांत मिरियाला भी एमएनसी के लिए फुलटाइम बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर काम करते रहे हैं। जॉब छोडने का रिस्क नहींले सकते थे, इसलिए कई स्टार्टअप शुरू किए। इनमें कुछ फेल्योर रहे, जबकि कुछ बेहद सक्सेसफुल। डॉ. कांत ने क्विंटेंट नाम से स्टार्टअप शुरू किया था, जिसे आईगेट कंपनी को 87 करोड रुपये में बेच दिया। ये क्यूआईके नाम की कंपनी में इनवेस्टर थे, जिसे बाद में स्काइप ने 150 मिलियन डॉलर में खरीदा। बाद में डॉ.कांत और रितिका ने एक ऐसी बुक लिखने का फैसला लिया, जिससे कि एक वेंचर के जीरो से लॉन्चिंग तक के एक्सपीरियंस को सबके साथ शेयर किया जा सके।
मैनेजमेंट इन राइटिंग रितिका सुंदर ने आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए करने के बाद बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने फॉर्चून 500 कंपनीज के लिए कई कंसल्टिंग प्रोजेक्ट्स किए। इसके बाद एमएनसी कंपनीज को अपनी सर्विस देने के बाद अभी वे आईटी कंपनी एचसीएल के साथ सीनियर बिजनेस स्पेशलिस्ट के तौर पर जुडी हैं। रितिका का इंट्रोडक्शन सिर्फ इतना भर नहीं है। वे एक सफल राइटर भी हैं। डॉ. कांत मिरियाला के साथ इन्होंने ऐसे लोगों के लिए एक बुक लिखी है जो अपना वेंचर स्टार्ट करना चाहते हैं, लेकिन डिसीजन नहींले पा रहे।
इस बुक का नाम है Entrepreneur 5pm to 9am.
बुक्स से कंपैनियनशिप
रितिका के मुताबिक, उन्हें बचपन से राइटिंग की हॉबी रही है। दस साल की थीं, तब से किताबें पढने का शौक रहा है। गर्मी की छुट्टियों में एक दिन में तीन बुक पढ लिया करती थीं। किताबों की दुनिया उन पर मानो जादू सा कर देती थी। वॉल्डन इनकी ऑल टाइम फेवरेट बुक रही है। इस बुक का एक कोट इन्हें आज भी काफी इंस्पायर करता है, However mean your life is, meet it and live it. वे कहती हैं, बुक्स ने मेरी लाइफ को बनाया है, वैल्यूज समझाए हैं और हमेशा मेरे दोस्त रहे हैं। इन्हीं सारी बातों ने रितिका को मोटिवेट किया कि वे कुछ ऐसा करें जिससे कि दूसरों की लाइफ में मैजिक ला सकें। मन में राइटर बनने का ख्याल आया, लेकिन इससे फाइनेंशियल स्टैबिलिटी नहीं आ सकती थी, इसलिए एजुकेशन कंप्लीट की और जॉब करने लगी।
जॉब के साथ राइटिंग
जॉब के दौरान रितिका ने फील किया कि आज बहुत सारे वर्किंग प्रोफेशनल्स अपनी नौकरी से सैटिस्फाइड नहीं हैं। वे कुछ अपना करना चाहते हैं, जिसमें बॉस की दखलअंदाजी न हो, काम करने की फ्रीडम हो, लेकिन उनके पास ऑप्शन नहीं होता कि कुछ अपने मन की कर सकें। इसके अलावा स्क्रैप से शुरू करने में अक्सर लोग डरते हैं। जॉब छोडने का रिस्क लेना भी इस दौर में ईजी नहीं है। रितिका कहती हैं, इन्हीं बातों का ध्यान में रखकर मैंने डॉ. कांत के साथ किताब लिखने का डिसीजन लिया। वैसे, एक फुलफ्लैच्ड जॉब करने के साथ बुक लिखना कोई ईजी टास्क नहीं है। उसमें भी जब एक राइटर अमेरिका में हो और दूसरा इंडिया में। रितिका ने बताया कि डॉ. कांत फोन और ईमेल के जरिए बुक के लिए कॉन्ट्रिब्यूट करते थे। फाइनल मेनस्क्रिप्ट तैयार होने से पहले कई लोगों का इंटरव्यू किया गया। हर दिन 2 से 3 घंटे लिखना और फिर उसे रिव्यू करना होता था। इस तरह करीब छह महीने की मेहनत के बाद उनकी बुक पूरी हो सकी। रितिका कहती हैं कि जब वे लोग पूरी तरह से सैटिस्फाइड हो गए तो बुक को पब्लिशर के पास भेजा। रूपा पब्लिकेशन को उनका कॉन्सेप्ट क्लिक कर गया और बुक मार्केट में आ गई। पहला एडिशन तो कंप्लीट सेल आउट था। उसके बाद अब दूसरा एडिशन भी आ चुका है।
गाइड फॉर स्टार्टअप्स
रितिका कहती हैं, Enterpreneur 5pm to 9amकोई बिजनेस बुक नहीं है, बल्कि इसमें विजुअल्स और इलस्ट्रेशंस के जरिए सिंपल लैंग्वेज में अपनी बात कही गई है। राइटिंग का टोन ऐसा है कि रीडर्स को लगेगा कि हम उनसे बात कर रहे हैं। इस बुक में बताया गया है कि कैसे एक बिजनेस आइडिया को प्रॉफिटेबल स्टार्ट अप में बदला जा सकता है। रितिका के मुताबिक, उनके टारगेट रीडर्स वर्किग प्रोफेशनल्स, होममेकर्स और स्टूडेंट्स सभी हैं, लेकिन वे फिक्शन के बजाय एंटरप्रेन्योरशिप को फोकस करते हुए कुछ लिखना पसंद करेंगी। इनकी नेक्स्ट प्लानिंग भी पार्टटाइम एंटरप्रेन्योर्स के ऊपर बुक लिखने की है। वैसे, रितिका चिल्ड्रेन बुक और दूसरे सब्जेक्ट्स में भी हाथ आजमाना चाहती हैं।
नॉन रीडर्स बने रीडर्स
रितिका कहती हैं कि चेतन भगत की सक्सेस के बाद बहुत से नॉन-रीडर्स ने पढना शुरू कर दिया है। आज की जेनरेशन ज्यादातर शॉर्ट स्टोरीज पढना पसंद करती है। इसलिए न्यू एज इंडियन राइटर्स भी शॉर्ट स्टोरीज लिख रहे हैं। अच्छी बात ये है कि इंडियन पब्लिशर्स अपने यहां के राइटर्स को पब्लिश करने में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसी का नतीजा है कि इंडियन राइटर्स की डिमांड काफी बढ गई है। रितिका का मानना है कि राइटिंग पैशन से आता है। इसलिए जो लोग लिखना पसंद करते हैं, उन्हें रेगुलरली कुछ न कुछ लिखते रहना चाहिए। अपनी राइटिंग के साथ वे जितना एक्सपेरिमेंट करेंगे, उसका उतना अच्छा रिजल्ट आएगा।
ब्यूटीफुल स्टोरी टेलर
लाइफ इज शॉर्ट, सो फॉलो योर हार्ट, चेंज योर ड्रीम ऐंड गेट इट। इसी को मंत्र मानकर प्रीति शिनॉय लाइफ में आगे बढ रही हैं। छोटी उम्र से ही लिखने का शौक था। पिता की ट्रांसफरेबल जॉब थी, तो इंडिया के डिफरेंट कल्चर्स और ट्रेडिशंस को जानने का मौका मिला। धीरे-धीरे ब्लॉग लिखना शुरू किया। इन पर हिट्स की संख्या बढती गई, लेकिन राइटिंग एक फुलटाइम प्रोफेशन बनेगा, ये सोचा नहीं था। साल 2006 में जब पिता की मौत हुई, तो प्रीति ने डिसाइड कर लिया कि उन्हें प्रोफेशनल राइटिंग करनी है और फिर पहली किताब पर काम करना शुरू किया। साल 2008 में इनकी पहली बुक 3- Bubblegums and Candies आई। आज प्रीति शिनॉय इंडिया की बेस्ट सेलिंग ऑथर्स में से एक हैं। अब तक इनकी लिखी चार बुक्स बेस्ट सेलर बन चुकी है। हो भी क्यों न, ये अपने व‌र्ड्स और पिक्चर्स से ऐसा मैजिक क्रिएट करती हैं कि रीडर इनकी कहानी में खो जाता है।
राइटिंग इन टफ टाइम
प्रीति को 2009 में पता चला कि वे बाइपोलर डिस्ऑर्डर की शिकार हैं। ऐसे में फैमिली ने यूके शिफ्ट करने का फैसला किया। जब वे 2010 में दोबारा इंडिया लौटीं, तो उनकी दूसरी बुक Life is what you make it रीडर्स के बीच थी। ये बुक 2011 की टॉप सेलर बनी। प्रीति कहती हैं, इस बुक को लिखना काफी मुश्किल था। इसमें बाइपोलर डिसॉर्डर की शिकार लेडी की लाइफ को पोरट्रे किया गया है। प्रीति सिंपल तरीके से आम लोगों की कहानी कहती हैं जिससे कि उन्हें खुद को स्टोरी से रिलेट करने में देर नहीं लगती है।
ऑथर विद अ पर्पज
प्रीति कहती हैं कि वे हर स्टोरी के जरिए एक मैसेज देना चाहती हैं कि लाइफ इज ब्यूटीफुल, वन शुड लिव लाइफ टु द फुलेस्ट। लेकिन ये कहते हुए भी वह किसी को प्रवचन नहीं देती हैं। इनकी मानें, तो हमारे बीच ही कई सारे हीरोज हैं, ऐसे में वे अपनी राइटिंग के जरिए पॉजिटिविटी फैलाना चाहती हैं। इसीलिए स्टोरीज के ज्यादातर कैरेक्टर्स रियल लाइफ से इंस्पायर्ड होते हैं। जैसे कि फरवरी 2012 में आई फिक्शन बुक ञ्जद्गड्ड द्घश्रह्म ह्ल2श्र ड्डठ्ठस्त्र ड्ड श्चद्बद्गष्द्ग श्रद्घ ष्ड्डद्मद्ग। ये इस साल इंडिया के टॉप फाइव बेस्ट सेलर्स में से एक मानी जाती है। इसमें प्रीति ने एक ऐसी महिला की कहानी कही है, जो बैड मैरेज में फंसी हुई है। प्रीति की चौथी बुक The secret wishlist है, जिसमें फ्रेंडशिप, लव और एक्सपेक्टेशंस की कहानी है। अब तक इसकी 40 हजार से ज्यादा कॉपीज बिक चुकी हैं। इन दिनों प्रीति एक नई बुक The one you cannot haveपर काम कर रही हैं।
डिसिप्लिन इज इंपॉटर्ेंट
प्रीति ने बताया कि एक बुक को कंप्लीट करने में मिनिमम 7 से 8 महीने लगते हैं। इसलिए उन्हें हर रोज कम से कम छह घंटे राइटिंग के लिए निकालने होते हैं। इस दौरान उन्हें किसी तरह का डिस्टबर्ेंस पसंद नहीं। सो, जब वे लिखती हैं तो अपना मोबाइल स्विच ऑफ रखती हैं और अकेले रहती हैं। प्रीति का कहना है कि बुक लिखने के दौरान सबसे पहले स्टोरी सोचनी होती है, वह है ओरिजनैलिटी। इसके बाद प्लॉट, कैरेक्टर्स सेलेक्ट करने होते हैं, जो लोगों से रिलेट कर सकें। इन सबके अलावा सबसे इंपॉटर्ेंट होता है, डिसिप्लिन मेनटेन करना। कंप्यूटर या लैपटॉप पर बैठने की हैबिट डालना। हर दिन लिखना होता है। प्रीति ऑथर फ्रेंड्स से उनके बुक के प्रोग्रेस के बारे में इंफॉर्मेशन लेती हैं कि उन्होंने कितने व‌र्ड्स लिखे। इसके बाद खुद की स्पीड देखती हैं। इससे उन्हें मोटिवेशन मिलती है, एक हेल्दी कॉम्पिटिशन रहता है।
फाइनल प्रोडक्ट
प्रीति ने बताया कि बहुत से लोग नहीं जानते हैं कि एक बार जब मेनस्क्रिप्ट पूरी हो जाती है और वह पब्लिशर के पास पहुंच जाती है, तो कम से कम चार से छह महीने लगते हैं बुक को मार्केट में आने में। इससे ज्यादा भी समय लग सकता है, क्योंकि मेनस्क्रि प्ट के कई रिविजंस होते हैं। ऑथर्स को कुछ स्ट्रक्चरल चेंजेज करने पड सकते हैं। इसके बाद अगर एडिटर कनविंस हो जाता है, तो प्रूफ रीडिंग का काम शुरू होता है, जो कई राउंड्स तक चलता है। करेक्शंस लगते हैं। एक-एक कॉमा, फुलस्टॉप, वर्ड, फॉन्ट्स को कई-कई बार चेक किया जाता है। इसी तरह बुक के टाइटल, एकनॉलेजमेंट और चैप्टर के टाइटल्स पर काम होता है। इतना सब होने के बाद फाइनल प्रोडक्ट मार्केट में आता है। प्रीति को रोल्ड डैल, ऑड्रे निफनेगर, मिलन कुंडेरा और किरण नागरकर को पढना अच्छा लगता है। इनकी राइटिंग से इंस्पीरेशन मिलती है।
टिप्स फॉर न्यू कमर्स
नए राइटर्स को प्रीति की एडवाइस है कि वे अलग-अलग ऑथर्स को पढें। डेली कम से कम 500 शब्दों में कुछ भी लिखें। इसके अलावा हमेशा ध्यान रखें कि राइटिंग ओरिजनल हो। जब रीडर्स आपकी स्टोरी से कनेक्ट करेगा तभी सक्सेस मिलेगी। प्रीति के मुताबिक, जो लोग राइटिंग के प्रोफेशन में आना चाहते हैं, उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह एक लोनली प्रोफेशन है। एक बुक को खत्म करने में साल, दो साल और ज्यादा लग जाते हैं। इस दौरान आपके साथ कोई और नहीं होता है। इसके अलावा आप किसी के लिए अकाउंटेबल नहीं होते हैं और न ही कोई प्रोग्रेस को चेक करता है।
अ थिंग बियांड फॉरएवर
जिंदगी में किसी मोड पर आकर आपको लगता है कि गलत रास्ते पर आ गए, मेरी मंजिल तो कहीं और थी, लेकिन आप इतनी दूर आ चुके होते हैं कि पीछे जाना पॉसिबल नहीं होता और आप उसी रास्ते पर बेमन से चलते जाते हैं। कोलकाता के नवनील चक्रवर्ती को ये मंजूर नहीं था, उन्होंने अपनी गलती सुधार ली और रास्ता बदल लिया।
मैंने क्यों किया बीबीए?
नवनील कहते हैं, आज भी मुझे नहीं पता कि मैंने बीबीए क्यों किया। 12वीं क्लास के बाद ऐमलेस और डायरेक्शन लेस था, ट्रेंड यही चल रहा था बीबीए, एमबीए का। मैंने भी सोचा कि शायद एमबीए करके कुछ अच्छा कर सकता हूं, बाद में फील हुआ कि इट्स नाट राइट च्वाइस फॉर मी।
काश, ये पहले होता
नवनील ने बीबीए सेंकड ईयर से ही लिखना शुरू कर दिया था। शुरू में शॉर्ट स्टोरीज लिखा करते थे। समर इंटर्नशिप के दौरान ही नवनील को अहसास हो गया कि यह काम उनसे नहीं होने वाला। बीबीए की समर इंटर्नशिप के दौरान ही राइटर बनने का कीडा काट गया। अगर ये कीडा थोडा पहले काटता तो अच्छा होता।
लडकी ने लिखवा दी किताब
नवनील की नई किताब है-एक्स। इसके लिए उन्हें कैरेक्टर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मिली। एक अनजान लडकी अचानक आकर उनसे मिली थी और उनकी राइटिंग की तारीफ की थी। उसी लडकी से इंस्पायर्ड होकर नवनील को अपनी नई स्टोरी का प्लॉट और कैरेक्टर का आइडिया मिला
डोंट बी राइटर टु बाय बीएमडब्ल्यू
नवनील कहते हैं कि अगर राइटर बनकर बीएमडब्ल्यू खरीदना चाहते हैं, तो आपकी जगह इस फील्ड में नहीं है, लेकिन अगर आप सुकून, सैटिफैक्शन और पैशन के लिए राइटर बनना चाहते हैं, तो आप कर सकते हैं।
राइटर्स टिप्स
-फीलिंग के साथ पॉजिटिव चीजों पर लिखने की कोशिश करें।
-सेल्फ सैटिफैक्शन के लिए लिखें।
-आपका सबसे ज्यादा फोकस स्टोरी के कैरेक्टर पर होना चाहिए।
पैशन ने बनाया राइटर
2004 मिस इंडिया ब्यूटी कॉन्टेस्ट की पार्टिसिपेंट इरा त्रिवेदी ने बॉस्टन के वैलेसली कॉलेज से ग्रेजुएशन और फिर कोलंबिया बिजनेस स्कूल से एमबीए किया। इरा कॉरपोरेट व‌र्ल्ड में शानदार करियर बना सकती थीं, लेकिन अपने पैशन को फॉलो करने का डिसीजन लिया और बन गईं एक राइटर। 2006 में 19 साल की एज में पहला बुक लिख डाला, What would you do to save the world? इसके बाद कभी पीछे नहीं देखा। इरा त्रिवेदी इन दिनों अपने चौथे नॉन-फिक्शनल बुक¤ India in love : love, sexuality and marriage in 21st century पर वर्क कर रही हैं।
बैंकर से राइटर
इरा ने बताया कि राइटिंग प्रोफेशन में आना, प्री-प्लांड नहीं था। वे इनवेस्टमेंट बैंकर बनना चाहती थीं, लेकिन एक दिन ख्याल आया कि इससे सोसायटी में वह इंपैक्ट नहीं डाला जा सकता जो एक फुलटाइम राइटर बनकर किया जा सकता है। इस तरह पहली बुक का आइडिया आया, जिसमें उन्होंने ब्यूटी कॉन्टेस्ट के दौरान के एक्सपीरियंसेज को शेयर किया है। What would you do to save the world? में ब्यूटी और ग्लैमर व‌र्ल्ड की वह कहानी है, जो खूबसूरत नहीं है, यानी यह रियलिटी से इंस्पायर्ड ये एक फिक्शनल स्टोरी है। क्रिटिक्स ने इस बुक को काफी सराहा है और यह इरा की बेस्ट सेलर बुक मानी जाती है।
टाइम के साथ परफेक्शन
इरा कहती हैं, शुरू में लिखने की स्पीड थोडी कम थी। डेली एक पेज ही लिखना होता था, लेकिन पहली बुक मार्केट में आने के बाद कॉन्फिडेंस और परफेक्शन, दोनों बढते गए। यही कारण रहा कि तीन साल बाद 2009 में दूसरी बुक ¤ The great Indian love story और इसके दो साल बाद 2011 में तीसरी बुकThere is no love on wallstreetसबके सामने थी। बडी बात ये भी रही कि पेंग्विन द्वारा पब्लिश्ड इस बुक को ग्रीक, हिंदी, मराठी और मलयालम में ट्रांसलेट किया गया है। इरा ने अपनी कहानियों में आज की अर्बन लाइफ, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, यूथ, सोसायटी के अलग-अलग एस्पेक्ट्स को शामिल कर, यंग रीडर्स से कनेक्ट करने की कोशिश की है। इरा राइटर के अलावा ट्रेन्ड योगा टीचर भी हैं। योगा से ही इन्हें लिखने का इंस्पीरेशन मिलता है।
जिंदगी ना मिलेगी दोबारा
आपमें से कितने यूथ ऐसे हैं, जो राजस्थान के कोटा जाते हैं इंजीनियरिंग की तैयारी करने और बनकर आते हैं राइटर! क्या आप कभी सोच सकते हैं कि इंजीनियर बनने के लिए कोई जी-तोड मेहनत करे, फिर इंजीनियर बन भी जाए और फिर कहे यार, मजा नहीं आ रहा, छोडो, अब राइटर बनेंगे। आप इसे क्या कहेंगे? लेकिन राइटिंग के पैशन के ऐसे कई दीवाने हैं। उन्हीं में से एक हैं बरेली के रहने वाले हर्ष अग्रवाल। An Excursion Of Insight के राइटर हर्ष कहते हैं, एक ही लाइफ मिली है, उसे आप जितने अच्छे से हो सके, जी लीजिए, दोबारा नहीं मिलेगी ये, थोडा रिस्क उठा लीजिए।
इंजीनियर से निकला राइटर
इंजीनियरिंग कॉलेज से हर्ष को बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन कॉलेज का करिकुलम हर्ष को कुछ पसंद नहीं आया। हर्ष के दिल में बहुत गुबार है, वह बताते हैं, यहां पर बस आपको आना है, पढना है, एग्जाम में स्कोर करना है, फिर इंजीनियर की जॉब रोबोट वाली। सुबह 8 बजे जाइए, रात के 8 बजे आइए। दिन भर काम कीजिए। आपका बॉस आपके ऊपर चिल्लाएगा, साइट पर जाइए, विजिट करिए। समझिए आप अपनी लाइफ बर्बाद कर रहे हैं। आप किसी बुक स्टाल पर जाते हैं, शेल्फ में अपनी किताब देखकर आपको जो खुशी मिलती है, वो इंजीनियर बनने पर तो नहीं मिल सकती।
अपॉच्र्युनिटी फॉर न्यू राइटर्स
बुक राइटिंग के साथ-साथ हर्ष ने अपनी वेबसाइट भी बनाई है, theasylum.in। हर्ष बताते हैं, जब मैंने शुरू किया था, तो मुझे किसी से हेल्प नहीं मिली, उसी वक्त मैंने डिसाइड किया कि खुद जो परेशानी झेली, किसी और को नहीं होने दूंगा।?
राइटर्स टिप्स
-पैशन और पेशेंस बहुत जरूरी है
-अंदर के राइटर को जगाएं
-बंधकर जीना छोडें, जो करना चाहते हैं वो करें
-ह्यूमन ऐंड इवेंट ऑब्जर्वेशन सीखें
v{..v|ऐंड डन मद्रास यूनिवर्सिटी से कम्युनिकेशन में मास्टर्स करने के बाद एडवर्टाइजिंग कंपनी में काम कर रही विभा बत्रा का इंट्रेस्ट बचपन से राइटिंग में था। उन्हें घर का माहौल भी वैसा ही मिला। कई किताबें पढींऔर फिर फैसला लिया कि खुद भी कुछ लिखा जाए। इस तरह स्वीट सिक्सटीन के रूप में सामने आई विभा बत्रा की क्रिएटिविटी।
चैलेंजिंग था पहला टास्क
विभा ने सबसे पहले अपने नाना विष्णुकांत शास्त्री की किताब ज्ञान और कर्म का ट्रांसलेशन किया था। यह एक बडा चैलेंज था, क्योंकि इसकी लैंग्वेज टफ थी और इसमें अपनी तरफ से कुछ लिखा भी नहीं जा सकता था। इसे पूरा करने में डेढ साल लगे और यहीं से उनकी शुरुआत हुई।
इमेजिनेशन ऐंड सैटायर
अपनी स्टोरीज और नॉवेल के बारे में विभा बताती हैं कि थीम और कैरेक्टर चुनते समय वह रियलिटी का पूरा ध्यान रखती हैं। अपने इमेजिनेशन और एक्सपीरियंस से कैरेक्टर डिसाइड करती हैं। मैं अपनी भाषा में थोडा सैटायर का लुक जरूर देती हूं, क्योंकि अब जो नए रीडर्स सामने आ रहे हैं उन्हें हल्की-फुल्की भाषा में मनोरंजन के साथ चीजें एक्सेप्ट करने की आदत है।
भगवद्गीता जरूर पढें
मैंने बहुत से राइटर्स की कई बुक्स पढी हैं। कुछ को तो दो-तीन बार या उससे भी ज्यादा बार पढा हैं, लेकिन सच कहूं तो मुझे सबसे बढिया किताब अगर कोई लगी है तो वह है श्रीमद्भगवद्गीता। इसमें आपको वह सब मिल जाएगा, जो जीवन को नई दिशा और विजन देने के लिए जरूरी है।
राइटर्स टिप्स
-स्टोरी यूथ बेस्ड हो, तो अच्छा है।
-फिक्शन में रियल एक्सपीरियन्स भी जरूरी है।
-लिखने के लिए ग्राउंड रियलिटी भी देखें।
-सिचुएशनली फैक्ट डालना जरूरी है।

सीरियल एंटरप्रेन्योर से राइटिंग तक
रितिका सुंदर की तरह डॉ. कांत मिरियाला भी एमएनसी के लिए फुलटाइम बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर काम करते रहे हैं। जॉब छोडने का रिस्क नहींले सकते थे, इसलिए कई स्टार्टअप शुरू किए। इनमें कुछ फेल्योर रहे, जबकि कुछ बेहद सक्सेसफुल। डॉ. कांत ने क्विंटेंट नाम से स्टार्टअप शुरू किया था, जिसे आईगेट कंपनी को 87 करोड रुपये में बेच दिया। ये क्यूआईके नाम की कंपनी में इनवेस्टर थे, जिसे बाद में स्काइप ने 150 मिलियन डॉलर में खरीदा। बाद में डॉ.कांत और रितिका ने एक ऐसी बुक लिखने का फैसला लिया, जिससे कि एक वेंचर के जीरो से लॉन्चिंग तक के एक्सपीरियंस को सबके साथ शेयर किया जा सके।
मैनेजमेंट इन राइटिंग
रितिका सुंदर ने आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए करने के बाद बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने फॉर्चून 500 कंपनीज के लिए कई कंसल्टिंग प्रोजेक्ट्स किए। इसके बाद एमएनसी कंपनीज को अपनी सर्विस देने के बाद अभी वे आईटी कंपनी एचसीएल के साथ सीनियर बिजनेस स्पेशलिस्ट के तौर पर जुडी हैं। रितिका का इंट्रोडक्शन सिर्फ इतना भर नहीं है। वे एक सफल राइटर भी हैं। डॉ. कांत मिरियाला के साथ इन्होंने ऐसे लोगों के लिए एक बुक लिखी है जो अपना वेंचर स्टार्ट करना चाहते हैं, लेकिन डिसीजन नहींले पा रहे।
इस बुक का नाम है Entrepreneur 5pm to 9am.
बुक्स से कंपैनियनशिप
रितिका के मुताबिक, उन्हें बचपन से राइटिंग की हॉबी रही है। दस साल की थीं, तब से किताबें पढने का शौक रहा है। गर्मी की छुट्टियों में एक दिन में तीन बुक पढ लिया करती थीं। किताबों की दुनिया उन पर मानो जादू सा कर देती थी। वॉल्डन इनकी ऑल टाइम फेवरेट बुक रही है। इस बुक का एक कोट इन्हें आज भी काफी इंस्पायर करता है, However mean your life is, meet it and live it. वे कहती हैं, बुक्स ने मेरी लाइफ को बनाया है, वैल्यूज समझाए हैं और हमेशा मेरे दोस्त रहे हैं। इन्हीं सारी बातों ने रितिका को मोटिवेट किया कि वे कुछ ऐसा करें जिससे कि दूसरों की लाइफ में मैजिक ला सकें। मन में राइटर बनने का ख्याल आया, लेकिन इससे फाइनेंशियल स्टैबिलिटी नहीं आ सकती थी, इसलिए एजुकेशन कंप्लीट की और जॉब करने लगी।
जॉब के साथ राइटिंग
जॉब के दौरान रितिका ने फील किया कि आज बहुत सारे वर्किंग प्रोफेशनल्स अपनी नौकरी से सैटिस्फाइड नहीं हैं। वे कुछ अपना करना चाहते हैं, जिसमें बॉस की दखलअंदाजी न हो, काम करने की फ्रीडम हो, लेकिन उनके पास ऑप्शन नहीं होता कि कुछ अपने मन की कर सकें। इसके अलावा स्क्रैप से शुरू करने में अक्सर लोग डरते हैं। जॉब छोडने का रिस्क लेना भी इस दौर में ईजी नहीं है। रितिका कहती हैं, इन्हीं बातों का ध्यान में रखकर मैंने डॉ. कांत के साथ किताब लिखने का डिसीजन लिया। वैसे, एक फुलफ्लैच्ड जॉब करने के साथ बुक लिखना कोई ईजी टास्क नहीं है। उसमें भी जब एक राइटर अमेरिका में हो और दूसरा इंडिया में। रितिका ने बताया कि डॉ. कांत फोन और ईमेल के जरिए बुक के लिए कॉन्ट्रिब्यूट करते थे। फाइनल मेनस्क्रिप्ट तैयार होने से पहले कई लोगों का इंटरव्यू किया गया। हर दिन 2 से 3 घंटे लिखना और फिर उसे रिव्यू करना होता था। इस तरह करीब छह महीने की मेहनत के बाद उनकी बुक पूरी हो सकी। रितिका कहती हैं कि जब वे लोग पूरी तरह से सैटिस्फाइड हो गए तो बुक को पब्लिशर के पास भेजा। रूपा पब्लिकेशन को उनका कॉन्सेप्ट क्लिक कर गया और बुक मार्केट में आ गई। पहला एडिशन तो कंप्लीट सेल आउट था। उसके बाद अब दूसरा एडिशन भी आ चुका है।
गाइड फॉर स्टार्टअप्स
रितिका कहती हैं, Enterpreneur 5pm to 9am कोई बिजनेस बुक नहीं है, बल्कि इसमें विजुअल्स और इलस्ट्रेशंस के जरिए सिंपल लैंग्वेज में अपनी बात कही गई है। राइटिंग का टोन ऐसा है कि रीडर्स को लगेगा कि हम उनसे बात कर रहे हैं। इस बुक में बताया गया है कि कैसे एक बिजनेस आइडिया को प्रॉफिटेबल स्टार्ट अप में बदला जा सकता है। रितिका के मुताबिक, उनके टारगेट रीडर्स वर्किग प्रोफेशनल्स, होममेकर्स और स्टूडेंट्स सभी हैं, लेकिन वे फिक्शन के बजाय एंटरप्रेन्योरशिप को फोकस करते हुए कुछ लिखना पसंद करेंगी। इनकी नेक्स्ट प्लानिंग भी पार्टटाइम एंटरप्रेन्योर्स के ऊपर बुक लिखने की है। वैसे, रितिका चिल्ड्रेन बुक और दूसरे सब्जेक्ट्स में भी हाथ आजमाना चाहती हैं।
नॉन रीडर्स बने रीडर्स
रितिका कहती हैं कि चेतन भगत की सक्सेस के बाद बहुत से नॉन-रीडर्स ने पढना शुरू कर दिया है। आज की जेनरेशन ज्यादातर शॉर्ट स्टोरीज पढना पसंद करती है। इसलिए न्यू एज इंडियन राइटर्स भी शॉर्ट स्टोरीज लिख रहे हैं। अच्छी बात ये है कि इंडियन पब्लिशर्स अपने यहां के राइटर्स को पब्लिश करने में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसी का नतीजा है कि इंडियन राइटर्स की डिमांड काफी बढ गई है। रितिका का मानना है कि राइटिंग पैशन से आता है। इसलिए जो लोग लिखना पसंद करते हैं, उन्हें रेगुलरली कुछ न कुछ लिखते रहना चाहिए। अपनी राइटिंग के साथ वे जितना एक्सपेरिमेंट करेंगे, उसका उतना अच्छा रिजल्ट आएगा।
ब्यूटीफुल स्टोरी टेलर
लाइफ इज शॉर्ट, सो फॉलो योर हार्ट, चेंज योर ड्रीम ऐंड गेट इट। इसी को मंत्र मानकर प्रीति शिनॉय लाइफ में आगे बढ रही हैं। छोटी उम्र से ही लिखने का शौक था। पिता की ट्रांसफरेबल जॉब थी, तो इंडिया के डिफरेंट कल्चर्स और ट्रेडिशंस को जानने का मौका मिला। धीरे-धीरे ब्लॉग लिखना शुरू किया। इन पर हिट्स की संख्या बढती गई, लेकिन राइटिंग एक फुलटाइम प्रोफेशन बनेगा, ये सोचा नहीं था। साल 2006 में जब पिता की मौत हुई, तो प्रीति ने डिसाइड कर लिया कि उन्हें प्रोफेशनल राइटिंग करनी है और फिर पहली किताब पर काम करना शुरू किया। साल 2008 में इनकी पहली बुक 3- Bubblegums and Candiesआई। आज प्रीति शिनॉय इंडिया की बेस्ट सेलिंग ऑथर्स में से एक हैं। अब तक इनकी लिखी चार बुक्स बेस्ट सेलर बन चुकी है। हो भी क्यों न, ये अपने व‌र्ड्स और पिक्चर्स से ऐसा मैजिक क्रिएट करती हैं कि रीडर इनकी कहानी में खो जाता है।
राइटिंग इन टफ टाइम
प्रीति को 2009 में पता चला कि वे बाइपोलर डिस्ऑर्डर की शिकार हैं। ऐसे में फैमिली ने यूके शिफ्ट करने का फैसला किया। जब वे 2010 में दोबारा इंडिया लौटीं, तो उनकी दूसरी बुक Life is what you make itरीडर्स के बीच थी। ये बुक 2011 की टॉप सेलर बनी। प्रीति कहती हैं, इस बुक को लिखना काफी मुश्किल था। इसमें बाइपोलर डिसॉर्डर की शिकार लेडी की लाइफ को पोरट्रे किया गया है। प्रीति सिंपल तरीके से आम लोगों की कहानी कहती हैं जिससे कि उन्हें खुद को स्टोरी से रिलेट करने में देर नहीं लगती है।
ऑथर विद अ पर्पज
प्रीति कहती हैं कि वे हर स्टोरी के जरिए एक मैसेज देना चाहती हैं कि लाइफ इज ब्यूटीफुल, वन शुड लिव लाइफ टु द फुलेस्ट। लेकिन ये कहते हुए भी वह किसी को प्रवचन नहीं देती हैं। इनकी मानें, तो हमारे बीच ही कई सारे हीरोज हैं, ऐसे में वे अपनी राइटिंग के जरिए पॉजिटिविटी फैलाना चाहती हैं। इसीलिए स्टोरीज के ज्यादातर कैरेक्टर्स रियल लाइफ से इंस्पायर्ड होते हैं। जैसे कि फरवरी 2012 में आई फिक्शन बुक Tea for two and a piece of cake। ये इस साल इंडिया के टॉप फाइव बेस्ट सेलर्स में से एक मानी जाती है। इसमें प्रीति ने एक ऐसी महिला की कहानी कही है, जो बैड मैरेज में फंसी हुई है। प्रीति की चौथी बुक The secret wishlistहै, जिसमें फ्रेंडशिप, लव और एक्सपेक्टेशंस की कहानी है। अब तक इसकी 40 हजार से ज्यादा कॉपीज बिक चुकी हैं। इन दिनों प्रीति एक नई बुक The one you cannot haveपर काम कर रही हैं।
डिसिप्लिन इज इंपॉटर्ेंट
प्रीति ने बताया कि एक बुक को कंप्लीट करने में मिनिमम 7 से 8 महीने लगते हैं। इसलिए उन्हें हर रोज कम से कम छह घंटे राइटिंग के लिए निकालने होते हैं। इस दौरान उन्हें किसी तरह का डिस्टबर्ेंस पसंद नहीं। सो, जब वे लिखती हैं तो अपना मोबाइल स्विच ऑफ रखती हैं और अकेले रहती हैं। प्रीति का कहना है कि बुक लिखने के दौरान सबसे पहले स्टोरी सोचनी होती है, वह है ओरिजनैलिटी। इसके बाद प्लॉट, कैरेक्टर्स सेलेक्ट करने होते हैं, जो लोगों से रिलेट कर सकें। इन सबके अलावा सबसे इंपॉटर्ेंट होता है, डिसिप्लिन मेनटेन करना। कंप्यूटर या लैपटॉप पर बैठने की हैबिट डालना। हर दिन लिखना होता है। प्रीति ऑथर फ्रेंड्स से उनके बुक के प्रोग्रेस के बारे में इंफॉर्मेशन लेती हैं कि उन्होंने कितने व‌र्ड्स लिखे। इसके बाद खुद की स्पीड देखती हैं। इससे उन्हें मोटिवेशन मिलती है, एक हेल्दी कॉम्पिटिशन रहता है।
फाइनल प्रोडक्ट
प्रीति ने बताया कि बहुत से लोग नहीं जानते हैं कि एक बार जब मेनस्क्रिप्ट पूरी हो जाती है और वह पब्लिशर के पास पहुंच जाती है, तो कम से कम चार से छह महीने लगते हैं बुक को मार्केट में आने में। इससे ज्यादा भी समय लग सकता है, क्योंकि मेनस्क्रि प्ट के कई रिविजंस होते हैं। ऑथर्स को कुछ स्ट्रक्चरल चेंजेज करने पड सकते हैं। इसके बाद अगर एडिटर कनविंस हो जाता है, तो प्रूफ रीडिंग का काम शुरू होता है, जो कई राउंड्स तक चलता है। करेक्शंस लगते हैं। एक-एक कॉमा, फुलस्टॉप, वर्ड, फॉन्ट्स को कई-कई बार चेक किया जाता है। इसी तरह बुक के टाइटल, एकनॉलेजमेंट और चैप्टर के टाइटल्स पर काम होता है। इतना सब होने के बाद फाइनल प्रोडक्ट मार्केट में आता है। प्रीति को रोल्ड डैल, ऑड्रे निफनेगर, मिलन कुंडेरा और किरण नागरकर को पढना अच्छा लगता है। इनकी राइटिंग से इंस्पीरेशन मिलती है।
टिप्स फॉर न्यू कमर्स
नए राइटर्स को प्रीति की एडवाइस है कि वे अलग-अलग ऑथर्स को पढें। डेली कम से कम 500 शब्दों में कुछ भी लिखें। इसके अलावा हमेशा ध्यान रखें कि राइटिंग ओरिजनल हो। जब रीडर्स आपकी स्टोरी से कनेक्ट करेगा तभी सक्सेस मिलेगी। प्रीति के मुताबिक, जो लोग राइटिंग के प्रोफेशन में आना चाहते हैं, उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह एक लोनली प्रोफेशन है। एक बुक को खत्म करने में साल, दो साल और ज्यादा लग जाते हैं। इस दौरान आपके साथ कोई और नहीं होता है। इसके अलावा आप किसी के लिए अकाउंटेबल नहीं होते हैं और न ही कोई प्रोग्रेस को चेक करता है।
अ थिंग बियांड फॉरएवर
जिंदगी में किसी मोड पर आकर आपको लगता है कि गलत रास्ते पर आ गए, मेरी मंजिल तो कहीं और थी, लेकिन आप इतनी दूर आ चुके होते हैं कि पीछे जाना पॉसिबल नहीं होता और आप उसी रास्ते पर बेमन से चलते जाते हैं। कोलकाता के नवनील चक्रवर्ती को ये मंजूर नहीं था, उन्होंने अपनी गलती सुधार ली और रास्ता बदल लिया।
मैंने क्यों किया बीबीए?
नवनील कहते हैं, आज भी मुझे नहीं पता कि मैंने बीबीए क्यों किया। 12वीं क्लास के बाद ऐमलेस और डायरेक्शन लेस था, ट्रेंड यही चल रहा था बीबीए, एमबीए का। मैंने भी सोचा कि शायद एमबीए करके कुछ अच्छा कर सकता हूं, बाद में फील हुआ कि इट्स नाट राइट च्वाइस फॉर मी।
काश, ये पहले होता
नवनील ने बीबीए सेंकड ईयर से ही लिखना शुरू कर दिया था। शुरू में शॉर्ट स्टोरीज लिखा करते थे। समर इंटर्नशिप के दौरान ही नवनील को अहसास हो गया कि यह काम उनसे नहीं होने वाला। बीबीए की समर इंटर्नशिप के दौरान ही राइटर बनने का कीडा काट गया। अगर ये कीडा थोडा पहले काटता तो अच्छा होता।
लडकी ने लिखवा दी किताब
नवनील की नई किताब है-एक्स। इसके लिए उन्हें कैरेक्टर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मिली। एक अनजान लडकी अचानक आकर उनसे मिली थी और उनकी राइटिंग की तारीफ की थी। उसी लडकी से इंस्पायर्ड होकर नवनील को अपनी नई स्टोरी का प्लॉट और कैरेक्टर का आइडिया मिला
डोंट बी राइटर टु बाय बीएमडब्ल्यू
नवनील कहते हैं कि अगर राइटर बनकर बीएमडब्ल्यू खरीदना चाहते हैं, तो आपकी जगह इस फील्ड में नहीं है, लेकिन अगर आप सुकून, सैटिफैक्शन और पैशन के लिए राइटर बनना चाहते हैं, तो आप कर सकते हैं।
राइटर्स टिप्स
-फीलिंग के साथ पॉजिटिव चीजों पर लिखने की कोशिश करें।
-सेल्फ सैटिफैक्शन के लिए लिखें।
-आपका सबसे ज्यादा फोकस स्टोरी के कैरेक्टर पर होना चाहिए।
पैशन ने बनाया राइटर
2004 मिस इंडिया ब्यूटी कॉन्टेस्ट की पार्टिसिपेंट इरा त्रिवेदी ने बॉस्टन के वैलेसली कॉलेज से ग्रेजुएशन और फिर कोलंबिया बिजनेस स्कूल से एमबीए किया। इरा कॉरपोरेट व‌र्ल्ड में शानदार करियर बना सकती थीं, लेकिन अपने पैशन को फॉलो करने का डिसीजन लिया और बन गईं एक राइटर। 2006 में 19 साल की एज में पहला बुक लिख डाला, What would you do to save the world? इसके बाद कभी पीछे नहीं देखा। इरा त्रिवेदी इन दिनों अपने चौथे नॉन-फिक्शनल बुक India in love : love, sexuality and marriage in 21st century पर वर्क कर रही हैं।
बैंकर से राइटर
इरा ने बताया कि राइटिंग प्रोफेशन में आना, प्री-प्लांड नहीं था। वे इनवेस्टमेंट बैंकर बनना चाहती थीं, लेकिन एक दिन ख्याल आया कि इससे सोसायटी में वह इंपैक्ट नहीं डाला जा सकता जो एक फुलटाइम राइटर बनकर किया जा सकता है। इस तरह पहली बुक का आइडिया आया, जिसमें उन्होंने ब्यूटी कॉन्टेस्ट के दौरान के एक्सपीरियंसेज को शेयर किया है। What would you do to save the world? में ब्यूटी और ग्लैमर व‌र्ल्ड की वह कहानी है, जो खूबसूरत नहीं है, यानी यह रियलिटी से इंस्पायर्ड ये एक फिक्शनल स्टोरी है। क्रिटिक्स ने इस बुक को काफी सराहा है और यह इरा की बेस्ट सेलर बुक मानी जाती है।
टाइम के साथ परफेक्शन
इरा कहती हैं, शुरू में लिखने की स्पीड थोडी कम थी। डेली एक पेज ही लिखना होता था, लेकिन पहली बुक मार्केट में आने के बाद कॉन्फिडेंस और परफेक्शन, दोनों बढते गए। यही कारण रहा कि तीन साल बाद 2009 में दूसरी बुक The great Indian love storyऔर इसके दो साल बाद w®vv में तीसरी बुक There is no love on wallstreet सबके सामने थी। बडी बात ये भी रही कि पेंग्विन द्वारा पब्लिश्ड इस बुक को ग्रीक, हिंदी, मराठी और मलयालम में ट्रांसलेट किया गया है। इरा ने अपनी कहानियों में आज की अर्बन लाइफ, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, यूथ, सोसायटी के अलग-अलग एस्पेक्ट्स को शामिल कर, यंग रीडर्स से कनेक्ट करने की कोशिश की है। इरा राइटर के अलावा ट्रेन्ड योगा टीचर भी हैं। योगा से ही इन्हें लिखने का इंस्पीरेशन मिलता है।
जिंदगी ना मिलेगी दोबारा
आपमें से कितने यूथ ऐसे हैं, जो राजस्थान के कोटा जाते हैं इंजीनियरिंग की तैयारी करने और बनकर आते हैं राइटर! क्या आप कभी सोच सकते हैं कि इंजीनियर बनने के लिए कोई जी-तोड मेहनत करे, फिर इंजीनियर बन भी जाए और फिर कहे यार, मजा नहीं आ रहा, छोडो, अब राइटर बनेंगे। आप इसे क्या कहेंगे? लेकिन राइटिंग के पैशन के ऐसे कई दीवाने हैं। उन्हीं में से एक हैं बरेली के रहने वाले हर्ष अग्रवाल। An Excursion Of Insightके राइटर हर्ष कहते हैं, एक ही लाइफ मिली है, उसे आप जितने अच्छे से हो सके, जी लीजिए, दोबारा नहीं मिलेगी ये, थोडा रिस्क उठा लीजिए।
इंजीनियर से निकला राइटर
इंजीनियरिंग कॉलेज से हर्ष को बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन कॉलेज का करिकुलम हर्ष को कुछ पसंद नहीं आया। हर्ष के दिल में बहुत गुबार है, वह बताते हैं, यहां पर बस आपको आना है, पढना है, एग्जाम में स्कोर करना है, फिर इंजीनियर की जॉब रोबोट वाली। सुबह 8 बजे जाइए, रात के 8 बजे आइए। दिन भर काम कीजिए। आपका बॉस आपके ऊपर चिल्लाएगा, साइट पर जाइए, विजिट करिए। समझिए आप अपनी लाइफ बर्बाद कर रहे हैं। आप किसी बुक स्टाल पर जाते हैं, शेल्फ में अपनी किताब देखकर आपको जो खुशी मिलती है, वो इंजीनियर बनने पर तो नहीं मिल सकती।
अपॉच्र्युनिटी फॉर न्यू राइटर्स
बुक राइटिंग के साथ-साथ हर्ष ने अपनी वेबसाइट भी बनाई है, theasylum.in। हर्ष बताते हैं, जब मैंने शुरू किया था, तो मुझे किसी से हेल्प नहीं मिली, उसी वक्त मैंने डिसाइड किया कि खुद जो परेशानी झेली, किसी और को नहीं होने दूंगा।
राइटर्स टिप्स
-पैशन और पेशेंस बहुत जरूरी है
-अंदर के राइटर को जगाएं
-बंधकर जीना छोडें, जो करना चाहते हैं वो करें
-ह्यूमन ऐंड इवेंट ऑब्जर्वेशन सीखें
v{..v|ऐंड डन
मद्रास यूनिवर्सिटी से कम्युनिकेशन में मास्टर्स करने के बाद एडवर्टाइजिंग कंपनी में काम कर रही विभा बत्रा का इंट्रेस्ट बचपन से राइटिंग में था। उन्हें घर का माहौल भी वैसा ही मिला। कई?किताबें पढींऔर फिर फैसला लिया कि खुद भी कुछ लिखा जाए। इस तरह स्वीट सिक्सटीन के रूप में सामने आई विभा बत्रा की क्रिएटिविटी।
चैलेंजिंग था पहला टास्क
विभा ने सबसे पहले अपने नाना विष्णुकांत शास्त्री की किताब ज्ञान और कर्म का ट्रांसलेशन किया था। यह एक बडा चैलेंज था, क्योंकि इसकी लैंग्वेज टफ थी और इसमें अपनी तरफ से कुछ लिखा भी नहीं जा सकता था। इसे पूरा करने में डेढ साल लगे और यहीं से उनकी शुरुआत हुई।
इमेजिनेशन ऐंड सैटायर
अपनी स्टोरीज और नॉवेल के बारे में विभा बताती हैं कि थीम और कैरेक्टर चुनते समय वह रियलिटी का पूरा ध्यान रखती हैं। अपने इमेजिनेशन और एक्सपीरियंस से कैरेक्टर डिसाइड करती हैं। मैं अपनी भाषा में थोडा सैटायर का लुक जरूर देती हूं, क्योंकि अब जो नए रीडर्स सामने आ रहे हैं उन्हें हल्की-फुल्की भाषा में मनोरंजन के साथ चीजें एक्सेप्ट करने की आदत है।
भगवद्गीता जरूर पढें
मैंने बहुत से राइटर्स की कई बुक्स पढी हैं। कुछ को तो दो-तीन बार या उससे भी ज्यादा बार पढा हैं, लेकिन सच कहूं तो मुझे सबसे बढिया किताब अगर कोई लगी है तो वह है श्रीमद्भगवद्गीता। इसमें आपको वह सब मिल जाएगा, जो जीवन को नई दिशा और विजन देने के लिए जरूरी है।
राइटर्स टिप्स
-स्टोरी यूथ बेस्ड हो, तो अच्छा है।
-फिक्शन में रियल एक्सपीरियन्स भी जरूरी है।
-लिखने के लिए ग्राउंड रियलिटी भी देखें।
-सिचुएशनली फैक्ट डालना जरूरी है।
2014 में आएगी नेक्स्ट बुक
डीटीयू से इंजीनियरिंग करने के बाद दुर्जाय ने गुडगांव के एमडीआई से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। गुडगांव में पोस्ट ग्रेजुएशनके साथ ही दुर्जाय ने ऑफ कोर्स आई लव यू लिखी, जो बेस्ट सेलर बनी। मैनेजमेंट की डिग्री के बाद उन्होंने अमेरिकन एक्सप्रेस में जॉब की, लेकिन फाइनली राइटिंग को उन्होंने अपना करियर बनाया। दुर्जाय की आठ बुक्स में से चार बेस्ट सेलर के लिए चुनी जा चुकी हैं। दुर्जाय अभी तक रिलेशनशिप पर फोकस करते आए हैं, लेकिन अब वो दूसरे टॉपिक पर भी फोकस कर रहे हैं। जून 2014 तक दुर्जाय की अगली बुक मार्केट में आ जाएगी।
राइटिंग इज लाइफ
शौक और करियर दो ऐसी चीजें हैं, जिनका आपस में कोई रिलेशन नहीं होता, लेकिन अगर शौक को करियर बना लिया जाए, तो समझिए कि आप को शिखर पर पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। दिल्ली के 26 वर्षीय दुर्जाय दत्ता ने फ‌र्स्ट बुक लिखकर ही राइटर्स के बीच अपनी अलग पहचान बना ली थी। दुर्जाय अब तक आठ बुक्स लिख चुके हैं, जिसमें से चार बुक्स बेस्ट सेलर में आती हैं।
शौक भी-करियर भी
बचपन से लिखने-पढने के शौकीन दुर्जाय दत्ता की फैमली में एजुकेशन का अच्छा महौल था। स्कूलिंग करने के बाद दुर्जाय ने दिल्ली स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया। उसके बाद गुडगांव के मैनेजमेंट डेवलप्मेंट इंस्टीट्यूट से मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया। पढाई के दौरान ही दुर्जाय ने अपनी फ‌र्स्ट बुक ऑफ कोर्स आई लव यू लिखी। बुक पब्लिश कराने के लिए उन्होंने कोई खास तैयारी नहीं की और न ही बुक के लिए किसी तरह का प्रमोशन, लेकिन जब बुक पब्लिश होकर मार्केट में आई, तो बेस्ट सेलर में दर्ज हो गई। फ‌र्स्ट बुक ने उन्हें इस तरह से इंस्पायर किया कि उन्होंने राइटिंग को अपना पैशन और करियर बना लिया। Of Course I Love You ..! Till I Find Someone Better में दुर्जाय ने अपनी खुद की लाइफ, कॉलेज के दिनों के पर्सनल एक्सपीरियंस को शेयर किया था, जिसे यंगस्टर्स ने खूब पसंद किया।
सक्सेस स्टेप बाई स्टेप
पहली बुक की सक्सेस ने उन्हें दूसरी बुक लिखने के लिए इंस्पायर किया। दुर्जाय कहते हैं कि जब फ‌र्स्ट बुक मार्केट में आई, तो लोगों ने उनसे सेकंड बुक के बारे में पूछना शुरू कर दिया। फिर उन्होंने सेकंड बुक की तैयारी स्टार्ट कर दी। उन्होंने दूसरी बुक¤ Now That You‘re Rich ने भी मार्केट में बहुत अच्छा रिस्पांस दिया। इस बुक को उन्होंने अपनी को-राइटर मानवी आहुजा के साथ लिखी। दुर्जाय कहते हैं कि सेकं ड बुक के रिस्पॉन्स के बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। उनकी तीसरी बुक She Broke Up, I Didn‘t!ने भी उन्हें जबरदस्त सक्सेस दी। 2010 में आई उनकी चौथी बुक Ohh Yes I Am Single...उन्होंने अपनी को-राइटर नीती के साथ मिलकर लिखी। दुर्जाय और नीती की इस बुक ने बेस्ट सेलर में अपना नाम दर्ज कराया। आज दुर्जाय के लिए राइटिंग ही सब कुछ है। दुर्जाय कहते हैं कि बिना लिखे मैं रह नहीं सकता।
टीवी और बॉलीवुड से ऑफर
लगातार मिली सक्सेस के बाद दुर्जाय को टीवी और बॉलीवुड से भी राइटिंग के ऑफर आने लगे। दुर्जाय इस समय टेलीविजन और बॉलीवुड के लिए भी लिख रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कुछ कॉन्ट्रैक्ट भी साइन किए हैं। दुर्जाय कहते हैं कि जल्द ही उनकी बुक्स पर बेस्ड बॉलीवुड में फिल्म भी आएगी।
पब्लिकेशन हाउस की शुरुआत
बचपन से लिखने-पढने के शौकीन दुर्जाय दत्ता ने अपने एक कॉलेज फें्रंडऔर राइटर सचिन गर्ग के साथ ग्रेप्वाइन नाम से एक पब्लिकेशन हाउस की शुरुआत की। पब्लिकेशन हाउस खोलने का मकसद अपने जैसे यंग राइटर्स को एक प्लेटफार्म देना है, क्योंकि बडे पब्लिकेशन हाउस में राइटर्स की लंबी लाइन है, जहां यंग राइटर्स को मौका देर से मिलता है या नहीं मिल पाता।
कॉम्बिनेशन विद फ्रेंड्स
दुर्जाय का अपने फ्रेंड्स के साथ कॉम्बिनेशन भी बहुत अच्छा है। को-राइटर मानवी आहूजा और नीति के साथ मिलकर उन्होंने नॉउ दैट यू आर रिच और ओ यस आईएम सिंगल लिखी जो बेस्ट सेलर बनी।
नंबर ऑफ बुक्स
-ऑफ कोर्स आई लव यू
-नॉउ दैट यू आर रिच
-शी ब्रोकअप आई डिडनॉट
-ओ यस आईएम सिंगिल
-टिल दि लास्ट ब्रीथ
-समवन लाइक यू
-होल्ड माई हैंड
-यू वर माई क्रश
राइटर्स टिप्स
-राइटर में क्रिएटिविटी होनी चाहिए।
-चीजों को ऑब्जर्व करना आना चाहिए।
-रीडर से रिलेट करने की क्वॉलिटी होनी चाहिए। - लैंग्वेज पर अच्छी कमांड होना चाहिए।
-स्टोरी में ब्रेक नहीं होना चाहिए।
-पूरी स्टोरी एक सीक्वेंस में होनी चाहिए।
अगर यह सब क्वॉलिटी आपके अंदर है, तो लिखने की शुरुआत कर सकते हैं।
मिथ्स ऐंड ट्रुथ इन राइटिंग
यंग राइटर्स के मन में एक बुक लिखने और फिर उसे पब्लिश कराने को लेकर तमाम तरह के मिथ होते हैं, जबकि हकीकत में जो मिथ यंग राइटर्स के मन होते हैं, वे रियलिटी से बिल्कुल अलग होते हैं। यंग राइटर्स यही सोचते हैं कि बुक पब्लिश कराने के लिए पब्लिशर को पैसे देने पडते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। राइटर को बुक लिखने के बाद उसे पब्लिशर के पास ले जाने से पहले बुक का अट्रैक्टिव सा प्रपोजल बनाना पडता है। प्रपोजल में बुक के तीन सिनॉप्सिस शामिल करने होते हैं, थीम चैप्टर होता है, ऑथर को अपना प्रोफाइल ऐड करना होता है और अगर ट्विटर और फेसबुक पर उसे फॉलो करने वालों की लिस्ट लंबी है, तो उन्हें भी प्रॉपोजल में शामिल कर सकते हैं। यह ऑथर के लिए एक एडवांटेज होता है। इससे पता चलता है कि सोशल मीडिया में उसके थॉट्स को कितने फॉलो किया जाता है और कितना लोग उसे इंपॉर्र्टेस देते हैं।
प्रपोजल इज इंपॉर्टेट
बुक पब्लिश कराने से पहले एक यंग राइटर के मन में तमाम तरह के मिथ और कंफ्यूजन होते हैं, लेकिन जैसा लोग सोचते हैं रियलिटी उससे बिल्कुल अलग होती है। पैंग्विन पब्लिशिंग हाउस की सीनियर कमिशनिंग एडिटर वैशाली माथुर का कहना है कि लोगों के मन में बुक पब्लिशिंग को लेकर जो कंफ्यूजन है। वे पूरी तरह से सही नहींहै। राइटर चाहे यंग हो या एक्सपीरियंस्ड प्रपोजल पसंद आने के बाद ही उस पर काम किया जाता है। प्रपोजल आने पर टीम के मेंबर उस पर स्टडी करते हैं। अगर लगता है कि प्रपोजल ठीक है और उस पर काम करना चाहिए, तो फिर ऑथर के साथ डिस्कशन किया जाता है। सभी राइटर्स के लिए एक ही रूल्स-रेग्युलेशन होते हैं। ऑथर छोटा हो या बडा पब्लिशर अपनी पूरी मेहनत उस पर करता है। क्योंकि बुक के साथ पब्लिशर का भी इंट्रेस्ट जुडा होता है।
मार्केट स्ट्रैटेजी एंड प्रमोशन
प्रपोजल पसंद आ गया, तो ऑथर को पब्लिशर के साथ बुक के बारे में डिस्कशन के लिए बुलाया जाता है। हर पब्लिशिंग हाउस के अपने कुछ रूल्स रेग्युलेशन होते हैं, जिन्हें फॉलो करना होता है। कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त सारी बातों पर चर्चा की जाती है। इसमें बुक का साइज, कवर पेज, एडिटिंग, मार्केट स्ट्रैटेजी और बुक के प्रमोशन से जुडे पार्ट पर बातचीत की जाती है, जो भी कंफ्यूजन होता है उसे ऑथर और पब्लिशर मिलकर सॉल्व करते हैं।
रॉयल्टी
बुक पब्लिश कराने से पहले रॉयल्टी पर डिस्कशन होता है। हर पब्लिशिंग हाउस की रॉयल्टी फिक्स होती है, लेकिन कई बार ऑथर की मार्केट वैल्यू देखकर रॉयल्टी में थोडा बहुत चेंज भी हो जाता है, लेकिन यह सब दोनों की अंडरस्टैंडिंग पर डिपेंड करता है।
कॉस्ट
बुक की कॉस्ट मार्केट स्ट्रैटेजी पर तय की जाती है। मार्केट में बुक के रीडर कैसे हैं। यह सब देखने के बाद बुक की कॉस्ट फाइनल की जाती है। इसमें बुक को कंप्लीट करने में कितनी कॉस्ट आई है, यह भी ध्यान रखा जाता है। बडे पब्लिशिंग हाउस बुक की कॉस्ट अक्सर ज्यादा रखते हैं। दरअसल बडे पब्लिशिंग हाउस की टीम बडी होती है। वह बुक पर काफी वर्क करते हैं। इसमें डिजाइनिंग पार्ट इंपॉर्टेट होता है। इसमें ऑथर को कुछ भी नहीं करना पडता है। सारी रिस्पॉन्सिबिलिटी पब्लिशर की होती है। इसलिए वह बुक की कॉस्ट अक्सर ज्यादा रखते हैं।
बुक एडिटिंग
बुक पब्लिश करने से पहले उसमें एडिटिंग पार्ट काफी अहम होता है। पब्लिशर ऑथर के साथ बैठकर उसमें एडिटिंग और कवर पेज के बारे में डिस्कशन करते हैं। एडिटिंग पार्ट में ही बुक की तमाम कमियां निकाल दी जाती है। यंग राइटर्स के लिए एडिटर इंपॉटर्ेंट रोल प्ले करता है। मार्केट में बुक लॉन्च करने से पहले ऑथर अपने एक्सपीरियंस के बेस पर बुक को एक रीडेबल प्रोडक्ट के रूप में तैयार करता है। मार्केट में एक ऑथर के साथ पब्लिशर की भी क्रेडिबिलिटी जुडी होती है।
कंफ्यूजन
कुछ लोगों के मन में अक्सर कंफ्यूजन होता है कि बुक पब्लिश कराने के लिए पैसे देने पडते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। पब्लिशर को अगर प्रॉपोजल पसंद आ गया, तो वह बुक पब्लिश करते हैं। कुछ पब्लिशर पैसे लेकर बुक पब्लिश करते हैं, लेकिन वह अलग होते हैं। उन्हें वैनिटी पब्लिशिंग कहते हैं। उनके रूल्स-रेग्युलेशन अलग होते हैं।
ई-बुक : टिप्स
सर्विस यूज करने से पहले ध्यान रखें
-कॉन्ट्रैक्ट की शर्र्ते क्या है ?
-बुक की प्राइस पर आपका कंट्रोल है ?
-अपफ्रंट फीस कितनी? रॉयल्टी कितनी ?
-क्या कोई हिडेन फीस या चार्ज भी है ?
-ई-बुक फाइल पर मालिकाना हक किसका ?
-पाइरेसी रोकने के लिए क्या इंतजाम हैं ?
यूजफुल लिंक्स
-www.notionpress.com
-www.pothi.com
-www.ebookpublisher.in
-www.cinnamonteal.in
कॉन्सेप्ट : अंशु सिंह, मो. रजा, मिथिलेश श्रीवास्तव और शरद अग्निहोत्री
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