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Monday, 29 November 2021

दुनिया के कई हिस्से है और कुछ हिस्सों की दुनिया मे ईश्वर की उपस्थिति लेट हुई है ,और उस दुनिया को अब भी मनुष्य ही चला रहे है

 

जानते है इस देश मे
सबसे बड़ा अपराध क्या है?
" गरीब होना "
किसी ने लिखा था "कानून" और "न्याय "दो अलग चीज़े है !
जब पुलिस और व्यवस्था ही आपको अपराधी साबित करे और आपको अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए ,अपने "सर्वाइवल" के लिए आपको अदालत में खुद ही लड़ाई लड़नी पड़े .
ये लोकतांत्रिक व्यवस्था की "बुनियाद में डिफेक्ट "आने की निशानी हैं जो लोकतंत्र के उस मूल सिद्दांत से उसे हटाती है जिसमे सबसे अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ व्यक्ति भी बराबर है .
ये जरूरी नही के आप इसे जीत जायेगे ,और इसे जीतने में आपको कितने वर्ष लगे ,आपके जीवन के कितने साल इस लड़ाई को लड़ने में जाया होंगे .आर्थिक और सामाजिक मुश्किलों की तो अलग फेरहिस्त है .लोकतंत्र में ताकते अपने हितों और सत्ता के लिए ऐसे ही अपनी ताकत का दुरुपयोग करती है .और प्रतिरोध की अनुपस्थिति उन्हें किसी भी जवाबदेही से मुक्त तो बनाती ही है क्रूर भी. सामाजिक व्यवस्था की कुरीतियों से लड़ते लड़ते हमारे समाज ने दूसरी नई कुरीतियों को ज़िंदा रखने की तरकीबें सीख ली है.
हमारे यहां अदालतों को केंद्र में रखकर , अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के लिए न्याय के लिये लड़ाई पर कमोबेश कम फिल्मे बनी है .
गोविंद निहलानी की नसीर ओम पुरी और अमरीश पुरी को लेकर बनाई गई फ़िल्म "आक्रोश",
"जोली एल एल बी" का प्रथम भाग और यथार्थ के बेहद नजदीक अदालतों और सिस्टम के क्रूर उदासीन चेहरे को रिफ्लेक्ट करती मराठी फिल्म "कोर्ट "मुझे याद आती है इसके अलावा
"जोली एल एल बी 2" और" मुल्क" दो ऐसी फिल्में है जो मुख्य धारा के सिनेमा को रिप्रजेंट करती है
"जय भीम "अपने प्रजेंटेशन में मराठी फिल्म "कोर्ट" जितनी यथार्थवादी और दृश्यों को लेकर उतनी सचेत फ़िल्म नही है पर फिर भी मुख्य धारा के सिनेमा के ऑडिएंस की लिमिटेशन को ध्यान में रखकर बनाई गई फ़िल्म है जिसकीं कुछ कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है .
 
 

 
फ़िल्म इसलिए देखी जानी चाहिए
क्योंकि ये कानून की व्यवस्था के मार्गो की पड़ताल करती है जिसमे पुलिस वकील और अदालत है .
जातियों को लेकर पूर्वाग्रह से भरा समाज है .ये वापस रिकॉल कराती अब भी हम एक ऐसी व्यवस्था में रह रहे है जो दो खांचों में विभाजित है .एक "इनविजिबल लाइन!" ने दो खाने बना रखे है एक तरफ अमीर है और दूसरी तरफ गरीब .
गरीबी के हर्डल बहुत है उसे हर आवश्यक चीज़ के लिए एक हर्डल पार करना होता है.गुजरते वक़्त के साथ व्यवस्थाये दुरस्त होने के बजाय और असक्षम होती जा रही हैं,ट्रांसपेरेंट और अंतिम व्यक्ति की रीच में होने के बजाय दूर ओर अधिक ऊंची होती जा रही है.
व्यवस्थाओं पर व्यक्तियों का कब्जा हो रहा है , उन्हें प्लांड वे में और कमजोर किया जा रहा है ताकि उनका लोकतांत्रिक चरित्र और कमजोर किया जा सके .
शहरी समाज का एक हिस्सा जो कंफर्टेबल ज़ोन में रहता आया है वो इस निर्मित व्यवस्था की क्रूरता से अनजान है .
फ़िल्म के कई हिस्से आपको क्रूर लगेंगे पर यही सच है विशेष कर थाने के दृश्य ,घरों से खींच कर सस्पेक्टेड के साथ किया जाने वाला बर्ताव ,पुलिस वालों की बॉडी लैंग्वेज . उनमे गिल्ट का अभाव.
जातियां केवल गांव में ही नही शहरों में भी बेताल की तरह लोगो की पीठ से लदी है .पढ़े लिखे लोगो की पीठ जो बेताल को ही नही छोड़ना चाहती .
फ़िल्म देखिये क्योंकि ये बतायेगी के इसी दुनिया के कई हिस्से है और कुछ हिस्सों की दुनिया मे ईश्वर की उपस्थिति लेट हुई है ,और उस दुनिया को अब भी मनुष्य ही चला रहे है.
 
Writer : Anurag Arya

Friday, 21 November 2014

महिलाओं के लिए अमेरिका में पढ़ने के अवसर

वकालत शिक्षा, परोपकार और शोध द्वारा महिलाओं और लड़कियों का समान रूप से विकास अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी वुमेन यानी एएयूडब्ल्यू का उद्देश्य है। एएयूडब्ल्यू आर्थिक और शैक्षिक बाधाओं को दूर करता है जिससे महिलाओं को करियर बनाने का अच्छा मौका मिलता है। एएयूडब्ल्यू उन महिलाओं का, जो अमेरिका की नागरिक नहीं हैं या पर्मानेंट रेजीडेंट नहीं हैं, को अमेरिका में रहकर फुलटाइम स्टडी या रिसर्च करने का अवसर प्रदान करता है। ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट, दोनों कोर्सो को वहां की मान्यता प्राप्त संस्थाओं के सहयोग से कराया जाता है। एएयूडब्ल्यू राज्यस्तरीय नेटवर्क है जिसमें 170,000 सदस्य और सपोटर्स हैं, 1,000 स्थानीय ब्रांच हैं और 800 कॉलेज और यूनिवर्सिटी इसके पार्टनर्स हैं। खासतौर से शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए प्राइवेट फंडिंग के लिए एएयूडब्ल्यू राष्ट्र का सबसे बड़ा स्रेत है जो सीधे महिलाओं और लड़कियों को लाभान्वित करता है। हर साल एएयूडब्ल्यू 200 से ज्यादा महिलाओं को फेलोशिप और ग्रांट
प्रदान करता है। मूल रूप से एएयूडब्ल्यू विविधतापूर्ण मेंबरशिप को मान्यता देता है। इस संस्थान में लैंगिक, जाति, उम्र, राष्ट्रीय ता, मूल, अशक्तता या वर्ग जैसी कोई बाधाएं नहीं हैं। योग्यता इस अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप का अस्तित्व 1917 से है। यह फेलोशिप अमेरिका में एक वर्षीय ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट कार्यक्रम में अध्ययन के लिए सहयोग करता है। इसे उन महिलाओं को प्रदान किया जाता है जो अमेरिकी नागरिक नहीं होती। जिन महिलाओं के पास डय़ूल सिटीजनशिप यानी अमेरिकी नागरिकता के साथ ही दूसरे देश की नागरिका हो, तो वह भी इस स्कॉलरशिप की पात्र नहीं हो सकतीं। उन्हीं महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है जो पहले से ही नगर, समाज या प्रोफेशनल वर्क में महिलाओं और लड़कियों की प्रगति की प्रतिज्ञा लेती हैं। यह फेलोशिप अमेरिका में अध्ययन करने का अवसर देती है, इसमें इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ यूनिवर्सिटी वुमेन की गिनी-चुनी सदस्यों को ही अवसर मिलता है। पाठय़क्रम पूरा होने के पश्चात कैंडीडेट में अपने होम कंट्री लौट कर करियर बनाने का इरादा होना जरूरी है। कैंडीडेट्स को अंग्रेजी में निपुण होना आवश्यक है, नहीं तो उसे इस बात का सत्यापन कराना होगा कि उसकी क्षेत्रीय भाषा अंग्रेजी है या उसने अंग्रेजी में सेकेंड्री डिप्लोमा या इंग्लिश-स्पीकिंग इंस्टीट्यूशन से अंडर ग्रेजुएट डिग्री या फिर उसने इंग्लिश स्पीकिंग कॉलेज या यूनिवर्सिटी से अक्टूबर 2012 और सितम्बर 2014 के बीच फुलटाइम अध्ययन कर रखा है। स्कॉ लरशिप्स के प्रारूप मास्टर्स/प्रोफेशनल फेलोशिप : 18,000 डॉलर डॉक्टोरेट फे लोशिप : 20,000 डॉलर पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप : 30,000 डॉलर इंटरनेशनल फेलोशिप्स फंड केवल शैक्षिक खर्च, रहने का खर्च, निर्भर बच्चे की देखभाल और प्रोफेशनल मीटिंग के लिए यात्रा का खर्च देता है। कॉन्फ्रेंस या सेमिनार लंबे समय से नहीं हुआ है लेकिन फेलोशिप का दस प्रतिशत इसके लिए मिल सकता है। अंतिम तिथि मास्टर्स/फस्र्ट प्रोफेशनल डिग्री या डॉक्टोरल प्रोग्राम में दाखिला लेने के लिए 1 दिसम्बर 2014 है। पोस्ट डॉक्टोरल के लिए आवेदन करने वाले कैंडीडेट्स को अपना डॉक्टोरेट डिग्री का प्रूफ देना होगा। आवेदन का प्रारूप आवेदन और सपोर्टिंग डॉक्युमेंट्स को ऑनलाइन जमा किया जा सकता है।

Wednesday, 6 August 2014

अमरबेल

अमरबेल -
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यह एक ही वृक्ष पर प्रतिवर्ष पुनः नवीन होती है तथा यह वृक्षों के ऊपर फैलती है , भूमि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं रहता अतः आकाशबेल आदि नामों से भी पुकारी जाती है | अमरबेल एक परोपजीवी और पराश्रयी लता है , जो रज्जु [रस्सी ] की भांति बेर , साल , करौंदे आदि वृक्षों पर फ़ैली रहती है | इसमें से महीन सूत्र निकलकर वृक्ष की डालियों का रस चूसते रहते हैं , जिससे यह तो फलती- फूलती जाती है , परन्तु इसका आश्रयदाता धीरे - धीरे सूखकर समाप्त हो जाता है | आज हम अमरबेल के कुछ औषधीय गुणों की चर्चा कर रहे हैं ----

१-अमरबेल को तिल के तेल में या शीशम के तेल में पीसकर सर पर लगाने से गंजेपन में लाभ होता है तथा बालों की जड़ मज़बूत होती हैं | यह प्रयोग धैर्य पूर्वक लगातार पांच से छह सप्ताह करें |
२- लगभग ५० ग्राम अमरबेल को कूटकर १ लीटर पानी में पकाकर , बालों को धोने से बाल सुनहरे व चमकदार बनते हैं तथा बालों का झड़ना व रुसी की समस्या इत्यादि भी दूर होती हैं |
३- अमरबेल के १०-२० मिलीलीटर रस को जल के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल पीने से मस्तिष्कगत तंत्रिका [Nervous System ] रोगों का निवारण होता है |
४- अमरबेल के १०मिली स्वरस में ५ ग्राम पिसी हुई काली मिर्च मिलाकर खूब घोटकर नित्य प्रातः काल ही रोगी को पिला दें | तीन दिन में ही ख़ूनी और बादी दोनों प्रकार की बवासीर में विशेष लाभ होता है |
५- अमरबेल को पीसकर थोड़ा गर्म कर लेप करने से गठिया की पीड़ा में लाभ होता है तथा सूजन शीघ्र ही दूर हो जाती है । अमरबेल का काढ़ा बनाकर स्नान करने से भी वेदना में लाभ होता है |
६- अमरबेल के २-४ ग्राम चूर्ण को या ताज़ी बेल को पीस कर थोड़ी सी सोंठ और थोड़ा सा घी मिलाकर लेप करने से पुराना घाव भी भर जाता है |

Saturday, 19 July 2014

होटल इंडस्ट्री

टूरिस्ट की बढ़ती संख्या की वजह से हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में काफी तेजी देखी जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल 83 हजार के अधिक लोगों को इस इंडस्ट्री में नौकरियां मिल सकती हैं। स्वागत करने को तैयार इस सेक्टर में आप भी बना सकते हैं करियर..
विदेशी सैलानियों के बीच भारत पसंदीदा डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है और पिछले कुछ वर्र्षो में यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इससे होटल इंडस्ट्री में भी तेजी देखी जा सकती है। भारत में होटल इंडस्ट्री के विकास का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। इस फील्ड में संभावनाओं को देखते हुए होटल मैनेजमेंट से जुड़े कोर्स कर लेते हैं, तो भविष्य में चमकदार करियर बनाया जा सकता है।
होटल इंडस्ट्री और टूरिजम सेक्टर
होटल इंडस्ट्री का सीधे तौर पर टूरिस्ट से जुड़ा होता है। यदि टूरिस्ट आते हैं, तो होटल इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है। 12वींपंचवर्षीय योजना के मुताबिक, 2016 तक भारत में 11.24 मिलियन विदेश टूरिस्ट के आने की संभावना है। वहींइस दौरान 1451.46 मिलियन घरेलू टूरिस्ट भी होंगे। प्लानिंग कमीशन के मुताबिक, 2016 तक देश में करीब 50 लाख रूम्स की जरूरत होगी।
कैसे मिलेगी एंट्री
12वीं पास स्टूडेंट होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा या डिग्री हासिल कर सकते हैं। नेशनल काउंसिल फॉर होटल मैनेजमेंट एेंड कैटरिंग टेक्नोलॉजी के संस्थानों में बीएससी इन हास्पिटैलिटी एेंड होटल मैनेजमेंट कोर्स में दाखिले के लिए संयुक्तप्रवेश परीक्षा होती है। इसके लिए 12वीं में कैंडिडेट्स का 50 प्रतिशत मा‌र्क्स होना जरूरी है।
कौन-कौन से कोर्स
एलबीआईआईएचएम के डायरेक्टर कमल कुमार के मुताबिक, 12वीं के बाद बीए इन होटल मैनेजमेंट, डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेंट, बैचलर डिग्री इन होटल मैनेजमेंट, डिप्लोमा इन होटल एेंड कैटरिंग मैनेजमेंट, बैचलर डिग्री इन हॉस्पिटैलिटी साइंस, बीएससी होटल मैनेजमेंट एेंड कैटरिंग साइंस जैसे कोर्स कर सकते हैं। इसकी अवधि 6 महीने से 3 साल तक है। इसके अलावा, पीजी डिप्लोमा इन होटल मैनेजमेंट, एमएससी इन होटल मैनेजमेंट और एमए इन होटल मैनेजमेंट कोर्स कर सकते हैं। इसकी अवधि 2 साल है। पर्सनल स्किल
इस इंडस्ट्री में करियर बनाने के इच्छुक स्टूडेंट्स की पर्सनैलिटी आकर्षक होने के साथ-साथ इसके लिए कम्युनिकेशन स्किल भी शानदार होनी चाहिए। तार्किक सोच के साथ-साथ एडमिनिस्ट्रेशन स्किल भी अच्छी होनी चाहिए।
जॉब के मौके
सुंदरदीप ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डाक्टर अंजू सक्सेना के मुताबिक, होटल मैनेजमेंट कोर्स करने के बाद आप होटल एवं हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में कार्य की शुरुआत कर सकते हैं। इसके अलावा, होटलों में किचन मैनेजमेंट, हाउसकीपिंग मैनेजमेंट, एयरलाइन कैटरिंग, केबिन सर्विसेज, सर्विस सेक्टर में गेस्ट या कस्टमर रिलेशन एग्जिक्यूटिव, फास्ट फूड चेन, रिसॉर्ट मैनेजमेंट, क्रूज शिप होटल मैनेजमेंट, गेस्ट हाउसेज, हॉस्पिटल ऐडमिनिस्ट्रेशन, कैटरिंग, रेलवे या बैंक या बड़े संस्थानों में कैटरिंग या कैंटीन आदि में भी जॉब्स मिल सकती हैं।
सैलरी पैकेज
करियर के शुरुआती दौर में 12 -18 हजार रुपये प्रति माह मिल सकते हैं। कुछ वषरें का अनुभव हासिल करने के बाद सैलरी अच्छी हो सकती है।
ई-मार्केटिंग का जमाना
जेपी बिजनेस स्कूल नोएडा द्वारा सोशल मीडिया और ई-मार्केटिंग पर नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें सोशल मीडिया और ई-मार्केटिंग पर आधारित रिसर्च और नई जानकारियां शेयर की गईं। इस मौके पर जेआइआइटी नोएडा के वाइस चांसलर प्रो. एससी सक्सेना ने कहा कि टेक्नोलॉजी के माध्यम से बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन में काफी चेंज आया है। जेईएस के सीईओ डॉ.वाई मेदुरी ने अपने भाषण में ई-बिजनेस द्वारा विकसित और इस्तेमाल किए जा रहे रेवेन्यू मॉडल पर जोर दिया। इसके बाद एनआइआइटी टेक्नोलॉजीज के एशिया पैसेफिक इंडिया और मिडिल ईस्ट के प्रेसिडेंट अरविंद मेहरोत्रा ने सेल्फ सर्विस प्रोपगेशन यूजिंग डिजिटल एसेट फॉर कस्टमर्स ऐंड इंसाइड द आर्गेनाइजेशन विषय पर बताया कि कैसे सोशल मीडिया की मदद से औद्योगिक संस्थाएं कंज्यूमर्स की भावनाओं को प्रभावित कर रही हैं। गूगल कंज्यूमर मार्केटिंग के हेड गुनीत सिंह ने गूगल द्वारा अपनाए जा रहे न्यू मीडिया और एडवरटाइजिंग स्ट्रैटेजी की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित कराया। आइएमआइ दिल्ली की प्रो. डॉ. नीना सोंधी ने वर्चुअल व‌र्ल्ड में कस्टमर्स को इंगेज करने के उपायों पर रोशनी डाली। कॉन्फ्रेस में कॉर्पोरेट जगत से एमएमटीसी, आइएमआरबी, जेपी होटल्स, जेपी ग्रीन्स, जेपी सीमेंट, जेआइएलआइटी ऐंड जेपी कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन आदि के प्रतिनिधि शामिल हुए।

Saturday, 9 March 2013

खाप पंचायत का आखिर खौफ क्यों?

सामाजिक मूल्यों और मान-मर्यादा की रक्षा के नाम पर खाप पंचायतें जब-तब मनमाने फरमान जारी करती रही हैं। उनके इस रवैए को लेकर कई बार अदालतें फटकार लगा चुकी हैं। मगर उन पर कोई असर हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। इसका ताजा उदाहरण बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के बहाने लड़कियों के लिए जारी उनका निर्देश है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और हरियाणा की कुछ खाप पंचायतों ने हुक्म दिया कि लड़कियां मोबाइल फोन लेकर न चलें। उनके पहनावे को लेकर भी इन पंचायतों ने कुछ मानक तय किए हैं। खाप पंचायतों के ऐसे बेतुके आदेशों के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उकत्तर प्रदेश और हरियाणा की विभिन्न खाप पंचायतों के प्रमुखों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को तलब किया था। लड़कियों के मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगाने जैसे फैसले को अदालत ने गैर-कानूनी करार दिया है। उसने कहा कि इस तरह कोई व्यक्ति किसी के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकता। अदालत ने खाप पंचायतों के समांतर अदालत चलाने पर भी फटकार लगाई है। देखना है, इससे स्त्रियों के प्रति खाप पंचायतों के नेताओं के व्यवहार में कितना बदलाव आ पाता है। अंतरजातीय या फिर एक ही गोत्र में विवाह करने वाले जोड़ों की हत्याओं के मामले में जातीय पंचायतों ने अदालत के सामने यह साबित करने की कोशिश की कि वे उन मामलों में प्रत्यक्ष रूप से भागीदार नहीं थीं। मगर पूछा जाना चाहिए कि क्या वे ऐसा दकियानूस और कट््टर माहौल बनाने में अपनी भूमिका से भी इनकार कर सकती हैं? अगर ऐसे विवाहों के खिलाफ वे खड़ी न होतीं तो किसी युगल के घर-गांव छोड़ कर भागने, पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाने या अदालत की शरण लेने की नौबत क्यों आती?
खाप पंचायतों के ऐसे रवैए पर सर्वोच्च न्यायालय पहले भी कई बार फटकार लगा चुका है। मगर उनके खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए जा सके तो इसकी कुछ वजहें जाहिर हैं। अपने इलाकों में इन पंचायतों का दबदबा इस कदर बढ़ चुका है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी उनके खिलाफ खड़ा होना तो दूर, उनकी आलोचना से भी बचती है। बल्कि कई स्थानीय राजनीतिक उनके साथ नजर आते हैं। पुलिस का रवैया भी अक्सर इससे अलग नहीं होता। यहां एक सवाल उन नागरिक अधिकारों का है जिनकी गारंटी संविधान ने दी हुई है। इन अधिकारों से किसी को वंचित करना एक गैर-कानूनी कृत्य है। दूसरा सवाल स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर गलत धारणाएं फैलाने की कोशिशों से जुड़ा है। यह समझना मुश्किल है कि पास में मोबाइल फोन रखने से किसी लड़की के लिए असुरक्षा का खतरा कैसे पैदा होता है? जबकि इस साधन के जरिए वह अपने परिजनों और पुलिस को फौरन सूचित कर किसी संकट से उबरने की उम्मीद कर सकती है? ऐसा लगता है कि मोबाइल फोन की मनाही के पीछे असल इरादा लड़के-लड़कियों के संपर्क को हतोत्साहित करना है। हरियाणा में पिछले डेढ़-दो महीनों में बलात्कार की कई घटनाएं हुर्इं। इनमें से ज्यादातर मामलों में पीड़ित दलित समुदाय की थीं। उन घटनाओं पर किस पंचायत की चिंता दिखी? जो लोग यौन हिंसा से जुड़े सामाजिक कारकों और पुलिस-प्रशासन की उदासीनता को नजरअंदाज कर पहनावे आदि का सवाल उठा रहे हैं, दरअसल वे देश भर में उठी बहस को गलत दिशा में मोड़ना चाहते हैं।

Mamta Maurya

Saturday, 1 December 2012

स्वाइन फ्लू Swine flu

स्वाइन फ्लू Swine flu

करीबन दो महीने से स्वाइन फ्लू पर लिखने की चेष्ठा कर रही हूँ। लिख नहीं रही। कहीं दूर से बैठे किसी ग्राफ का विश्लेषण करने जैसे लग रहा था। बच्चे रोज़ अस्पताल आ रहे थे। सर्दी खाँसी आम सी बात थी। पर स्वाइन फ्लू कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। आने वाली आफत और सामने वाली आफत में भारी फर्क है। एक को हम बिल्कुल नहीं जानते और दूसरे से जूझने के सिवा चारा नहीं होता। जिस बात से हम अनिभिज्ञ हैं हम उससे अपने सारे जाने अनजाने डर जोड़ देते हैं। स्वाइन फ्लू से जब नज़र मिलाई तो महसूस हुआ इसका चेहरा इतना विकृत भी नहीं।




सर्दी, खाँसी और फ्लू




साधारण सर्दी खाँसी और फ्लू में बहुत सारी बातें एक सी हैं। किसी भी वायरस के संक्रमण पर शरीर उसे बाहर फेंकने की कोशिश करता है। खाँसना, छींकना, जाड़ा, उल्टियाँ यह सब इसमें मदद करती हैं। साधारण सर्दी जुकाम के लक्षण नाक के आसपास होते हैं। इनके लिए जिम्मेदार होते हैं नोस वायरसस। रेस्पिरेटरी सिनसायटियल वायरस खास तौर पर जिम्मेदार माना गया है। कभी कबार इनफ्लूएंज़ा वायरस भी सर्दी खाँसी के जिम्मेदार हो सकते हैं। कॉमन कोल्ड के मुख्य लक्षण नाक बंद होना, छींके आना और नाक का बहना है। बड़े लोगों और बड़े बच्चों में बुखार अक्सर नहीं आता। छोटे बच्चों में 100 से 102 फैरनहीट जितना बुखार आता है। गले में खराश अक्सर पाई जाती है पर गला खराब नहीं होता और उसमे लाली नही दिखती। साल भर में बच्चों में तीन से आठ बार तक सर्दी खाँसी हो सकती है। ठंडी और बरसात के मौसम में इसकी संभावना अधिक हो जाती है। बहती हुई नाक में यह वायरस बड़ी संख्या मे होता है। खाँसने, छींकने, नाक साफ करने पर, किसी संक्रमित जगह छूने के बाद चेहरा छूने पर यह वायरस फैलता है। सर्दी के वायरस के संपर्क में आने के एक से पाँच दिन के भीतर लक्षण शुरु हो जाते हैं। एक से तीन दिन में नाक से बहता पानी, हरे या पीले रंग का हो जाता है। बच्चों के कान के पर्दे लाल हो जाते हैं। करीबन सात दिन में सर्दी का असर खत्म हो जाता है।

साधारण सर्दी के सभी लक्षण गले से ऊपर के हिस्से में होते हैं। फ्लू का असर पूरे शरीर पर होता है। फ्लू इन्फ्लूएंज़ा वायरस से होता है। अधिकतर सभी को साल में एक से तीन बार तक हो सकता है। साथ में तेज बुखार होता है - बच्चों में भी और बड़ों में भी। इसके लक्षणों से तकलीफ तो होती है किंतु यह कोई भयानक रोग नहीं है। फ्लू में अचानक से तेज़ बुखार आ जाता है (102-106), चेहरा लाल , गाल सुर्ख हो जाते हैं,शरीर में दर्द उठता है ,थकान होती है और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। कभी कबार चक्कर भी आते हैं और उल्टियाँ भी हो सकती हैं। बुखार एक दो दिन तक रहता है और कभी कबार पाँच दिन तक भी। दूसरे दिन से शरीर की तकलीफ कम होने लगती है और श्वास से संबंधित तकलीफ बढ़ जाती है। यह वायरस जहाँ केन्द्रित होते है उसके अनुसार् सर्दी, खाँसी, गले मे दर्द ,कान मे इंफेक्श्न, ब्रोंकिओलिटिस या नयूमोनिया के लक्षण दर्दी मे पाये जाते है। फ्लू का सबसे आम लक्षण है सूखी खांसी आना। अधिकतर लोगो मे सरदर्द और गले का लाल होना भी शामिल है। नाक का बहना और छींके आना भी आम है। यह सभी लक्षण चार से सात दिन के भीतर बेह्तर हो जाते है। कभी कभी इस दौरान बुखार फिर चड़ने लगता है। हफ्तों तक फ्लू से उत्पन्न कमज़ोरी रह सकती है। दर्दी सर्दी, खांसी से इस वायरस के सपर्क मे आते है। एक से सात दिन मे लक्षण दिखने शुरु होते है। हवा मे फैलने की वजह से फ्लू की संक्रमण शक्ति बेहद अधिक होती है। देखते ही देखते बडी संख्या मे बहुत लोग एक साथ बीमार हो जाते है।

फ्लू वैक्सीन


फ्लू से जूझने के लिये फ्लू वैक्सीन उप्लब्ध है। यह वैक्सीन किसी भी साल मे हुए फ्लू वायरस के स्ट्रैन पर आधारित है। जब फ्लू के नये स्ट्रैन होते है तो यह वैक्सीन कारगर नही रहती। जाहिर है कुछ सालो मे यह वैक्सीन बाकी सालों के मुकाबले अधिक कारगर रहती है।
फ्लू के स्ट्रैन में परिवर्तन होने पर यह घातक रूप धारण कर सकती है। इस शतक के शुरु मे इससे काफी जानलेवा महामारी फैली थी। ऐसी ही महामारी बीच बीच मे फैलती रहती है। साधारण तौर पर भी अकेले अमेरिका मे ही करीबन तीस से चालीस हज़ार लोग इससे ग्रस्त होकर जान से हाथ धो बैठते है। जिन लोगो मे पहले से कोई कमज़ोरी होती है वो गभीर रूप से बीमार हो सकते है। अगर काफी कम या ज़्यादा उम्र , कैंसर या डायबिटिस जैसे रोग, श्वास संबंधित रोग वगैरह हों तो इसका संक्रमण अधिक जोर पकड़ता है।


फ्लू और फ्लू महामारी

जब से मेक्सिको में स्वाइन फ्लू वायरस की खबर मिली इसमें महामारी फैलाने की क्षमता का अंदेशा होने लगा। दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में फ्लू का मौसम अलग अलग समय है। फ्लू वायरस लगातार बदलते हैं। और इसीलिए दोनो गोलार्ध में एक से वायरस नहीं पाये जाते। महामारी फैलाने वाले फ्लू वायरस का आचरण साधारण फ्लू वायरस की तरह नहीं होता। यह उससे अधिक घातक होते हैं। अधिक आसानी से संक्रमित करते हैं। सही परिस्थिति में चिड़िया, सूअर वदैरह के फ्लू वायरस के जीन ह्यूमन फ्लू वायरस का अंश बन जाते हैं। चूँकि हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को इसका कोई परिचय नहीं होता, उसका प्रतिकार सक्षम नहीं होता। ऐसे में फ्लू वायरस शरीर पर आसानी से कब्जा जमा सकता है।

फ्लू वायरस के कितने प्रकार

तीन प्रकार। ए, बी, सी। ए से अधिकतर फ्लू के केसस होते हैं। सी के लक्षण बेहद कम होते हैं और यह पाया भी सबसे कम जाता है।

ए- इसमें 16 H और 9 N प्रकार शामिल हैं। H का मतलब हीमअग्लूटिनिन, N का मतलब न्यूरामिनिडेस। यह वायरस पर पाये जाने वाले डाँचे हैं जिनसे इनकी पहचान सँभव है। बर्ड फ्लू का वायरस है H5N1 । मनुष्यों में फिलहाल जो तीन वायरस फ्लू फैला रहे हैं वे हैं ए वायरस( two A viruses) – (A) H1N1 और (A)H3N2 – तथा एक बी (B ) वायरस. इंसानों में जो H1N1 वायरस पाया जाता है वो सवाइन फ्लू के H1N1 वायरस से अलग है।

महामारी का मतलब जानलेवा नहीं

यह समझना बेहद जरूरी है कि महामारी का मतलब जानलेवा बीमारी नहीं है। WHO ने जब स्वाइन फ्लू को महामारी कहा उनका तात्पर्य इस वायरस के फैलने की तेज़ी और क्षमता से था। दोनो गोलार्ध में एक साथ पाया जाना, मौसम और तापमान से संबन्ध ना होना - यह बातें इसे महामारी बनाती हैं।

फ्लू सर्दी के मौसम में अधिक क्यों
-अधिक समय घर के अंदर, धूप से दूर
-विटामिन डी की कमी
-हवा में सीलन की कमी जिससे श्वास के अवयव शुष्क जाते हैं और रोगाणु आसानी से पकड़ पा लेते हैं

क्या हाल की फ्लू वैक्सीन आपकी रक्षा करने में सक्षम है

मनुष्यों और स्वाइन फ्लू में पाया गया H1N1 स्ट्रैन एक दूसरे से काफी अलग है इसलिए यह कहना मुष्किल है कि हाल की वैक्सीन कितनी सुरक्षा दे सकता है।

फिर भी 65 से ऊपर के सभी, आरोग्य कार्यकर्ता, हृदय संबंधित रोगों,डायबीटिस, अस्थमा से पीड़ित लोगों का, गर्भवति स्त्री वगैरह का इस वैक्सीन का लेना जायज़ है। CDC (Centre of Disease Control) के हाल के निर्देश के हिसाब से सभी को खास तौर से बच्चों को यह वैक्सीन लेनी चाहिए।

फ्लू से स्वस्थ नौजवानों की मृत्यु क्यों
सही कारण मालूम नहीं है। किंतु अंदेशा लगाया जाता है कि इसका कारण सायटोकीन स्टार्म (cytokine storm) है। फ्लू के वायरस के दावा बोलते ही रोग प्रतिकारक शक्ति पूरी सेना उसके खिलाफ छोड़ देती है। इससे बुखार, शरीर में दर्द और अवयवों का विफल होना शुरु हो जाता है। वायरस की साफ पहचान ना होने की वजह से उसका बाल भी बाँका नहीं होता।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि फ्लू से अधिक नौजवानों की मौत होती है। मृत में 90 फीसदी लोग 65 की उम्र के ऊपर पाये जाते हैं।

क्या वजह है कि फ्लू वायरस की इतनी दहशत है

वायरस जीव और निर्जीव के बीच की एक अवस्था है। कालांतर से यह बदलते जा रहे हैं। खुद के जैसों के उत्पादन में यह लगातार भूल करते हैं। जो भूल जिंदा रहने में सक्षम होती है आगे बड़ जाती है। यह हवा में धूल की तरह फैल कर शरीर तक पहुँचते हैं और वहाँ पहुँच कर सँख्या में बढ़ते हैं और दावा बोल देते हैं। यह इतनी जल्दि और लगातार बदलते हैं कि शरीर के लिए इनकी पूरी पहचान सँभव नहीं हो पाती। शरीर हर बार इसका नया रूप देखता है। जब तक वह खुद को इससे लड़ने को तैयार करता है यह फिर बदल जाता है।
H प्रोटीन इसे गले, श्वास नलियों की कोशिकाओं में चिपकने में मदद करता है और N प्रोटीन इन कोशिकाओ में पनप कर इन्हे तोड़ कर बाहर निकल बाकी कोशिकाओं पर हमला करने में सँभव।

टैमीफ्लू जैसी दवा इन HN प्रोटीन्स पर हमला करते हैं । किंतु अगर इनका डाँचा और बदल जाये तो जरूरी नहीं कि यह सक्षम रह सके।


ये कहाँ आ गये हम साथ साथ चलते




स्वाइन फ्लू एक महामारी है
स्वाइन फ्लू साधारण तौर पर जानलेवा नहीं है
स्वाइन फ्लू जानलेवा बन सकती है
फ्लू के बाकी वायरस की तरह ही यह भी हवा में और हवा से फैलती है
खाँसने, छींकने और बहती नाक हाथ से पोँछने से वायरस को फैलने में आसानी होती है
कड़ी धूप में यह नहीं पनप सकती
साबुन और पानी के सामन नहीं टिक सकती
बंद कमरे , भीड़ , सफाई की कमी में यह जोर पकड़ती है
स्वस्थ शरीर में अक्सर नहीं टिक पाती है
यह बदल रही है....बुरे के लिए भी हो तसकता है और अच्छे के लिए भी
वैक्सीन की खोज समझो पूरी हुई
वैक्सीन के आते ही वायरस बदलेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं

हम क्या करें...क्या कर सकते हैं









1. साफ सफाई रखें और नियमित हाथ धोये।
2.चेहरे पर बेवजह बार बार हाथ ना ले जाये
3. सर्दी खाँसी होने पर टिश्यू इस्तेमाल करें, नहीं तो बाँह ;और टिश्यू को लोगों के संपर्क में ना आने दें
4.सात से आठ घँटों की नींद, अच्छा भोजन जिसमें विटामिन सी और डी पर्याप्त मात्रा में हो
5.घर में धूप आने दें, ठंड से बचें और भीड़ में ना जायें
6.मास्क एक बैरियर का काम कर सकता है और भीड़ में आपके श्वास अवयवों तक वायरस को पहुँचने से रोक सकता है।
अगर घर में कोई स्वाइन फ्लू से ग्रसित है तो उसे एक कमरे तक सीमित रखें और कम से कम लोगों के संपर्क में उसे आने दें।
7. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।
8.हल्की सर्दी खाँसी का घर रह कर ही उपचार करें।
9. फ्लू के लक्षण दिखने पर अस्पताल से संपर्क करें और सिर्फ दर्दी को अस्पताल ले जायें।
10. स्वाइन फ्लू जानलेवा नहीं है और इसीलिए साधारण इलाज से भी बेहतर हो सकती है।
11. श्वास संबंधित लक्षणों के दिखने पर ( तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ होना), लगातार बहुत तेज बुखार होने पर, बेहोशी की अवस्था होने पर, या और कोई भी चिंताजनक गँभीर लक्षण दिखने पर देरी ना करें और डॉक्टर से मिलें।




स्वाइन फ्लू और मेरा अनुभव

स्वाइन फ्लू के केस अब नई बात नहीं रह गई है। करीबन पाँच कनफर्म्ड केस देखे हैं, सभी पाँच साल से छोटे, तीन बच्चे दो साल से छोटे। दो को टैमीफ्लू नहीं दिया गया था और बाकी को दिया गया था। सभी स्वस्थ हैं। मैं भी....अब तक। :-))

हर बीमारी हमारी अवस्था का बखान करती है। बीमारी से पता चलता है समाज की अवस्था का। प्लेग से दौड़ते चूहे याद आते हैं और एड्स से नैतिकता पर सवाल उठता है। कोलेरा से पीने के पानी की और ध्यान जाता है और मलेरिया से जमे हुए पानी पर। डायबिटिस और ब्लडप्रऐशर से जंक फुड्स की बाढ़ याद आती है।

स्वाइन फ्लू गरीबों और अमीरों दोनो पर हावी है-
गरीब कमज़ोर है, साफ नहीं है, भीड़ में रहता है, अच्छे खाने से वँचित है
अमीर ए सी गाड़ियों और घरों में रहता है,धूप से दूर रहता है हाथ धोने से ज्यादा टिश्यू पोंछने में विश्वास रखता है, देश विदेश जा सकता है और इन वायरस के संपर्क में आता है....

इलाज और रस्सी तक हम पहुँच ही गये हैं......हवादार कमरे, हाय से नमस्ते, साफ सुथरे हो जायें तो जीवित वायरस को निर्जीव करना इतना मुश्किल भी नहीं।
ये लेखक के निजी विचार है! लेखक का परिचय:
Mamta Maurya
M.sc
Allahabad University

Saturday, 20 October 2012

बच्चो के मस्तिष्क का बेहतर विकास

बच्चो के मस्तिष्क के बेहतर विकास के लिए विशेषज्ञों द्वारा सलाह दी जाती है कि बचपन से ही ब्रेन एक्सरसाइज करवाई जाये. ब्रेन एक्सरसाइज ज्यादा थकाने वाला और बोरिंग नहीं होना चाहिए. उसे मजेदार होने के साथ ही उसमें बधे का ज्यादा से ज्यादा इन्वॉल्वमेंट होना भी जरूरी है जिससे उन्हें दिये गये चैलेंजेज को पूरा करने के लिए वे अपने दिमाग का भरपूर इस्तेमाल करें. कुछ तकनीक जिससे बच्चो  के ब्रेन के एक्सरसाइज के साथ ही उनकी संज्ञानात्मक (कॉग्रिटिव) क्षमता भी बढती है. शोध बताते हैं कि बच्चो के ब्रेन का अधिकतम विकास १३ वर्ष की आयु तक हो जाता है. इसलिए हम जितनी जल्दी  बच्चो की मेंटल एक्सरसाइज की शुरुआत करेंगे , सुपर ब्रेन के विकास के उतने ही चांसेस ज्यादा होंगे.  बच्चोमें संज्ञानात्मक कौशल बढाने से उन्हें किसी चीज में फोकस करने में सहायता मिलती है, उनकी सोचने की क्षमता बढती है, वे प्लानिंग और प्राथमिकता के बारे में सीखते हैं, उनकी याद रखने और विजुलाइजेशन की क्षमता बढती है. बच्चो का ब्रेन एक्सरसाइज बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उनके सोचने और
बिहेवियरल पै टर्न पर लंबे समय तक के लिए असर पडता है.मजेदार एक्टिविटीज और क्रॉर्सवल्ड पजल या स्क्रबल खेलना जैसे क्रासवर्ल्ड को सुलझाना आदि बधे में ध्यान लगाने और सोचने की शक्ति में सहायता करते हैं. इस तरह की एक्टिविटीज से बधों के ब्रेन सेल्स की एक्सरसाइज होती है. मेंटल मैथ सदियों पुरानी तकनीक है मेंटल मैथ. यह मस्तिष्क के लेफ्ट और राइट दोनों ओर के फंक्शंस को इम्प्रूव करता है. यह मस्तिष्क की सोचने की क्षमता बढाने का प्रभावशाली तरीका है. साथ ही मस्तिष्क के फंक्शंस के विकास और उसकी मजबूती भी बढाते हैं. शतरंज शतरंज जैसे खेल उनके मस्तिष्क को स्टीमुलेट करने में सहायता करते हैं. बधों को ध्यान केंद्रित करने और रणनीति सीखाने में इस तरह के खेल बहुत मददगार होते हैं. मेमोरी एक्सरसाइज बहुत कम उम्र से ही मेमोरी एक्सरसाइज की शुरुआत कर देनी चाहिए. इसे आप बधे को उसके नाम की स्पेलिंग याद करवाकर कर सकती हैं. इसके अलावा घर केसदस्यों के नाम, टेलीफोन नंबर याद करवाएं और फिर धीरे-धीरे दूसरी कॉम्प्लेक्स चीजों को याद करवाने की कोशिश करें. नयी भाषा सिखाएं आपके बधे में लैंग्वेज स्किल का विकास होना भी बेहद जरूरी है क्योंकि यह उसके संपूर्ण विकास के लिए जरूरी है. कोई नयी भाषा सीखने से हमारे मस्तिष्क को चुनौती मिलती है और इससे मस्तिष्क की शक्ति भी बढती है. हॉबीज बढायें जब बधे नयी एक्टिविटीज सीखते हैं या उसमें भाग लेते हैं, उस दौरान मस्तिष्क उसे नये चैलेंज के रूप में ग्रहण करता है. यह ब्रेन की एक्टिविटी और उसके फंक्शन में इम्प्रूवमेंट लाता है. हालांकि दिये गये ब्रेन एक्सरसाइज बहुत सीमित है क्योंकि ब्रेन एक्सरसाइज की कोई सीमा नहीं है. बधे को फिजीकल एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें और पर्याप्त नींद लेने दें. यह उन्हें रिलैक्स होने में सहायता करेगा. साथ ही साथ बच्चो  के साथ मजेदार एक्टिविटीज करना न भूलें और उसे हंसने का खूब मौका दें क्योंकि स्ट्रेस फ्री माइंड और एक्टिव ब्रेन के लिए लाफ्टर सबसे बेहतर टॉनिक माना जाता है. 
ये लेखक के निजी विचार है! लेखक का परिचय:
Mamta Maurya
Home Science Department,
Allahabad University