Saturday, 1 September 2012

बच्चो का उत्पीडन द्वारा चिरागन child abuse by chiragan

Bal shoshan by Chiragan
पिछले दिनों दिल्ली में स्कूली बच्चों के साथ यौनाचार की घटना ने समाज की उन घिनौनी परतों को उघाड़ दिया है, जिसके नीचे न जाने कितने मासूम बच्चों के घाव उनके तन-मन को क्षत-विक्षत कर रहे है। कुछ घटनाएं समाचार पत्रों में छप कर सनसनी फैला देती है और फिर समय के साथ पुरानी हो जाती हैं, लेकिन यौनाचार की घटनाओं का एक 'समाचार मात्र' बन कर रहना इस देश के मासूमों के साथ घोर अन्याय है। उनके न भरने वाले जख्म हर दिन उन्हें मानसिक पीड़ा पहुचाते है। अफसोस की बात यह है कि जिन नौनिहालों की सुरक्षा का दायित्व परिवार और समाज का है, वही उनका शोषण करते है। हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने इस तथ्य का खुलासा किया है कि देश में हर चार में से एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। हर 155वें मिनट में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म होता है। 
यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 65 प्रतिशत बच्चे स्कूलो में यौन शोषण का शिकार होते है। 12 से कम आयु के 41.7 प्रतिशत बच्चे यौन उत्पीड़न से जूझ रहे है। भारत में बाल यौनाचार की बढ़ती घटनाओं का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में देश के दस और दुनिया के 35 बड़े शहरों में दिल्ली पहले स्थान पर है। बाल शोषण आधुनिक समाज का एक विकृत और खौफनाक सच बन चुका है। आमतौर पर बाल शोषण को बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दु‌र्व्यवहार माना जाता है लेकिन कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटर के अनुसार बच्चे के माता-पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है जिससे उस पर बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करे। हैरानी की बात तो यह है कि स्वयं को मानवता का पोषक मानने वाला देश 'बाल शोषण' के मुद्दे को ही खारिज कर देता है।
आमतौर पर अभिभावकों को इस तथ्य का अंदाजा ही नहीं होता है कि उनके बच्चे का यौन शोषण उनका कोई अपना ही कर रहा है। ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि करीबी रिश्तेदार और जान-पहचान के लोग ही बच्चों या बच्चियों के यौन उत्पीड़न के दोषी होते है। ऐसे में बच्चों को डरा-धमका कर या परिवार की मान-प्रतिष्ठा की दुहाई देकर मुंह बंद रखने को मजबूर किया जाता है। यौन उत्पीड़न के बहुत सारे मामले तो कानून की नजर में आ ही नहीं पाते हालाकि सरकारें और अनेक स्वयंसेवी संगठन जन-जागरण अभियान के जरिए लोगों को ऐसे मामले प्रकाश में लाने को प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहते है, मगर उनका अपेक्षित असर नहीं हो पाया है। इसका एक प्रमुख कारण हमारा सामाजिक ढाचा है, जहा 'प्रतिष्ठा' के लिए जान की कीमत भी कम आकी जाती है और अपने झूठे सम्मान को बचाए रखने के लिए अभिभावक अपने बच्चों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को सामने लाने से हिचकते है जो प्रत्यक्ष रूप से उन लोगों के लिए बढ़ावा है, जो नन्हे मासूमों को अपने शोषण का शिकार बनाते है।
bal shoshan chiragan

जून माह में बच्चों के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए विधि मंत्रालय ने एक नए कानून का मसौदा तैयार किया था। यूं तो प्रस्तावित अधिनियम के ज्यादातर प्रावधान पहले से चले आ रहे है, पर कई मायनों में यह एक नई पहल भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालती कार्यवाही को और मानवीय व त्वरित बनाने की कोशिश की गई है। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए हर जिले में विशेष अदालत का गठन और इनके लिए अलग से सरकारी वकील नियुक्त किए जाने का प्रस्ताव अदालती कार्यवाही को बच्चों के अनुकूल बनाएगा। प्रस्तावित अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि ऐसे मामलों में साल भर के भीतर फैसला सुनाया जाना जरूरी होगा। बाल उत्पीड़न के विरुद्ध इडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइन में सभी चिकित्सकों को निर्देश दिए गए है कि अगर उन्होंने बाल उत्पीड़न की सूचना समय पर नहीं दी तो उन्हें दो साल की जेल भी हो सकती है, पर इन सबसे ऊपर अभिभावकों और विद्यालय के शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चे के मनोभावों को समझें और उनकी सुरक्षा के लिए कदम उठाएं।
[डॉ. ऋतु सारस्वत: लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं उनके द्वारा छपे लेख से जनजागरण के लिए साभार ]

भारत में बाल शोषण और हम, आप द्वारा चिरागन Child abuse in india and we by Chiragan

Bal shoshan  भारत में बाल शोषण और हम, आप द्वारा चिरागन 
बाल शोषण आज हमारे लिए कोई अंजान शब्द नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज का एक विकृत और ख़ौ़फनाक सच बन चुका है. मौजूदा दौर में निर्दोष एवं लाचार बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं कि अब तो लोग इस ओर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देते. जबकि वास्तविकता यह है कि बाल शोषण बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है. हाल में देश में पहली बार बाल शोषण के मामलों की गहराई से जांच-पड़ताल के लिए कुछ पहल की गई हैं. 13 राज्यों में किए गए इस अध्ययन से संभव है कि इससे संबद्ध सभी पक्षों जैसे, परिवार, समुदाय, समाज एवं सरकार को मामले की गंभीरता और उसकी वास्तविकता का पता चले.
आमतौर पर माना जाता है कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार है, लेकिन सीडीसी (कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटर) के अनुसार, बच्चे के माता-पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है, जिससे उसके ऊपर बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करता हो. भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही को सिरे से नकार दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि ख़ामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की वारदातों को बढ़ावा ही दे रहे हैं.
केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से कराए गए इस अध्ययन में कई संवेदनशील तथ्य सामने आए हैं. यह पहला मौक़ा है, जब सरकार ने इतने विस्तृत पैमाने पर बाल शोषण के विवादित मसले पर कोई पहल की है. अध्ययन के परिणामों से जो बात सबसे ज़्यादा उभर कर सामने आई है, वह यह है कि 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बाल शोषण के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं. हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी न कभी शोषण का शिकार रहे हैं. अध्ययन के दौरान लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकारी तो 21.90 प्रतिशत बच्चों को भयंकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. इतना ही नहीं, क़रीब 50.76 प्रतिशत बच्चों ने एक या दूसरे तरह की शारीरिक प्रताड़ना की बात कबूली. बात इतने पर ही ख़त्म नहीं होती. मंत्रालय की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक़, देश का हर दूसरा बच्चा भावनात्मक शोषण का भी शिकार है.
आमतौर पर माना जाता है कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार है, लेकिन सीडीसी (कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटर) के अनुसार, बच्चे के माता-पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है, जिससे उसके ऊपर बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करता हो. भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही को सिरे से नकार दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि ख़ामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की वारदातों को बढ़ावा ही दे रहे हैं. देश में बाल शोषण की घटनाओं को ऐसे अंजाम दिया जाता है कि दोषी के साथ-साथ पीड़ित बच्चे भी खुलकर सामने नहीं आते. पीड़ित बच्चे शर्मिंदगी के चलते कुछ भी बोलना नहीं चाहते. इसके पीछे भी हमारी सामाजिक बनावट और मानसिकता काफी हद तक ज़िम्मेदार है. हम भी ऐसे बच्चों को कुछ अलग नज़र से देखने लगते हैं. संभवत: इसी लज्जा के चलते उन्हें दुनिया की निगाहों में ख़ौ़फ नज़र आता है. पश्चिमी देशों में हालात ऐसे नहीं हैं. शिक्षा के कारण वहां का समाज और वहां के बच्चे निडर होकर अपनी बात कह सकते हैं. वहां के बच्चों में कम से कम इतना साहस तो होता ही है कि वे दुनिया को खुलकर अपनी आपबीती बता सकें.
पारंपरिक रूप से भारत में बच्चों के लालन-पालन और उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी परिवार एवं सगे-संबंधियों की होती है. देश के संविधान में बच्चों के लिए कई तरह के मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया है, लेकिन इन अधिकारों को व्यवहार में लागू करने के मामले में ज़रूरत के अनुसार अहमियत नहीं दी जाती है. इसके बावजूद बाल शोषण जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को देश में अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है. शर्म की बात यह है कि संगीन अपराध की श्रेणी में आने वाले इस कृत्य के वजूद से ही हम इंकार कर देते हैं. जबकि सच्चाई यह है कि समस्या की गंभीरता के नज़रिए से इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहल करने की ज़रूरत है. देश में बाल शोषण के ख़िला़फ बनाए गए क़ानूनों की भरमार है, लेकिन इसमें कई गंभीर खामियां भी हैं. आज ज़रूरत इस बात की है कि सरकार, समाज एवं आम नागरिक मिलकर बच्चों के अधिकारों के महत्व को समझें और इसे पूरा करने के लिए मिलकर क़दम उठाएं. अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस (19 नवंबर) या बाल दिवस (14 नवंबर) के मौक़ों पर इसके लिए केवल हामी भर देने से कुछ नहीं हो सकता. इस दिशा में लगातार प्रयास करते रहने की ज़रूरत है, ताकि क़ानून और समाज इसके प्रति जागरूक हों. बाल शोषण से संबंधित अनेक ऐसे तथ्यपरक आंकड़े हैं, जो आगे की कार्रवाई के लिए आधार का काम कर सकते हैं. अब वह समय आ चुका है कि हम बाल अधिकारों के प्रति गंभीर हों.
बाल शोषण से निबटने के लिए जो क़ानूनी ढांचा उपलब्ध है, लोगों को उसकी जानकारी नहीं है और न कोई ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा इस जागरूकता को बढ़ाया जा सके. नतीजतन यह सामाजिक अभिशाप लगातार और गंभीर रूप धारण करता जा रहा है. यह इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि बच्चे ही हमारा भविष्य हैं और उनके हितों की सुरक्षा किए बग़ैर एक सुरक्षित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती. इसके लिए सबसे पहले हमें अपने नज़रिए में बदलाव लाना होगा, समस्या के वजूद को स्वीकार करना होगा. यह इतना आसान नहीं है. यह भी संभव है कि बदलाव के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़े, लेकिन यदि हम सभ्य समाज होने का दावा करते हैं तो हमें कभी न कभी शुरुआत तो करनी ही होगी.
चौथी दुनिया डोट कॉम से लोगो को जागरूक करने के लिए साभार लिया गया.