Monday, 31 December 2012
Saturday, 29 December 2012
एक रोचक जीवन वृत्त की कहानी शायद आपके आस पास भी कुछ ऐसी ही हो।
यात्रियों से खचाखच भरी ट्रेन में टी.टी.ई. को एक
पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह
पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स
में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स में
कुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस
... टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा -"यह
किसका पर्स है?"
एक बूढ़ा यात्री बोला -"यह मेरा पर्स है। इसे कृपया मुझे
दे दें।"टी.टी.ई. ने कहा -"तुम्हें यह साबित
करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है। केवल तभी मैं यह
पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं।"उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन
मुस्कान के साथ उत्तर दिया -"इसमें भगवान श्रीकृष्ण
की फोटो है।"टी.टी.ई. ने कहा -"यह कोई ठोस सबूत
नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण
की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है? पर्स में
तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है?"
बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला -"मैं तुम्हें
बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं
स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे
दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे।
मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी।
जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर
मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर
अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने
बालों को देखकर खुश हुआ करता था। कुछ साल बाद
मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे
बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर
उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे
को निहारा करता।
जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन
का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए
काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर
जाता ओर जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे
पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी।"
बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ
बोलना जारी रखा -"कई वर्ष पहले मेरे माता-
पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष
मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र
अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का क्त
नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था,
वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है। अब मैंने भगवान कृष्ण
की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है
कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ
रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता।
जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने
ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं
इतना अकेला नहीं होता।"
टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया। अगले
स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने
बुकस्टाल पर पहुंचा और विक्रेता से बोला -"क्या तुम्हारे
पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के
लिए चाहिए।
पुराना फटा सा पर्स मिला। उसने पर्स को खोलकर यह
पता लगाने की कोशिश की कि वह किसका है। लेकिन पर्स
में ऐसा कुछ नहीं था जिससे कोई सुराग मिल सके। पर्स में
कुछ पैसे और भगवान श्रीकृष्ण की फोटो थी। फिर उस
... टी.टी.ई. ने हवा में पर्स हिलाते हुए पूछा -"यह
किसका पर्स है?"
एक बूढ़ा यात्री बोला -"यह मेरा पर्स है। इसे कृपया मुझे
दे दें।"टी.टी.ई. ने कहा -"तुम्हें यह साबित
करना होगा कि यह पर्स तुम्हारा ही है। केवल तभी मैं यह
पर्स तुम्हें लौटा सकता हूं।"उस बूढ़े व्यक्ति ने दंतविहीन
मुस्कान के साथ उत्तर दिया -"इसमें भगवान श्रीकृष्ण
की फोटो है।"टी.टी.ई. ने कहा -"यह कोई ठोस सबूत
नहीं है। किसी भी व्यक्ति के पर्स में भगवान श्रीकृष्ण
की फोटो हो सकती है। इसमें क्या खास बात है? पर्स में
तुम्हारी फोटो क्यों नहीं है?"
बूढ़ा व्यक्ति ठंडी गहरी सांस भरते हुए बोला -"मैं तुम्हें
बताता हूं कि मेरा फोटो इस पर्स में क्यों नहीं है। जब मैं
स्कूल में पढ़ रहा था, तब ये पर्स मेरे पिता ने मुझे
दिया था। उस समय मुझे जेबखर्च के रूप में कुछ पैसे मिलते थे।
मैंने पर्स में अपने माता-पिता की फोटो रखी हुयी थी।
जब मैं किशोर अवस्था में पहुंचा, मैं अपनी कद-काठी पर
मोहित था। मैंने पर्स में से माता-पिता की फोटो हटाकर
अपनी फोटो लगा ली। मैं अपने सुंदर चेहरे और काले घने
बालों को देखकर खुश हुआ करता था। कुछ साल बाद
मेरी शादी हो गयी। मेरी पत्नी बहुत सुंदर थी और मैं उससे
बहुत प्रेम करता था। मैंने पर्स में से अपनी फोटो हटाकर
उसकी लगा ली। मैं घंटों उसके सुंदर चेहरे
को निहारा करता।
जब मेरी पहली संतान का जन्म हुआ, तब मेरे जीवन
का नया अध्याय शुरू हुआ। मैं अपने बच्चे के साथ खेलने के लिए
काम पर कम समय खर्च करने लगा। मैं देर से काम पर
जाता ओर जल्दी लौट आता। कहने की बात नहीं, अब मेरे
पर्स में मेरे बच्चे की फोटो आ गयी थी।"
बूढ़े व्यक्ति ने डबडबाती आँखों के साथ
बोलना जारी रखा -"कई वर्ष पहले मेरे माता-
पिता का स्वर्गवास हो गया। पिछले वर्ष
मेरी पत्नी भी मेरा साथ छोड़ गयी। मेरा इकलौता पुत्र
अपने परिवार में व्यस्त है। उसके पास मेरी देखभाल का क्त
नहीं है। जिसे मैंने अपने जिगर के टुकड़े की तरह पाला था,
वह अब मुझसे बहुत दूर हो चुका है। अब मैंने भगवान कृष्ण
की फोटो पर्स में लगा ली है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ है
कि श्रीकृष्ण ही मेरे शाश्वत साथी हैं। वे हमेशा मेरे साथ
रहेंगे। काश मुझे पहले ही यह एहसास हो गया होता।
जैसा प्रेम मैंने अपने परिवार से किया, वैसा प्रेम यदि मैंने
ईश्वर के साथ किया होता तो आज मैं
इतना अकेला नहीं होता।"
टी.टी.ई. ने उस बूढ़े व्यक्ति को पर्स लौटा दिया। अगले
स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही वह टी.टी.ई. प्लेटफार्म पर बने
बुकस्टाल पर पहुंचा और विक्रेता से बोला -"क्या तुम्हारे
पास भगवान की कोई फोटो है? मुझे अपने पर्स में रखने के
लिए चाहिए।
भिखारी ठाकुर के जीवन काल पर एक लेख
![]() |
| Bhikhari thakur भिखारी ठाकुर |
भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया, भाई-विरोध, बेटी-वियोग, विधवा-विलाप, कलयुग-प्रेम, राधेश्याम बहार, गंगा-स्नान, पुत्र-वध, गबरघिचोर, बिरहा-बहार, नकलभांड के नेटुआ, और ननद-भउजाई आदि नाटकों की रचना की। भजन-कीर्तन और गीत-कविता आदि की लगभग इतनी ही पुस्तकें प्रकाशित हुईं। लोक प्रचलित धुनों में रचे गये गीतों और मर्मस्पर्शी कथानक वाले नाटक बिदेसिया ने भोजपुरीभाषी जनजीवन की चिंताओं को अभिव्यक्ति दी। जीविका की तलाश में दूरस्थ नगरों की ओर गये लोगों की गांव में छूट गयी स्त्रियों की विविध छवियों को उन्होंने रंगछवियों में रूपांतरित किया। अपनी लोकोपयोगिता के चलते बिदेसिया भिखारी ठाकुर के समूचे सृजन का पर्याय बन गया। बेटी-वियोग में स्त्री-पीड़ा का एक और रूप सामने था। पशु की तरह किसी भी खूंटे से बांध दिये जाने का दुख और वस्तु की तरह बेच कर धन-संग्रह के लालच की निकृष्टता को उन्होंने अपने इस नाटक का कथ्य बनाया और ऐसी रंगभाषा रची जिसकी अर्थदीप्ति से गह्वरों में छिपीं नृशंसताएं उजागर हो उठीं। यह अतिशयोक्ति नहीं है और जनश्रुतियों में दर्ज है कि बेटी-वियोग के प्रदर्शन से भोजपुरीभाषी जीवन में भूचाल आ गया था। भिखारी ठाकुर को विरोध का सामना करना पड़ा। पर यह विरोध सांच की आंच के सामने टिक न सका। उनकी आवाज़ और अपेक्षाकृत टांसदार हो उठी। इतनी टांसदार कि आज़ादी के बाद भी स्त्री-पीड़ा का नाद बन हिंदी कविता तक पहुंची। बेटी-वियोग का नाम उन दिनों ही गुम हो गया और जनता ने इसे नया नाम दिया – बेटी-बेचवा। गबरघिचोर नाटक में भिखारी ठाकुर विस्मित करते हैं। उनकी पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी कि उन्होंने खड़िया का घेरा पढ़ा या देखा हो। कोख पर स्त्री के अधिकार के बुनियादी प्रश्न को वह जिस कौशल के साथ रचते हैं, वह लोकजीवन के गहरे यथार्थ में धंसे बिना सम्भव नहीं।
भिखारी ठाकुर पर यह आरोप लगता रहा कि वह स्वतंत्रता संग्राम के उथल-पुथल भरे समय में निरपेक्ष होकर नाचते-गाते रहे। यह सवाल उठता रहा कि क्या सचमुच भिखारी ठाकुर के नाच का आज़ादी से कोई रिश्ता था। उनके नाच का आज़ादी से बड़ा सघन रिश्ता था। अंग्रेज़ों से देश की मुक्ति के कोलाहल के बीच उनका नाच आधी आबादी के मुक्ति-संघर्ष की ज़मीन रच रहा था। भिखारी ठाकुर की आवाज़ अधरतिया की आवाज़ थी। अंधेरे में रोती-कलपती और छाती पर मुक्के मारकर विलाप करती स्त्रियों का आवाज़। यह आवाज़ आज भी भटक रही है। राष्ट्रगान से टकरा रही है। (आलोचना पत्रिका में पूर्व प्रकाशित लेख का संपादित अंश)
गैंगरेप पीड़िता ने ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई की थी
शनिवार को मौत की नींद में सो जाने वाली दिल्ली की साहसी युवती का सम्बंध
उत्तर प्रदेश के बलिया से था और उसने अपनी स्कूल तथा कॉलेज की शिक्षा का
खर्च ट्यूशन पढ़ाकर निकाला था. युवती को जानने वालों ने कहा कि वह मेहनती
थी और जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी.
जानने वालों के मुताबिक युवती
का परिवार करीब 25 साल पहले आकर दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के एक मध्य वर्गीय
परिवेश में बसा था. वहीं 23 वर्ष पहले युवती का जन्म हुआ था. युवती की
प्रतिभा को देखते हुए उसके पिता ने उच्च शिक्षा के लिए कर्ज लिया था.
कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद फिजियोथेरेपिस्ट का प्रशिक्षण लेने के
लिए वह देहरादून गई थी. वहां से लौटने के बाद उसने उत्तरी दिल्ली के एक
निजी अस्पताल में प्रशिक्षु के रूप में काम करना शुरू किया था.
युवती अपने घर की सबसे बड़ी संतान थी और माता-पिता को उम्मीद थी कि उसकी
सफलता से उसके दो छोटे भाइयों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी.
जानकार ने कहा कि किसी भी परिवार की तरह उसके माता पिता को भी उम्मीद थी
कि उसे अच्छी नौकरी तथा अच्छा वेतन मिलेगा, लेकिन 16 दिसम्बर को सामूहिक
दुष्कर्म की शिकार हो जाने से उसका और उसके परिवार का सपना चूर हो गया.
इसके बाद 13 दिनों तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए आखिर सिंगापुर
में शनिवार को युवती का निधन हो गया
साभार:- व्यर्थ शास्त्र
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