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Wednesday, 12 November 2014

क्या आप जानते हैं की निवेश कम उम्र और बड़ी उम्र में शुरू करने से बचत में बड़ा अंतर आ जाता है।

क्या आप जानते हैं की निवेश कम उम्र और बड़ी उम्र में शुरू करने से बचत में बड़ा अंतर आ जाता है। आप निवेश की शुरु आत जल्दी करेंगे तो आपको जल्द ही इसका रिटर्न मिलेगा और आप इस रिटर्न का एक बार फिर से निवेश कर करेंगे। जो लोग अपनी स्टुडेंट लाइफ खत्म होने के बाद नौकरी ज्वाइन करते हैं, उन्हें शुरू से ही निवेश की आदत डालनी चाहिए। इससे आपको कंपाउंडिंग रिटर्न का फायदा मिल सकेगा। निवेश के बारे में जानने के लिए बेहद जरूरी है कि कंपाउडिंग की ताकत को समझा जाए और इसे बढ़ावा दिया जाए। यह दो सिद्धांतों पर काम करता है- पुनर्निवेश और समय। जब पैसे को किसी वित्तीय उत्पाद में लगाया जाता है तो यह ब्याज या रिटर्न अर्जित करता है। ब्याज की राशि कई बातों पर निर्भर करती है जैसे निवेश राशि, ब्याज दर और समय। निवेश राशि साधारण ब्याज या चक्रवृद्धि ब्याज अर्जित करती है। साधारण ब्याज महज
मूलधन पर देय होता है वहीं मिश्रित ब्याज मूलधन के साथ प्रत्येक वर्ष अर्जित ब्याज पर देय होता है। साल दर साल मूलधन की राशि नियमित रूप से बढ़ती जाती है। ध्यान रखने योग्य पहलू है ब्याज दर। कंपाउंडिंग का प्रभाव उदहारण के लिए 10,000 रपए की रकम को 10 वर्षो के लिए अलग-अलग ब्याज दर पर निवेश किए जाने पर रिटर्न इए प्रकार होगा- 10 फीसद पर : 25,937 रपए 11 फीसद पर : 28,394 रपए 12 फीसद पर : 31,085 रपए ब्याज दर में मामूली सा अंतर भी आपके निवेश पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। एसआईपी के जरिए किए गए निवेश में कंपाउंडिंग रिटर्न का फायदा देखने को मिलता है। इसमें एक छोटी सी रकम बड़ी रकम में बदल जाती है। इसमें ब्याज पर ब्याज की आमदनी होती जाती है। जो लोग कम उम्र से निवेश की शुरु आत करने के इच्छुक होते हैं। कई बार उन्हें पता नहीं होता कि वे इसमें कदम कैसे रखें। ऐसी स्थिति में निवेश शुरू करने के लिए म्यूचुअल फंड बेहतरीन विकल्प है। आप इसमें निवेश के लिए निश्चित राशि निकाल कर रखें। इसमें से कुछ राशि का इस्तेमाल निवेश में करें बाकी को इससे जुड़े खर्चो का प्रबंधन करने में लगाएं। जल्द करें शुरुआत अगर आप युवा हैं तो यह मत समझिए कि अभी तो बहुत समय है, बचा लेंगे। आप जितनी जल्दी शुरुआत करेंगे, उतना आपको कम बचाना पड़ेगा। जैसा कि एक 25 वर्षीय युवा को केवल हर माह 5000 रपए ही बचाने होंगे मगर 35 वर्षीय व्यक्ति को इसके लिए हर माह 11000 रपए बचाने होंगे। वर्तमान समय में निवेश के कई साधन हमारे समक्ष मौजूद हैं। इनमें बैंक, पोस्ट ऑफिस, जीवन बीमा, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, बांड और रीयल एस्टेट शामिल है। आपको अपनी जोखिम क्षमता एवं समय के अनुरूप निवेश माध्यमों का चयन करना चाहिए। मिसाल के तौर पर अगर आपके पास पांच-साल के निवेश के लिए एक लाख रपए हैं तो इसे आप ऐसी फिक्स्ड रिटर्न योजना में निवेश करके पूंजी को सुरक्षित रख सकते हैं जिसमें निवेश की अवधि के अंत में आपकी शुरुआती निवेश के बराबर परिपक्वता हो। जोखिम का आकलन आप कितने समय के लिए निवेश करना चाहते हैं। आपको भविष्य की अपनी महत्वपूर्ण योजनाओं को पूरा करने के लिए कब और कितने पैसों की जरूरत पड़ सकती है, इसका खाका खींच कर रखिए। आपके जोखिम उठाने की क्षमता कितनी है। किसी भी निवेश में अच्छा रिटर्न पाने की उम्मीद करते समय उसके न्यूनतम जोखिम को ध्यान में जरूर रखें। एसआईपी की भी कई ऐसी खूबियां हैं जिनके बारे में हर निवेशक को जानना जरूरी है ताकि इनका पूरा फायदा उठाया जा सके। सारा निवेश एक ही जगह नहीं करें। जोखिम घटने का पूरा फायदा उठाने लिए आपको अपना पूरा निवेश ऐसी विविध संपत्तियों करना चाहिए जिनका आपस में कोई संबंध नहीं हो। निश्चित आय इक्विटी, रीयल एस्टेट, गोल्ड और निवेश के अन्य विकल्पों में लगाई जानी चाहिए। निवेश के पहले हर तरह की जानकारी इकट्ठी करना जरूरी होता है। स्टाक मार्केट में निवेश अगर भविष्य की आर्थिक जरूरतों और सपनों को पूरा करने के लिए अन्य संपत्तियों की तरह शेयरों में निवेश नहीं किया जाता है तो पर्याप्त पैसा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि मुद्रास्फीति की मार और करों के बोझ से आप बच नहीं सकते, जो कई बार मिलने वाले रिटर्न को नकारात्मक कर देते हैं। जब शेयरों में धन लगाएं तो अलग-अलग सेक्टरों की कंपनियों में लगाएं। एक ही सेक्टर की ज्यादा कंपनियों में भी पैसा नहीं लगाएं। एफएमसीजी, फार्मा जैसे डिफेंसिव सेक्टर के शेयर खरीद कर पोर्टफोलियो मजबूत कर सकते हैं। ज्यादा रिटर्न के लालच में निवेश न करें बल्कि जरूरत और रिस्क की क्षमता के हिसाब से ही निवेश करें। निवेश का तरीका अपने विचारों के अनुरूप होना चाहिए। शेयर खरीदने के साथ ही उसे बेचने का लक्ष्य तय करना चाहिए। टारगेट प्राइस पर पहुंचने पर ही उसे बेचना चाहिए। टिप्स के आधार पर निवेश नहीं करना चाहिए क्योंकि उससे नुकसान की आशंका रहती है। शेयर बाजार में पैसा बनाना बहुत आसान है उसी प्रकार खोना भी बहुत आसान है। इससे बचा जा सकता है अगर आप स्वंय शेयर बाजार के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्र करें, शोध करें और दूसरों के दिए टिप्स पर न जाएं।

Sunday, 26 October 2014

भारतीय नृत्य कला

हड़प्पा सभ्यता में नृत्य करती हुई लड़की की मूर्ति पाई गई है, जिससे साबित होता है कि इस काल में ही नृत्यकला का विकास हो चुका था। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र नृत्यकला का सबसे प्रथम व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसको पंचवेद भी कहा जाता है।
नाट्यशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार नृत्य दो तरह का होता है- मार्गी (तांडव) तथा लास्य। तांडव नृत्य भगवान शंकर ने किया था। यह नृत्य अत्यंत पौरुष और शक्ति के साथ किया जाता है। दूसरी ओर लास्य एक कोमल नृत्य है जिसे भगवान कृष्ण गोपियों के साथ किया करते थे।
एक काल में भारत में नृत्य काफी प्रचलित थे। लेकिन 19वीं शताब्दी तक आते-आते इनका पूरी तरह से पराभाव हो गया। किंतु 20वीं शताब्दी में कई लोगों के प्रयास से नृत्यकला को पुनर्जीवन मिला।

भरतनाट्यम
भरत मुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित भरतनाट्यम अत्यंत परंपराबद्ध तथा शैलीनिष्ठ है। इस नृत्य शैली का विकास दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ। प्रारंभ में यह नृत्य मंदिरों में देवदासियों द्वारा किया जाता था, तब इसे आट्टम और सदिर करते थे। इसे वर्तमान रूप प्रदान करने का श्रेय तंजौर चतुष्टय अर्थात पौन्नैया,पिल्लै तथा उनके बंधुओं को है। 20वीं शताब्दी में इसे रवीन्द्रनाथ टैगोर, उदयशंकर और मेनका जैसे कलाकारों के संरक्षण में यह नाट्यकला पुनर्जीवित हो गई।
भरतनाट्यम में पैरों को लयबद्ध तरीके से जमीन में पटका जाता है, पैर घुटने से विशेष रूप से झुके होते हैं एवं हाथ, गर्दन और कंधे विशेष प्रकार से गतिमान होते हैं।
रुक्मिणी देवी अरुण्डेल भारत की सबसे पहली प्रख्यात नृत्यांगना हुई हैं। अन्य प्रमुख कलाकारों में यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, मृणालिनी साराभाई, मालविका सरकार शामिल हैं।



कुचिपुड़ी
आंध्र प्रदेश के कुचेलपुरम नामक ग्राम में इस नृत्य शैली का उद्भव हुआ। यह शास्त्रीय नृत्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के नियमों का पालन करता है। इस शैली का विकास तीर्थ नारायण तथा सिद्धेन्द्र योगी ने किया। यह मूलत: पुरुषों का नृत्य है, पर इधर कुछ समय से महिलाओं ने भी इसे अपनाया है। इस नृत्य के लिए कर्नाटक संगीत का प्रयोग किया जाता है और इसका प्रदर्शन रात में होता है। कुचिपुड़ी के प्रमुख कलाकारों में वेदांतम सत्यनारायण, वेम्पत्ति चेन्नासत्यम, यामिनी कृष्णमूर्ति, राधा रेड्डी, राजा रेड्डी आदि शामिल हैं।


ओडिसी
भरतमुनि की नृत्य शैली पर आधारित इस शास्त्रीय नृत्य शैली का उद्भव व विकास दूसरी शताब्दी ई.पू. में उड़ीसा के राजा खारवेल के शासनकाल के दौरान हुआ। 12वीं शताब्दी के बाद वैष्णव धर्म से यह काफी प्रभावित हुई और जयदेव द्वारा रचित अष्टपदी इसका एक आवश्यक अंग बन गई।
ओडिसी में सबसे महत्वपूर्ण तत्व च्भंगीज् और च्कर्णज् होते हैं। इसमें विभिन्न शारीरिक भंगिमाओं में शरीर की साम्यावस्था का अत्यन्त महत्व होता है।
आधुनिककला में ओडिसी के पुनरुत्थान का श्रेय केलूचरण महापात्र को है। संयुक्ता पाणिग्राही, सोनल मानसिंह, मिनाती दास, प्रियवंदा मोहंती आदि ओडिसी की प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं।

कत्थक
उत्तर भारत का यह शास्त्रीय नृत्य मूलत: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है। इसका उद्भव वैदिक युग से माना जाता है। बाद में मुस्लिम शासकों के दौरान यह नृत्य शैली मंदिरों से निकलकर राजदरबारों में पहुँच गई। जयपुर, बनारस, राजगढ़ तथा लखनऊ इसके मुख्य केेंद्र थे। लखनऊ के  वाजिद अली शाह के काल में यह कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई।
यह अत्यंत नियमबद्ध एवं शुद्ध शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसमें पूरा ध्यान लय पर दिया जाता है। इस नृत्य में पैरों की थिरकन पर विशेष जोर दिया जाता है। इसके प्रसिद्ध कलाकार हैं- लच्छू महराज, शम्भू महराज, बिरजू महराज, सितारा देवी, गोपीकृष्ण, शोभना नारायण, मालविका सरकार इत्यादि।


कथकली
केरल राज्य में जन्मी यह नृत्य शैली भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है। कथकली भी मंदिरों से जुड़ा नृत्य है और इसे मात्र पुरुष ही करते हैं।
कथकली नृत्य में गति अत्यन्त उत्साहपूर्ण और भड़कीली होती है। इसके साथ इसमें शारीरिक भाव-भंगिमाओं का विशेष महत्व होता है। नर्तक अत्यन्त आकर्षक श्रृंगार का प्रयोग करते हैं। कथाओं के पात्र देवता या दानव होते हैं। 20वीं शताब्दी में वल्लाठोल ने इसके पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथकली के प्रख्यात कलाकारों में गोपीनाथ, रागिनी देवी, उदयशंकर, रुक्मिणी देवी अरुण्डेल, कृष्णा कुट्टी, माधवन आनंद, शिवरमण इत्यादि शामिल हैं।

मणिपुरी
15-16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार की वजह से मणिपुर में इस नृत्य शैली का उद्भव व विकास हुआ। मणिपुरी के विषय मुख्यतया कृष्ण की रासलीला पर आधारित होते हैं। मणिपुरी की सबसे खास बात शरीर की अत्यन्त आकर्षक एवं मृदु गति होती है जो इसे एक विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है।
1917 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा इस नृत्य को शांतिनिकेतन में प्रवेश दिलाने के बाद यह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। इसके प्रमुख कलाकार हैं- गुरु अमली सिंह, आतम्ब सिंह, झावेरी बहनें, थम्बल यामा, रीता देवी, गोपाल सिंह इत्यादि।


मोहिनी अट्टम
यह केरल राज्य में प्रचलित देवदासी परंपरा का नृत्य है। 19वीं सदी में भूतपूर्व त्रावणकोर के महाराजा स्वाति तिरुनाल ने इसे काफी प्रोत्साहन दिया। बाद में कवि वल्लाठोल ने इसका पुनरुत्थान किया। इस नृत्य के प्रमुख कलाकार हैं- कल्याणी अम्मा, भारती शिवाजी, हेमामालिनी इत्यादि।

कृष्णअट्टम
यह नृत्य शैली लगातार आठ रातों तक चलती है और इसमें भगवान कृष्ण के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन किया जाता है। यह केरल में प्रचलित है।

यक्षगान
कर्नाटक में प्रचलित यह मूल रूप से ग्रामीण प्रकृति का नृत्य नाटक है। हिंदू महाकाव्यों से संबंधित इस नृत्य शैली में विदूषक और सूत्रधार मुख्य भूमिका निभाते हैं।

प्राकृतिक संसाधन और भूमि प्रयोग

पृथ्वी हमें प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराती है जिसे मानव अपने उपयोगी कार्र्यों के लिए प्रयोग करता है। इनमें से कुछ संसाधन को पुनर्नवीनीकृत नहीं किया जा सकता है, उदाहरणस्वरूप- खनिज ईंधन जिनका प्रकृति द्वारा जल्दी से निर्माण करना संभव नहीं है।पृथ्वी की भूपर्पटी से जीवाश्मीय ईंधन के भारी भंडार प्राप्त होते हैं। इनमें कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और मीथेन क्लेथरेट शामिल हैं। इन भंडारों का उपयोग ऊर्जा व रसायन उत्पादन के लिए किया जाता है। खनिज अयस्क पिंडों का निर्माण भी पृथ्वी की भूपर्पटी में ही होता है।
पृथ्वी का बायोमंडल मानव के लिए उपयोगी कई जैविक उत्पादों का उत्पादन करता है। इनमें भोजन, लकड़ी, फार्मास्युटिकल्स, ऑक्सीजन इत्यादि शामिल हैं। भूमि आधारित पारिस्थिकीय प्रणाली मुख्य रूप से मृदा की ऊपरी परत और ताजा जल पर निर्भर करती है। दूसरी ओर महासागरीय पारिस्थितकीय प्रणाली भूमि से महासागरों में बहकर गये हुए पोषणीय तत्वों पर निर्भर करती है।


विश्व में भूमि प्रयोग
  

खेती योग्य भूमि 13.13 प्रतिशत
स्थाई फसलें 4.71 प्रतिशत
स्थाई चारागाह 26 प्रतिशत
वन 32 प्रतिशत
शहरी क्षेत्र  1.5 प्रतिशत
अन्य  30 प्रतिशत


तापमान 
तापमान ऊष्मा की तीव्रता अर्थात वस्तु की तप्तता की मात्रा का ज्ञान कराता है। ग्लोब को तीन तापमान क्षेत्रों में विभाजित किया गया है-

उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical zone)- यह कर्क रेखा व मकर रेखा के मध्य स्थित होता है। वर्षपर्यंत उच्च तापमान रहता है।

समशीतोष्ण क्षेत्र (Temperate zone)- यह दोनों गोलाद्र्धों में 23श 30Ó और 66श ३०ज् अक्षांशों के मध्य स्थित है।

शीत कटिबंध क्षेत्र (Frigid Zone) - दोनों गोलाद्र्धों में यह ध्रुवों और 66श ३०ज् अक्षांश के मध्य स्थित है। वर्षपर्यंत यहाँ निम्न तापमान रहता है।
पृथ्वी का औसत तापमान सदैव समान रहता है।


वायुदाब
वायुदाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पडऩे वाले बल के रूप में मापते हैं। इसका स्पष्टï तात्पर्य है कि किसी दिए गए स्थान तथा समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का सम्पूर्ण भार। इसकी इकाई 'मिलीबार' कहलाती है। वायुदाब के क्षैतिज वितरण को देखने पर धरातल पर वायुदाब की 4 स्पष्ट पेटियाँ पाई जाती हैं।
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब की पेटी (Equational Low Pressure Belt) - धरातल पर भूमध्यरेखा के दोनों ओर ५श अक्षांशों के बीच निम्न वायुदाब की पेटी का विस्तार पाया जाता है। शांत वातावरण के कारण इस पेटी को शांत पेटी या डोलड्रम भी कहते हैं।
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटियाँ (The subtropical high pressure)- भूमध्य रेखा से ३०श-३५श अक्षांशों  पर दोनों गोलाद्र्धों में उच्च वायुदाब की पेटियों  की उपस्थित पाई जाती है। उच्च वायुदाब वाली इस पेटी को 'अश्व अक्षांश' (horse latitude) कहते हैं।
उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटियाँ (Sub-Polar low pressure belt)- दोनों गोलाद्र्धों में ६०श से ६५श अक्षांशों के बीच निम्न वायुदाब की पेटियाँ पाई जाती हैं।
ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियाँ (Polar high)- यह पेटियाँ ध्रुवों पर पाई जाती हैं। इन क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान के कारण ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियों का निर्माण होता है।


पवन
क्षैतिज रूप में गतिशील होने वाली हवा को ही पवन कहते है। वायुदाब की विषमताओं को संतुलित करने की दिशा में यह प्रकृति का एक स्वभाविक प्रयास है। धरातल पर निम्न प्रकार की पवन पाई जाती हैं-
प्रचलित पवन (Prevailing Wind) - जो पवन वायुदाब के अक्षांशीय अंतर के कारण वर्ष भर एक से दूसरे कटिबंध की ओर प्रवाहित होती रहती हैं, उसे प्रचलित पवन कहते हैं।  व्यापारिक पवन (trade Winds), पछुआ पवन (westerlies) व ध्रुवीय पवन (Polar winds) इत्यादि प्रचलित पवन के उदाहरण हैं|

सामयिक पवन (periodic winds)- मौसम या समय के साथ जिन पवनों की दिशा में परिवर्तन पाया जाता है, उन्हें सामयिक या कालिक पवन कहा जाता है। पवनों के इस वर्ग में मानसून पवनें, स्थल तथा सागर समीर शामिल हैं।
स्थानीय पवन (Local Winds) - स्थानीय पवनों की उत्पत्ति तापमान तथा दाब के स्थानीय अंतर की वजह से होता है। लू स्थानीय पवन का एक बेहतर उदाहरण है।
आद्र्रता वायुमण्डल में विद्यमान अदृश्य जलवाष्प की मात्रा ही आद्र्रता (Humidity) कहलाती है।

निरपेक्ष आद्र्रता (Absolute humidity) - वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आद्र्रता कहते हैं.
विशिष्टï आद्र्रता (Specific Humidity) - हवा के  प्रति इकाई भार में जलवायु के भार का अनुपात विशिष्टï आद्र्रता कहलाती है।
सापेक्ष आद्र्रता (Relative Humidity) - एक निश्चित तापमान पर निश्चित आयतन वाली वायु की आद्र्रता सामथ्र्य तथा उसमें विद्यमान वास्तविक आद्र्रता के अनुपात को सापेक्ष आद्र्रता कहते हैं।
बादल
वायुमण्डल में काफी ऊँचाई में जलवाष्प के संघनन से बने जलकणों या हिमकणों की विशाल राशि को बादल कहते हैं। मुख्यत: बादल हवा के रूद्धोष्म (Adiabatic) प्रक्रिया द्वारा ठण्डे होने तथा उसके तापमान के ओसांक बिन्दु तक गिरने के परिणामस्वरूप निर्मित होते हैं। ऊँचाई के अनुसार बादल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-
ऊँचे मेघ - धरातल से 6,000 से 12,000 मी.।
मध्यम मेघ - धरातल से 2,000 से 6,000 मी.
निचले मेघ - धरातल से 2,000 मी. तक।

मानव भूगोल
जनसंख्या का तात्पर्य किसी क्षेत्र अथवा सम्पूर्ण विश्व में निवास करने वाले लोगों की संपूर्ण संख्या से होता है। पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल का मात्र आठवां हिस्सा ही मानव के रहने योग्य है। संपूर्ण पृथ्वी के तीन-चौथाई हिस्से में महासागर स्थित हैं जबकि थलमंडल का के 14 फीसदी हिस्से में मरुस्थल और 27 फीसदी हिस्से में पर्वत स्थित हैं। इसके अतिरिक्त काफी ऐसा क्षेत्र है जो मानव के निवास योग्य नहीं है। पृथ्वी के सुदूर उत्तरी क्षेत्र में अंतिम मानव बस्ती एलर्ट है जो नुनावुत, कनाडा के इल्लेसमेरे द्वीप पर स्थित है। दूसरी ओर सुदूर दक्षिण में अंटार्कटिका पर अमुंडसेन-स्कॉट पोल स्टेशन है। 1650 के बाद के लगभग 300 वर्र्षों में विश्व जनसंख्या में इतनी तीव्र गति से वृद्धि हुई है जितनी किसी पूववर्ती काल में अनुमानित नहीं थी। दिसंबर 2009 के आंकड़ों के अनुसार विश्व की जनसंख्या 6,803,000,000 थी। एक मोटे अनुमान के अनुसार 2013 और 2050 में विश्व की जनसंख्या क्रमश: 7 अरब और 9.2 अरब हो जाएगी। जनसंख्या वृद्धि मुख्य रूप से विकासशील देश में ही होगी। जनसंख्या घनत्व के लिहाज से भी विश्व जनसंख्या में काफी विविधता है। दुनिया की बहुसंख्यक जनसंख्या एशिया में निवास करती है। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक दुनिया की 60 फीसदी जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास कर रही होगी।

Wednesday, 29 January 2014

कृपया चांदी का वर्क लगी मिठाइयां का सेवन ना करें ..! Chiragan NGO

खुद भी जागें औरों को भी जाग्रत करें..मिली जानकारियों के अनुसार ये ''चांदी के वर्क'' नकली और मांसाहार हैं....
हमारे देश में मिठाइयां लोगों की कमजोरी हैं। बच्चे हों या बूढ़े, मिठाइयों को देखकर उन्हें मन को काबू कर पाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन कम ही लोगों को इस बात का पता है कि रसीली मिठाइयों में लिपटा चांदी का वर्क मिठास के साथ उनके शरीर में ऐसे जहर भी घोल रहा है, जिनसे कैंसर तक हो सकता है।
मिठाइयों पर लिपटे चांदी के वर्क को हम इस भ्रम में बड़े चाव से खा जाते हैं कि आयुर्वेद के हिसाब से यह ताकत पहुंचाने वाली बेशकीमती धातु है। लेकिन इस मिलावटी चांदी के वर्क में बेहद नुकसान पहुंचाने वाले निकल, जस्ता और अन्य रासायनिक तत्व होते हैं जिनसे कैंसर सहित कई तरह की खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं।


देश के सबसे प्रामाणिक माने जाने वाले 'इंडस विष विज्ञान अनुसंधान केन्द्र' ने चांदी के वर्क पर हाल ही में एक रिसर्च किया। संस्था ने अपनी रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी है कि इसके अधिक सेवन से कैंसर तक का खतरा हो सकता है। रिपोर्ट में बताया गया कि मिलावट निरोधी अधिनियम के तहत चांदी का वर्क बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चांदी की शुद्धता 99.9 प्रतिशत निश्चित है। लेकिन जांच में बाजार में बिकने वाले चांदी के वर्क में से आधे भी इस मानक पर खरे नहीं उतरे।
देश में चांदी के वर्क की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह हर परचून की दुकान पर मिलता है। देश में इसकी सालाना खपत 2 लाख 75 हजार किलोग्राम है। मिलावटी चांदी के अलावा ये चांदी के वर्क जिन जगहों पर और जिस तरह से बनाए जाते हैं, वह भी इतने गंदे हैं जो कई बीमारियों को बुलावा दे सकते हैं। एक तो चांदी शुद्ध नहीं होती और दूसरे उसे जिस चमड़े की थैली में पीट-पीटकर बनाया जाता है, वह बेहद गंदी होती है और इससे संक्रमण होना लाजमी है।

Sunday, 31 March 2013

कुछ यही सोचती होगी उनकी आत्मा....कैसे मैं गणतंत्र मनाऊँ….??? Chiragan

एक समय था जब २६ जनवरी नाम सुनते ही मन में एक अजीब सा कैतूहल, अजीब सी खुशी पैदा हो जाती है, मैं बात कर रहा हूँ, बचपन की, विधालय जीवन की।
साल मैं दो त्यौहार आते थे, जिन्हें परिवार के साथ ना मनाकर विधालय के मित्रों और गुरुजनों के साथ मनाते थे। तो खुशी तो होनी ही थी।
उनमें से एक ‘१५ अगस्त’ ज्यादातर बारिश में धुल जाता था। क्योंकि उस समय सामान्यतः श्रावण का महीना होता था। इसीलिए सारी तैयारियों पर पानी फिरने का डर बना रहता था।
तो अध्यापक बोलते थे सारी कसर २६ जनवरी पर पूरी कर लेंगे। इसलिए २६ जनवरी पर जोश दोगुना हो जाता था। बीसों दिन पहले तैयारी शुरु हो जाती, अपने से वरिष्ठ विधार्थियों,
अध्यापकों से मिलते कि कोई अच्छा गाना या कविता मिल जाये, कुछ नहीं मिलता था तो अपनी ही हिंदी की पाठ्यपुस्तक में से कोई देशभक्ति कविता तैयार करना शुरु कर देते,
आखिर शहीदों के लिये सम्मान व श्रद्दा जो थी कि हमें आजादी दिलाई उन्होंने। घरवालों को परेशान करना शुरु कर देते नई पोशाक और जूते चाहिये २६ जनवरी पर कार्यक्रम में भाग ले रहा हूँ।
उसके बाद पुरुस्कार व मिठाई की खुशी, साथ ही देशभक्ति गीत सुनकर खून उबाल मारता, और जोश आसमान को छूता, लेकिन ज्यों-ज्यों बडे होते गये, अर्थ बदलते गये।
थोडे बडे हुए तो कारण पता चला कि इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ। आजादी के बाद २ वर्ष ११ माह १८ दिन में ये २६ नवम्बर १९४९ को बनकर तैयार हुआ।
सोचा तो २६ जनवरी को ही क्यूं लागू हुआ तो उत्तर मिला कि एक बार २६ जनवरी के ही दिन सन १९३० में नेहरु ने रावी के तट पर तिरंगा फहराया था। और बडे हुए थोडी और जानकार मिली।
कि संविधान जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा लिखित संविधान है। और दुनियां का सबसे बडा संविधान है। बडी खुशी मिलती और गर्व भी होता।
लकिन अब अर्थ व मायने बिल्कुल बदल गये, क्यूंकि सच्चाई बिल्कुल भिन्न थी। क्योंकि–
भारत का संविधान दुनियां का सबसे बडा लिखित संविधान है, बडे संविधान का मतलब ये नहीं होता कि आपने उसे लिखने में ज्यादा पन्ने इस्तेमाल किये, बडे का मतलब बडी बातों से होता है।
जो समाज जितना ही पिछड़ा हुआ, अतार्किक और अन्धाविश्वासी होता है, उसमें देव-पूजा, नायक-पूजा की प्रवृत्ति उतनी ही गहराई से जड़ें जमाये रहती है। इससे स्वार्थी व्यक्तियों का भी हित सधता है, प्रभावशाली सामाजिक वर्गों का भी और सत्ता का भी। इसके लिए कभी-कभी किसी ऐसे पुराने नायक को जीवित कर लेते हैं, जिसके साथ अतीत में पीडितों और कमजोरों का पक्षधर होने की प्रतिष्ठा जुड़ी हो, उत्पीड़ित जन यह भ्रम पाल लेते हैं कि उन्हें शासकों के प्रभुत्व से छुटकारा मिल जायेगा। जब यह भ्रम भंग भी हो जाता है और नायक/नेता द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक मार्ग आगे नहीं बढ़ पाता, तब भी उक्त महापुरुष-विशेष और उसके सिद्धान्तों की आलोचना वर्जित और प्रश्नेतर बनी रहती है और उसे देवता बना दिया जाता है। इससे लाभ अन्तत: शोषणकारी व्यवस्था का ही होता है।
डॉ॰ अम्बेडकर को लेकर भारत में प्राय: ऐसा ही रुख़ अपनाया जाता रहा है। अम्बेडकर की किसी स्थापना पर सवाल उठाते ही दलितवादी बुद्धिजीवी तर्कपूर्ण बहस के बजाय ”सवर्णवादी” का लेबल चस्पाँ कर देते हैं, निहायत अनालोचनात्मक श्रद्धा का रुख़ अपनाते हैं तथा सस्ती फ़तवेबाज़ी के द्वारा आलोचनाओं को ख़ारिज कर देते हैं। इससे सबसे अधिक नुक़सान दलित जातियों के आम जनों का ही हुआ है। इस पर ढंग से कोई बात-बहस ही नहीं हो पाती है कि दलित-मुक्ति के लिए अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत परियोजना वैज्ञानिक-ऐतिहासिक तर्क की दृष्टि से कितनी सुसंगत है और व्यावहारिक कसौटी पर कितनी खरी है?
इस बात का बहुत अधिक प्रचार किया जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ही भारतीय संविधान के ‘निर्माता’ या ”प्रमुख वास्तुकार” हैं। यह कहाँ तक सच है? संविधान सभा में ‘आर्थिक शोषण से मुक्ति’ के लिए प्रस्तुत अम्बेडकर का प्रस्ताव क्या था और कितना व्यावहारिक था और इस प्रस्ताव के ख़ारिज किये जाने के बाद भी अम्बेडकर संविधान सभा में और नेहरू के मन्त्रालय में क्यों बने रहे? अनुसूचित जातियों के कल्याण के जिस उद्देश्य से अम्बेडकर सरकार और संविधान सभा में गये थे, क्या उसकी कोई सम्भावना शुरू से ही वहाँ मौजूद थी?
संविधान-निर्माण का कार्य सम्पन्न होने पर तो अपने लम्बे भाषण में अम्बेडकर ने परम सन्तोष प्रकट किया था और कांग्रेस की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी,
फिर कुछ ही वर्षों बाद वे सरकार से बाहर आकर ‘संविधान जलाने’ की बात क्यों करने लगे थे? बावजूद उनके इस मोहभंग के, आज के दलित नेता उन्हें ‘भारतीय संविधान का निर्माता’ कहकर गौरवान्वित क्यों होते हैं और संविधान में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ का विरोध क्यों करते हैं? — इन सभी बातों पर तार्किक और तथ्यपरक ढंग से सोच-विचार किया जाना चाहिए। अतर्क-कुतर्क और अन्धभक्ति से किसी का भला नहीं हो सकता।
अपने भाषण में अम्बेडकर ग़रीबों को वे बार-बार यही उपदेश देते हैं कि वे संविधान और क़ानून के ख़िलाफ़ कदापि न जायें। अम्बेडकर के भाषण के बाद कांग्रेसी और अन्य सदस्यों ने उनकी प्रशंसा की झड़ी लगा दी और उन्हें ”आधुनिक मनु” की संज्ञा दी। कांग्रेस के प्रति आत्मसमर्पण का दृश्य पूरा हो चुका था। इसके बाद चार वर्षों तक अम्बेडकर इन्तज़ार करते रहे। उन्हें न तो मनचाहा मन्त्रालय मिला, न ही उन्हें किसी अन्य नयी गठित कमेटी में ही लिया गया। 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने। 1953 में राज्यसभा में ‘आन्‍ध्र राज्य के बिल’ पर बोलते हुए उन्होंने कहा : ”सब लोग मुझे संविधान का निर्माता कहते हैं। वास्तव में मुझे बहुत सी बातें अपनी इच्छाओं के विरुद्ध लिखनी पड़ी थीं। अब मैं उस संविधान से सन्तुष्ट नहीं हूँ जिसे मैंने स्वयं लिखा। मैं पहला व्यक्ति होऊँगा जो इसे जलाने के लिए आगे आयेगा। यह संविधान किसी के लिए भी उपयोगी नहीं है।” (रंगनायकम्मा : उपरोद्धृत पुस्तक, पृ. 452-453)।

संविधान की प्रस्तावना देखो….
”हम, भारत के लोग भारत को एक सम्प्रभुता-सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष जनवादी गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना की स्वतन्त्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सबमें
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और
अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख़ 26 नवम्बर 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
यह लोक-लुभावन छलावे के साथ रचा गया प्रपंच था। भारत के संविधान की शुरुआत ही बडबोली घोषणा के साथ होती है। जैसे कोई पार्टी चुनाव से पहले जनता के सामने बडे ही लुभावने वायदे करती है। आपको याद दिला दूँ 26 नवम्बर 1949 को संविधान की मूल प्रस्तावना में सिर्फ ‘सम्प्रभुता सम्पन्न जनवादी गणराज्य’ ही था, “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द 1976 में आपातकाल के दौरान बयालीसवें संशोधन द्वारा जोड़े गये थे। इस संशोधन का विडम्बनापूर्ण समय भी उल्लेखनीय है। उस समय इन्दिरा गाँधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू करके रही-सही नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों को भी समाप्त कर दिया था। नेहरूवादी “समाजवाद” की नीतियों को फासिस्ट निरंकुशता की इस विडम्बनापूर्ण परिणति तक पहुँचना ही था। उस आपातकाल की समाप्ति के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जो पहली गैर-कांग्रेसी सरकार केन्द्र में अस्तित्व में आयी, जनता पार्टी सरकार की उस सरकार में सबसे बड़ा और संगठित धड़ा आर.एस.एस. समर्थित जनसंघ था जो ”समाजवाद” ही नहीं, जो तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का भी धुर-विरोधी था। बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा ही ‘राष्ट्र की एकता’ के स्थान पर “राष्ट्र की एकता और अखण्डता’ शब्दावली रख दी गयी थी। यह बदलाव भी तत्कालीन इन्दिरा निरंकुशशाही के अतिकेन्द्रीकृत सत्ता और एकता-अखण्डता की रक्षा के नाम पर हर विरोध को कुचल देने की इच्छा और ज़रूरत को ही रेखांकित करता था।
“हम भारत के लोग” प्रस्तावना का शुरुआती जुमला वही था जिससे अमेरिकी संविधान की शुरुआत हुई थी। “हम संयुक्त राज्य के लोग’। अमेरिकी संविधान की प्रस्तावना की यह शब्दावली भी एक धोखाधड़ी थी। वह न तो अमेरिका में अश्वेत दासों का प्रतिनिधित्‍व करता था, न ही अमेरिकी संविधान ने दासता का उन्मूलन किया था।
भारतीय संविधान सभा भी बहुसंख्य जनसमुदाय का प्रतिनिधित्‍व नहीं करती थी और आगे चलकर भी उस संविधान को भारत के लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों के किसी निकाय द्वारा पारित नहीं किया गया। यह भी कहा गया कि भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता का उन्मूलन करके सामाजिक समावेशन और दलित जातियों की प्रगति की राह खोल दी। ग़ौरतलब है कि इस मामले में भारतीय संविधान और लोकतन्त्र की विफलता को तो पाँच-छह वर्ष बीतते-बीतते डॉ. अम्बेडकर भी स्वीकार कर चुके थे। आरक्षण जैसे प्रावधानों ने भी बहुसंख्यक दलितों को समाज के सबसे निचले पायदान से और उजरती ग़ुलामों की सबसे अपमानित पाँत से ऊपर उठाने के बजाय उनके बीच से सिर्फ एक छोटी-सी जमात या मात्र कुछ ही लोगों को आर्थिक रूप से बेहतर जीवन दे दिया है, बाकी आज तक वैसे ही हैं। जबकि सामाजिक अपमान और भेदभाव का सामना उन्हें आज भी करना पडता है।
अब बात आती है संप्रभुता की, अर्थात् राजाशाही की निरंकुश्ता की जगह चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता को सत्ता का केंद्र बनाना और जनता को संप्रभु बनाने से था। आज जनता मात्र मतदान की ताकत है उसके बाद सत्ता निरंकुश।
बात ‘लोकतन्‍त्रात्मक गणराज्य’ की करें तो, जो अमली रूप सामने आया है उसने जनता के साथ हुई धोखाधड़ी को एकदम नंगा कर दिया है। इस बात का प्राय: बहुत अधिक डंका पीटा जाता है कि भारत का बहुदलीय संसदीय जनवाद तिरसठ वर्षों से सुचारु रूप से चल रहा है। बेशक शासक वर्गों की इस हुनरमन्‍दी को मानना पड़ेगा कि इतने वर्षों से यह धोखाधड़ी जारी है, बहुदलीय संसदीय जनवाद का मतलब सिर्फ इतना ही रहा है कि हर पाँच वर्षों बाद जनता ठप्पा मारकर सिर्फ यह चुनाव करे कि शासक वर्ग की कौन सी पार्टी अगले पाँच वर्षों तक उसपर शासन करे। सरकारें चाहे जिस पार्टी की हों, वे शासन वर्गों की मैनेजिंग कमेटी का काम करती रही हैं। जो सरकार योग्यतापूर्वक इस काम को नहीं कर पाती, उस सरकार को गिरते देर नहीं लगती। चुनाव पूँजीपति घरानों की थैलियों के बिना कोई लड़ ही नहीं सकता। संसद की भूमिका केवल बहसबाज़ी के अड्डे की होती है। नीतियों को लागू करने का असली काम नौकरशाही करती है। मन्त्रिमण्डल बस पूँजीपतियों के इशारे पर नीतियाँ बनाता है। जनता के हर सम्भावित प्रतिरोध को कुचलने के लिए पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और सेना का एक दैत्याकार तन्‍त्र है।

संकलन कर्ता आभार के साथ...!
Pinki Devi
 

Saturday, 16 March 2013

आर्थिक विकास में बाधक भ्रष्टाचार व असमानता

भारत के महाशक्ति बनने की सम्भावना का आकलन अमरीका एवं चीन की तुलना से किया जा सकता है। महाशक्ति बनने की पहली कसौटी तकनीकी नेतृत्व है। अठारहवीं सदी में इंग्लैण्ड ने भाप इंजन से चलने वाले जहाज बनाये और विश्व के हर कोने में अपना आधिपत्य स्थापित किया। बीसवीं सदी में अमरीका ने परमाणु बम से जापान को और पैट्रियट मिसाइल से इराक को परास्त किया। यद्यपि अमरीका का तकनीकी नेतृत्व जारी है परन्तु अब धीरे-धीरे यह कमजोर पड़ने लगा है। वहां नई तकनीकी का आविष्कार अब कम ही हो रहा है। भारत से अनुसंधान का काम भारी मात्रा में 'आउटसोर्स' हो रहा है जिसके कारण तकनीकी क्षेत्र में भारत का पलड़ा भारी हुआ है। तकनीक के मुद्दे पर चीन पीछे है। वह देश मुख्यत: दूसरों के द्वारा ईजाद की गयी तकनीकी पर आश्रित है।
दूसरी कसौटी श्रम के मूल्य की है। महाशक्ति बनने के लिये श्रम का मूल्य कम रहना चाहिये। तब ही देश उपभोक्ता वस्तुओंका सस्ता उत्पादन कर पाता है और दूसरे देशों में उसका उत्पाद प्रवेश पाता है। चीन और भारत इस कसौटी पर अव्वल बैठते हैं जबकि अमरीका पिछड़ रहा है। विनिर्माण उद्योग लगभग पूर्णतया अमरीका से गायब हो चुका है। सेवा उद्योग भी भारत की ओर तेजी से रुख कर रहा है। अमरीका के वर्तमान आर्थिक संकट का मुख्य कारण अमरीका में श्रम के मूल्य का ऊंचा होना है।
तीसरी कसौटी शासन के खुलेपन की है। वह देश आगे बढ़ता है जिसके नागरिक खुले वातावरण में उद्यम से जुड़े नये उपाय क्रियान्वित करने के लिए आजाद होते हैं। बेड़ियों में जकड़े हुये अथवा पुलिस की तीखी नजर के साये में शोध, व्यापार अथवा अध्ययन कम ही पनपते हैं। भारत और अमरीका में यह खुलापन उपलब्ध है। चीन इस कसौटी पर पीछे पड़ जाता है। वहां नागरिक की रचनात्मक ऊर्जा पर कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण है।
चौथी कसौटी भ्रष्टाचार की है। सरकार भ्रष्ट हो तो जनता की ऊर्जा भटक जाती है। देश की पूंजी का रिसाव हो जाता है। भ्रष्ट अधिकारी और नेता धन को स्विट्जरलैण्ड भेज देते हैं। इस कसौटी पर अमरीका आगे है। 'ट्रान्सपेरेन्सी इंटरनेशनल' द्वारा बनाई गयी रैंकिंग में अमरीका को १९वें स्थान पर रखा गया है जबकि चीन को ७९वें तथा भारत का ८४वां स्थान दिया गया है।
पांचवीं कसौटी असमानता की है। गरीब और अमीर के अन्तर के बढ़ने से समाज में वैमनस्य पैदा होता है। गरीब की ऊर्जा अमीर के साथ मिलकर देश के निर्माण में लगने के स्थान पर अमीर के विरोध में लगती है। इस कसौटी पर अमरीका आगे और भारत व चीन पीछे हैं। चीन में असमानता उतनी ही व्याप्त है जितनी भारत में, परन्तु वह दृष्टिगोचर नहीं होती है क्योंकि पुलिस का अंकुश है। फलस्वरूप वह रोग अन्दर ही अन्दर बढ़ेगा जैसे कैन्सर बढ़ता है। भारत की स्थिति तुलना में अच्छी है क्योंकि यहाँ कम से कम समस्या को प्रकट होने का तो अवसर उपलब्ध है।

Wednesday, 6 March 2013

इलाज के आभाव में दम तोड़ती जिंदगी

सरकारें नागरिकों के हक में नियम-कायदे तो बना देती हैं, लेकिन उनका उचित प्रचार-प्रसार नहीं होने और जागरूकता के अभाव में जरूरतमंद लोग उन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते।
इसी के मद्देनजर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार और पुलिस को एक सप्ताह के भीतर उस अदालती आदेश को बड़े पैमाने पर प्रचारित करने का आदेश दिया है, जिसमें कहा गया था कि कोई भी अस्पताल, चाहे वह सरकारी हो या निजी, आपराधिक वारदात या किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति और बलात्कार-पीड़ित को तुरंत इलाज देने से इनकार नहीं कर सकता। गौरतलब है कि लगभग एक महीने पहले अपने आदेश में ऐसे मामलों में फौरन प्राथमिक उपचार मुहैया कराने के अलावा अदालत ने दिल्ली पुलिस से यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि पीड़ित को घटनास्थल के सबसे करीबी अस्पताल में पहुंचाया जाए, न कि क्षेत्र के बंटवारे या किसी दूसरी वजह को आधार बना कर दूर स्थित सरकारी अस्पतालों में ले जाया जाए।  ढाई महीने पहले दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद वहां पहुंची पुलिस काफी देर तक इस बेमानी सवाल में उलझी रही कि घटनास्थल किस हलके में आता है और बलात्कार की शिकार युवती और उसके मित्र को इलाज के लिए कहां ले जाया जाए। इसके बाद उन्हें कई किलोमीटर दूर सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। जबकि वक्त का तकाजा यह था कि उन्हें सबसे नजदीकी अस्पताल में ले जाया जाता। अगर ऐसा किया गया होता तो पीड़ित युवती संभवत: आज जिंदा होती। अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें हादसे या किसी आपराधिक घटना का शिकार हुए व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा की जरूरत होती है। लेकिन हकीकत यह है
कि फौरन इलाज न मिल पाने या अस्पतालों में डॉक्टरों के कानूनी मामला बता कर उपचार करने से मना कर देने के चलते बहुत सारे वैसे लोगों की जान चली जाती है, जिन्हें बचाया जा सकता है।
सही है कि आपराधिक वारदातों या दुर्घटनाओं के मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन भविष्य में अदालती सुनवाई का आधार बनता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कानूनी बाध्यता के बहाने किसी पीड़ित का प्राथमिक उपचार करने या उसे भर्ती करने से मना कर दिया जाए। कानूनी औपचारिकताएं पीड़ित के सामान्य स्थिति में आने के बाद भी पूरी की जा सकती हैं। कई बार सरकारी नियम-कायदों या अदालतों के आदेशों की जानकारी न होने के चलते लोग अस्पतालों या डॉक्टरों के कानूनी पेचीदगियों का हवाला देकर मना करने पर आपत्ति नहीं जता पाते। जबकि कानूनी प्रक्रियाओं के पालन के पहले तत्काल इलाज की सुविधा पाना उनका हक है, अस्पताल चाहे सरकारी हो या निजी। नागरिकों के हक में बने नियम-कायदों का प्रचार-प्रसार जागरूकता फैलाने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। आखिर लोक कल्याण से संबंधित योजनाओं के प्रचार-प्रसार के चलते ही ज्यादातर लोग उनके बारे में जान पाते हैं और उनका लाभ उठा पाते हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिनमें हादसे के शिकार किसी व्यक्ति को कहीं बिस्तर या तकनीकी सुविधाओं का अभाव बता कर तो कहीं कानूनी कागजात पूरे नहीं होने की दलील देकर भर्ती नहीं किया गया और घंटों तकलीफ झेलने के बाद आखिरकार उसकी मौत हो गई। ऐसे मामलों में कभी जवाबदेही तय नहीं हो पाती। उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश के फलस्वरूप अस्पतालों को और अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बनाया जा सकेगा।

Pinki Devi
अंश जनसत्ता से साभार

Saturday, 1 December 2012

बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान

बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान
किसी भी बच्चे का लालन पालन बेहद जिम्मेदारी का काम है। माता पिता की भूमिका इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि ना केवल हम बीज देते हैं बल्कि ज़मीन, हवा और ऱौशनी भी हमारी जिम्मेदारी है। एक शिशु ने किस माता पिता से जन्म लिया और किस घर और वातावरण में पला बड़ा ,दोनो बातें उसके व्यक्तित्व पर छाप छोड़ते हैं।

सायकोलोजी में एक बेहद दिलचस्प विषय है- ट्राँसैक्शनल अनालिसिस (TRANSACTIONAL aNALYSIS) । इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व तीन खंड़ों ( इगो स्टेट्स) में बाँटा जा सकता है। एडल्ट(वयस्क),चाईल्ड(शिशु) और पेरन्ट(जनक)। 'चाईल्ड' हमारे व्यक्तित्व का शिशु है। नैसर्गिक, निर्दोष, मासूम। यह भावनाओं और अवस्था को ज्यों का त्यों महसूस करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। अनुभव से दूर , और दूरदर्शिता की चिंता बिना का व्यवहार कभी बहुत ही प्यारा और कभी बेहद लापरवाह लगता है।

कुछ लोग कभी बड़े नहीं होते। मस्त रहते हैं और किसी बात की जिम्मेदारी नहीं लेते। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा चाईल्ड इगो स्टेट है । जहाँ इनका बिंदास होना सुहाता है,वहीं इनकी लापरवाही खलती है।

कुछ इस चाईल्ड को बहुत कम अहमियत देते हैं। वक्त से पहले संजीदा,गँभीर, बेहद जिम्मेदार हो जाते हैं। वे जीवन के बदलते रंगों में आत्मा नहीं डुबो पाते और मासूमियत और नये तरीके की सोच और खोज से दूर रहते हैं।

एडल्ट यानी वयस्क इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वह इगो स्टेट है जो समय के साथ बड़ा होता है। अनुभव को अपने व्यक्तित्व में समेट सोच समझ कर व्यवहार करता है।

पेरंट इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वो तिहाई हिस्सा है जो हमारे अंदर का जनक है। यह हिस्सा अक्सर बिना किसी फेर बदलाव के हम अपने माता पिता और उन लोगों से जिनका प्रभुत्व हम पर है उनसे ग्रहण करते हैं। और इसीलिए हम अपने माता पिता की तरह चलते हैं, हँसते हैं, खाँसते हैं, त्योहार में कोई खास मिठाई बनाते हैं..किसी खास अंदाज़ में तौलिया रखते हैं, खाने की मेज़ पर बैठते हैं।

माता पिता का एक तिहाई हिस्सा हम में यू ही शामिल हो जाता है। सोचने की बात है कि हम जो और जैसे हैं वह हमारे बच्चे का एक तिहाई व्यक्तित्व तय करता है। इसीलिए अपने व्यवहार से सही उदाहरण देना आवश्यक है। हमारे या उसके चाहे अनचाहे उसका व्यक्तित्व इसे आत्मसात कर लेता है।

हमारे बच्चों में हम जैसे व्यक्तित्व की कामना करते हैं, जरूरी है कि स्वयं हमारे अंदर वैसा व्यक्तित्व हो।

इन्ही इगो स्टेट्स के संदर्भ में समझा जा सकता है कि माता पिता की भूमिका एक शिशु को एक योग्य वयस्क बनाना है। और जहाँ हमारा व्यक्तित्व इस पर असर करता है वहीं हम किस वातावरण में इन्हे पालते हैं भी बेहद महत्वपूर्ण है।

बच्चों में माता पिता का अंश जरूर है किंतु वह हमारा हिस्सा या फैलाव नहीं हैं। उनकी अपनी एक अनुपम उपस्थिति है जो महज हमारे सपनों का विस्तार नहीं है। उनका अपना एक प्रवाह ,एक गति है.....हमारी जिम्मेदारी उसे सही दिशा और मजबूत किनारे देना है।

माता पिता जो कहते हैं वह किसी रेकॉर्डड टेप की तरह हमारे जहन में चलता रहता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं की एक लंबी लिस्ट हम सभी के पास रहती है। बचपन से कही सुनी कितनी बातें हमारे मस्तिष्क में चलती रहती हैं। घर के बाहर चप्पल उतारो,सच बोलो, खाना खाते वक्त बात मत करो, ऊपर बैठ कर पाँव मत हिलाओ, टी वी पास से नहीं देखो वगैरह। कई विचार भी हमें विरासत में मिलते हैं। लड़कियाँ ठहाके मार कर नहीं हँसती, लड़के खाना नहीं परोसेंगे, नैप्पी बदलने का काम माँ का है, माँ बाप से सवाल करना बदतमीज़ी है, औरतों के लिए सीट खाली करनी चाहिए, औरतें चुगली करती हैं,परीक्षा के पहले दही खाकर जाना चाहिए। धर्म, लिंग ,देश,रंग के कितने ही पूर्वाग्रह के लिए यह टेप जिम्मेदार हैं।

करेन होर्नी (Karen Horney)नाम की सायकोअनालिस्ट ने टायरेनी ऑफ शुड्स (Tyranny of Shoulds) का विचार रखा था। इसमें इसी टेप का जिक्र है जो हमारे व्यक्तित्व पर राज़ करता है। जाहिर है यह टेप कई गलत कामों को करने से रोकता है। वँही कई बार इस टेप के चलते हम समर्थ, उनमुक्त राय कायम करने में सक्षम नहीं रहते। अगर माँ और पिता की तरफ से मिला टेप अलग अलग बात कहता हो तो बच्चा उलझ भी सकता है।

माता पिता होने के नाते हमारा कर्तव्य बनता है कि सही टेप अपने बच्चे तक पहुँचायें। और उसे खुद सोचने और समझने और अपने निर्णय सही लेने में सक्षम बनाये।

टायरेनी ऑफ शुड्स की तरह उसके विचार और व्यक्तित्व को परीमित ना करें।

हमें हमारे बच्चे किस वक्त कहाँ और किस हाल में है जानना जरूरी है। आज़ादी की कोई भी गुहार की वजह से हमें इस बात पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चा किस के साथ है, टी वी में क्या देख रहा है, कौन सी पुस्तक पढ़ रहा है, किस तरह का संगीत सुन रहा है ...सब जानकारी रखना ना केवल महत्वपूर्ण है बल्कि समय रहते सचेत होने के लिए आवश्यक भी।

ये लेखक के निजी विचार है! लेखक का परिचय:
Pinki Devi
Teacher 

Friday, 16 November 2012

Utar Pradesh Government Start women power help line for women. अब मै नहीं डरती क्योकि मुझे मालूम है वूमेन पॉवर हेल्प लाइन नंबर। अगर कोई आपको फ़ोन, मैसेज, mms करके परेशान कर रहा है तो निशुल्क पुलिस को फोन करे। आपकी पहचान को गोपनीय रखा जायेगा। आपको कभी, कही नहीं बुलाया जायेगा।सेवा केवल उत्तर प्रदेश में। चिरागन की एक पहल। जागरूकता के लिए इशे शेयर करे।

Utar Pradesh Government Start women power help line 1090 for women. its totally  free and safe. अब मै नहीं डरती क्योकि मुझे मालूम है वूमेन पॉवर हेल्प लाइन नंबर। अगर कोई आपको फ़ोन, मैसेज, mms करके परेशान कर रहा है तो निशुल्क पुलिस को फोन करे। आपकी पहचान को गोपनीय रखा जायेगा। आपको कभी, कही नहीं बुलाया जायेगा।सेवा केवल उत्तर प्रदेश में। चिरागन की एक पहल। जागरूकता के लिए इशे शेयर करे।

Saturday, 20 October 2012

हमारी शिक्षा का स्तर और बच्चो का भविष्य

Siksha ka star ki gavaah chiraga ke project ke douran ki ek photo
कहा जाता है की जिस ईमारत की नींव मजबूत होती है वो ईमारत भी मजबूत होती है ! ये हमारे जीवन पे भी लागु होता है खास कर शिक्षा के क्षेत्र में ! हमें ये हमेशा ध्यान देना होगा की हम अपने बच्चे को जो शिक्षा दे रहे हैं या दिलवा रहे हैं वो सही है या नहीं ! अभिभावक का काम इतना ही पे ख़त्म नहीं होता है की वो अपने बच्चे का किसी स्कूल में नामांकन करवा दिए और उनकी जिम्मेदारी ख़त्म हो गयी ! अभिभावकों को ये सुनिश्चित करना पड़ेगा की हमें भी अपने बच्चे के लिए समय निकलना होगा , कम से कम १ घंटा ही सही लेकिन अपने बच्चे के ऊपर समय दीजिये ! क्योंकि पहला विद्द्यालय तो घर ( माँ , बाप ) ही होता है ! जिससे हम अपने बच्चे की परवरिश के साथ - साथ बच्चे की शिक्षा के स्तर को भी ऊपर उठा सकें ! तभी बच्चे के साथ - साथ उत्तर-प्रदेश एवं भारत का भविष्य उज्जवल होगा !
कुछ सालों में उत्तर-प्रदेश में शिक्षक के पद पर बहुत सारी नियुक्तियां हुयीं हैं और अभी और भी नियुक्तियां होनी बाकि है ! देखा जाये तो ये उत्तर-प्रदेश सरकार की बहुत ही अच्छी पहल है इस से बहुत सारे लोगों की बेरोजगारी दूर हुयी है ! लेकिन इसके दुसरे पहलु को देखा जाये तो ये उत्तर-प्रदेश के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है ! ऐसे - ऐसे लोगों की न्युक्तियाँ हुयीं हैं जिन्हें सही तरीके से हिन्दी न तो लिखना आता है और न ही पढना आता हैं , और अंग्रेजी की बात तो बहुत दूर है ! ऐसे में कोई कैसे कह सकता है की उत्तर-प्रदेश में शिक्षा के लिए किये जा रहे कार्य सही दिशा में जा रहा है ! एक तो पहले से ही विद्द्यालयों और महाविद्द्यालयों के शिक्षक गण शिक्षा को व्यवसाय बना दिए हैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के बजाय वो छात्रों को अपने यहाँ पढने के लिए मजबूर कर रहे हैं ! और इसमें निजी विद्द्यालयों की तो बात ही छोड़ दीजिए , निजी विद्द्यालय तो नाच - गाने ही में लिप्त रहते हैं !
कुछ दिनों पहले मैं अपने गाँव से शहर ( इलाहाबाद ) आ रही थी ! जिस रास्ते से मैं आ रही थी उसी रास्ते में मेरे गाँव का प्राथमिक विद्द्यालय मिलता है , जब मैं वहां से गुजर रही थी तो शिक्षक के पद पे नयी - नयी नियुक्ति जिनकी हुयी थी वही कक्षा में पढ़ा रही थी ! जब मैंने देखा तो सहसा मेरे मन में उत्सुक्तापूर्ण विचार आया की क्यों न रुक कर देखा जाये की नयी शिक्षिका महोदया पढ़ाने के लिए क्या - क्या नए - नए तरीके इस्तेमाल करती हैं ! बच्चे बहुत शोर गुल कर रहे थे जिसके कारन मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था की वो क्या पढ़ा रही हैं ! लेकिन थोड़ी देर बाद जैसे ही उनकी नजर मेरे ऊपर पड़ी तो वो बच्चों को शांत कराने लगी ! उन्होंने बच्चों से शुर , लय और ताल में एक सवाल पूछा की, पपीता खाया है जी ???? बच्चों ने भी उसी लय और ताल में जवाब दिया की जी ............! तब मैंने सोचा की शायद मैडम पपीता में पाए जाने वाले विटामिन के बारे में बतायेंगी ! उसके लिए मैं थोड़ी देर और रुक गयी ! लेकिन वो उससे आगे बढ़ ही नहीं रहीं थी , फिर उन्होंने बच्चों से एक सवाल और किया और इस बार का सवाल मुझे चौका दिया , उनका सवाल था की किसके - किसके घर पे पपीता का पेड़ है ?? ये सवाल मुझे हजम नहीं हुआ और मुझे शक हुआ की शायद कुछ गड़बड़ है ! फिर मैं कक्षा के दीवार के पीछे छिप कर खड़ी हो गयी और बगल वाली खिड़की से झांक कर देखने लगी तो मैंने देखा की मैडम बाहर निकल कर किसीको ढूंढ़ रही थी , फिर मैं समझ गयी की शायद वो मुझे ढूंढ़ रही हैं थोड़ी देर इधर - उधर देखने के बाद वो बच्चे से एक कुर्सी मंगवा कर बाहर में बैठ कर स्वेटर बुनने लगीं ! ये तो कुछ भी नहीं है , मैं आपको एक और किस्सा बताती हूँ की एक मेरे बहुत दूर की रिश्तेदार इलाहाबाद परीक्षा देने आयीं हुयी थी , उत्तर-प्रदेश सरकार के व्दारा दक्षता परीक्षा ली जा रही थी उसीको देने आयीं हुयीं थी ! जब वो शाम को परीक्षा देने के बाद मेरे घर आयीं तो मेरी सहेली ने पूछा की परीक्षा कैसा गया ?? तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो मेरी सहेली ने फिर पूछा तो इस बार भी उन्होंने कुछ नहीं बोला ! इसी तरह ३ - ४ बार ये सिलसिला चला लेकिन कोई जवाब नहीं मिला फिर उनके पति देव ने बताया की वो कम सुनती हैं थोडा ऊँचा बोलिए ! इस बार खुद उनके पति देव ने ऊँची आवाज में पूछा तब जाकर उन्होंने अवधी में कहा की " ठीके गेलै " ! अब सोचिये की वो बच्चों को क्या पढ़ाती होंगी , अगर वो किसी बच्चे से पूछती होगी की भारत के प्रधानमंत्री कौन हैं ?? और अगर बच्चे बोले की अखिलेश यादव तो वो तो उसे भी सही कर देंगी ! मेरा मकसद उनका मजाक उड़ाना कतई नहीं है , मुझे मालूम है की वो कुदरत की मार है भगवान न करे की किसी को भी ये सब देखना पड़े ! इस तरह के बहुत सारे ऐसे किस्से हैं , पुरे उत्तर-प्रदेश में यही स्थिति है ! और उपर दिए गए सारे किस्से मेरे आँखों देखि और कानो सुनी है !
मैं कुछ सवाल पूछना चाहती हूँ की जिस आधार पे नियुक्तियां ली जा रही है क्या वो सही है ?? इसके लिए जो पात्रता रखी गयी है क्या वो सही है ?? जितनी भी नियुक्तियां हुयी है उसमे प्रमुख रूप से दो पात्रता है , एक तो कोई टीचर ट्रेनिंग ले रखा हो और दूसरा दसवीं बारहवीं एवं स्नातक में लाये गए प्राप्तांक के प्रतिशत के आधार पे ! लेकिन ये पात्रता मुखिया और शिक्षा पदाधिकारी के तरफ से रखी गयी है ! जो १० - १५ साल पहले टीचर ट्रेनिंग किया हो और उस समय से न तो कलम पकड़ा हो और न ही किताब पलटा हो , क्या वो बच्चे को सही ढंग से पढ़ा पाएंगे ? जो चोरी और पैरवी से बहुत ज्यादा नंबर ले आये हों , क्या वो बच्चे को सही शिक्षा दे पाएंगे ? वो तो खुद जब उस तरीके से पास किये हो तो बच्चे को भी तो वही सिखायेंगे ! और जो टेबल के निचे से काम करवा रहे हो उनकी तो बात ही निराली है ! इनलोगों से ज्यादा पढ़ा लिखा हुआ , इनसे ज्यादा उर्जावान , इनसे ज्यादा अपने काम के प्रति समर्पित युवा दर - दर की ठोकरे खा रहे हैं , या यों कहे की उन्हें मजबूर किया जा रहा है ! और वो भी सिर्फ इसलिए की उनके पास टीचर ट्रेनिंग का प्रमाण - पत्र नहीं है , उनके पास पैसे नहीं है , वो इन्लोग जैसों से कुछ नंबर से पीछे हैं ! ये जो पात्रता राखी गयी है क्या वो सही है ?? क्या ये सरकार का शिक्षा के क्षेत्र में सही कदम है ?
सरकार को फिर से इस पे विचार करना चाहिए ! उच्च शिक्षा के साथ - साथ इन सबो पे भी ध्यान देना होगा , बच्चपन से ही उनके आधार को मजबूत बनाना होगा ! पाठ्यक्रम में बदलाव करने की जरुरत है , क्योंकि सोचिये की, छठी वर्ग के अंग्रेजी में बहुत ही सरल वाक्य पढने को मिलते हैं ,जैसे " यह एक लड़का है " लेकिन सातवीं में लम्बी - लम्बी कठिन कहानी एवं कविता पढने को मिलता है, जिसे बच्चे सही से पढ़ नहीं पाते और समझने की बात तो दूर है ! क्या इसमें बदलाव लाने की जरुरत नहीं है ? इसे पूरी व्यवस्था को बिलकुल बदलने की जरुरत है ! और नियुक्ति के लिए लिखित परीक्षा एवं मौखिक परीक्षा ली जाये ! ताकि सही लोगों का नियुक्ति हो सके ! जिससे शिक्षा के स्तर को उठाया जा सके !
ये लेखक के निजी विचार है! लेखक का परिचय:
Pinki Devi
S. G. P. B. M.,
Awadh University, Faizabad